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“सियासत के अद्भुत श्रृंगार थे चंद्रशेखर”
शुभम मिश्र
बलिया की जमीन का असर कहें या कुछ और चंद्रशेखर ने हमेशा हवा को चुनौती दी। युवा कांग्रेस से सियासी सफर शुरू कर समाजवाद के मजबूत प्रहरी बनते हुए इंदिरा गाँधी का युवा तुर्क बनना, इमरजेंसी की जेल यात्रा के बाद जनता पार्टी के अध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुॅंचना, उनकी यात्रा कई पड़ावों से गुजरी।
लेकिन हर पड़ाव में जो बात एक सी थी, वह थी चंद्रशेखर का हर उस आदमी के सामने तनकर खड़े हो जाना, जिसे खुद के होने का गुमान हो। बलिया के दूसरे गांव की तरह चंद्रशेखर का गांव भी तीन नदियों के कछार में है “इब्राहिमपट्टी”जी हां अब उसे चंद्रशेखर की जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है। सन 1927 में चंद्रशेखर यहीं पैदा हुए।
गांव में तब न दवाखाना था,न कोतवाली, न बिजली ,न सड़के, न कोई स्कूल पर अब सब कुछ है सिवाय चंद्रशेखर के। लेकिन चंद्रशेखर जिंदा है लोगों के दिलों दिमाग में और जेहन में,राजनीतिक गलियारों में, बलिया के कहानियों में ,मां की लोरियों में और पिता के किस्सों में। मुझे चंद्रशेखर के बारे में ज्यादा कुछ याद तो नहीं है पर दिमाग पर जोर डालता हूं तो मेरी जेहन में एक तस्वीर आती है, आषाढ़ का महीना ,धोती-कुर्ता, कंधे पर मोटा सा गमछा , बरामदा, मेरे दादा के साथ जन समूह से घिरे चंद्रशेखर।
शायद ये 2003 कि बात रही होगी। दूसरा किस्सा मुझे याद आता है जब मैं चौथी कक्षा में रहा होऊंगा और चंद्रशेखर जी को केंद्रीय विद्यालय के निर्माणाधीन भवन के उद्घाटन के लिए आना था पर किसी कारणवश वह नहीं आ पाए। तब पहली बार लगा यह कोई बड़ा आदमी होगा। तीसरा किस्सा उनके देहांत का है तब मैं बड़ा खुश था विद्यालय तीन-चार दिनों के लिए बंद था, बलिया सहित पूरा देश रो रहा था, देश का तिरंगा झुका हुआ था पर मुझे नहीं पता था कि बलिया ने अपना बेटा ,हिंदुस्तान ने अपना गौरव और सियासत ने अपना श्रृंगार खो दिया है।
वैसे तो बचपन से ही चंद्रशेखर समाजिक कार्यों में,आजादी के आंदोलनों में और गांधी बाबा में विश्वास करते आये थे,लेकिन बलिया में उनका राजनीतिक उदय 1946 में हुआ जब स्वाधीनता सेनानी परशुराम सिंह आजीवन कारावास काट कर आए थे। उनका सम्मान हो रहा था,बागी बलिया के योद्धाओं की जमघट थी मंच पर धुरंधर नेता थे, पर महफ़िल 19 साल का लड़का अपनी ओजस्वी भाषण से जीत लिया, वह थे भविष्य के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर।
चंद्रशेखर अपने खानदान के पहले मैट्रीकुलेट थे,फिर मिर्जापुर गए और परिवार के पहले ग्रेजुएट बने। 1950 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और राजनीति शास्त्र में एमए किया इन सबके बीच उनकी सामाजिक और राजनीतिक यात्रा चलती रही। इसी दौरान वह आचार्य नरेंद्र देव के संपर्क में आए। सबसे पहले सन 1947 में वह जिला छात्र कांग्रेस के अध्यक्ष बने, 1951 में इलाहाबाद से सोशलिस्ट पार्टी के मंत्री,फिर वापस बलिया आए सोशलिस्ट पार्टी के महामंत्री बने। पार्टी का विभाजन हुआ तो लखनऊ बुलाए गए पहले प्रांतीय उपमंत्री फिर पार्टी के मंत्री बन गए उसी साल लोकसभा का चुनाव लड़ा और हार गए।
5 साल बाद सन् 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के तत्वधान से पहली बार राज्यसभा पहुंचे,1964 में कांग्रेस में शामिल हो गए और 1967 में निर्विरोध कांग्रेस पार्लियामेंटरी पार्टी के मंत्री चुने गए। सन 1971 में शिमला अधिवेशन में श्रीमती गांधी के विरोध के बावजूद चंद्रशेखर कांग्रेस चुनाव समिति के लिए चुनाव लड़ा और जीत भी गए । यह पहली मर्तबा था जब युवातुर्क ,इंदिरा जी जैसी शख्सियत के खिलाफ खुलकर खड़े हुए। कई मौकों पर बतौर संगठनकर्ता और सांसद उन्होंने पार्टी , सरकार की औद्योगिक नीति व मंत्रियों की आलोचना की थी ,पर शायद यह पहली दफा था जब कोई युवा इंदिरा के खिलाफ तनकर खड़ा हुआ हो और जीत भी गया हो ।
राम बहादुर राय , प्रभात खबर में लिखते हैं चंद्रशेखर भेस बदलने में यकीन नहीं करते , प्रधानमंत्री बनने पर उसी धोती कुर्ते में उन्हें कहीं भी पाकर आम आदमी का आत्मबल बढ़ जाता था। चंद्रशेखर जी के सहयोगी ,करीब से जानने वाले बताते हैं कि विचारोंवाली राजनीतिक धारा के अंतिम राजनेता थे। ठेठ गवई अंदाज, धोती, कुर्ता, पैर में चप्पल, साधारण लिवास, सवारे रंग, बेढंगी दाढ़ी, अलमस्त चाल, मजबूत कद – काठी, आकर्षक व्यक्तित्व, आम और खास दोनों से बगैर बनावटी औपचारिकता बातचीत की बेवाक शैली… खासकर ग्रामीण भारत से जुड़ाव उनकी विशिष्टता थी।
वे भारतीय राजनीति के उन पुरोधाओं में थे, जिन्होंने राजनीति अपनी शर्तों पर की, शुद्ध बलियाटिक बगावती अंदाज में। मेरी नजर में वीर लोरिक ,चित्तू पांडे ,मंगल पांडे , हजारी प्रसाद ,केदारनाथ सिंह जयप्रकाश के बाद बलिया के अंतिम बगावती महामानव थे चंद्रशेखर।
बलिया वह जगह है जहां सैकड़ो क्रांतिकारी जन्म लिए उनके हजारों किस्से हैं अपना एक बगावती तेवर है जो आजादी के पूर्व और उसके बाद भी देखने को मिलता है। ये वहीं जगह है जहां भृगुमुनि का उत्कर्ष हुआ। वो विश्व के सबसे बड़े देवता विष्णु के अवतार राम को सिर्फ इसलिए लात मार दिए क्योंकि उन्होंने खड़े होकर उनका सम्मान नहीं किया। 90 के दशक में प्रभाष जोशी ने लिखा था कि अब चंद्रशेखर उस भृगु की स्थिति में पहुंच चुके हैं जहां भी चाहें तो सत्ता की राजनीति को लात मारकर भी अपने ऋषि पद पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।
यह बात बिल्कुल सही है की चंद्रशेखर जी न जाने कितनी दफे राजनीतिक दांवपेच में बड़े- बड़े पदों को स्वीकार मन से लात मारते रहे।
इंदिरा जी का दौर रहा हो ,सन 1977 में मोराजी की सरकार या फिर वी0पी0 सिंह के कार्यकाल में वो चमक दमक को त्यागते रहे। 1990 में वो प्रधानमंत्री बने। नेहरू-गांधी परिवार के बाद इकलौता व्यक्ति जो सीधे प्रधानमंत्री कि कुर्सी पर विराजमान हुआ वो थे चंद्रशेखर ।
प्रधानमंत्री बनने से पहले 10 जनवरी,1983 से 25 जून,1983 तक कन्याकुमारी से दिल्ली की 4260 किलोमीटर की अपनी पदयात्रा के बाद राजघाट पर जब 26 जून 1983 को चंद्रशेखर जी ने भारत यात्रा की 5 सूत्रीय कार्यक्रम घोषित किया।
उनमें प्रमुख रूप से बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा, शुद्ध पेयजल की उपलब्धता गर्भवती महिला व कुपोषण बच्चों की समस्या, संप्रदायिक सद्भाव सहित अन्य विषयों पर विस्तार से चर्चा किया जो वर्तमान के समय में राजनीतिक और सामाजिक रुप से बहुत ही महत्वपूर्ण है और वर्तमान समय में एक प्रबल चुनौती भी है ।
इस यात्रा के बारे में जब तवलीन सिंह ने उनसे पूछा कि “आखिर उन्होंने पदयात्रा शुरू क्यों किया” तो चंद्रशेखर ने बताया कि मुझे लगता है कि विपक्षी पार्टियां तभी श्रीमती गांधी को मात दे सकती हैं जब आम लोगों के हित को अपने से जोड़ें,क्योंकि धन और बल के प्रयोग से श्रीमती गांधी को मात देना मुश्किल है।
रामसेवक श्रीवास्तव ,दिनमान में लिखते हैं यदि “गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ” के संपादकों को यह जानने में दिलचस्पी होगी दुनिया भर में किस राजनीतिक नेता ने सबसे ज्यादा पैदल यात्रा की है तो चंद्रशेखर की पदयात्राओं का हिसाब करना पड़ेगा ।
इस पदयात्रा के बाद चंद्रशेखर विपक्ष के इकलौते नेता के रूप में उभरे परंतु समय को कुछ और मंजूर था। वर्ष 1984 में इंदिरा जी की हत्या हो जाती है, राजीव गांधी को प्रचंड बहुमत मिलता है। अभी कुछ दिन पहले तक जिस व्यक्तित्व की तुलना गांधी और विनोबा भावे से हो रही थी। जिस चंद्रशेखर पर बलिया अपना प्यार जमकर लुटाती आई थी।
वही जनता 1984 की सर्दियों में हो रहे चुनाव चंद्रशेखर के लिए गरम साबित कर दिया। बागी बलिया की धरती के जो कण-कण कभी चंद्रशेखर के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तैयार रहता थी,उसके सुर बदले हुए थे। परिणाम आया चंद्रशेखर 50 हजार से अधिक वोटों से चुनाव हार गए ।
साल 1984 में चंद्रशेखर ने फिर से पद को लात मारा। चुनाव हारने के बाद उनके समक्ष राज्यसभा जाने का प्रस्ताव आया लेकिन उन्होंने यह बोलकर इस पद को ठुकरा दिया की जनता ने मुझे चुनाव हराया है जनता जब सदन भेजेगी तो जाऊंगा।
चंद्रशेखर के व्यक्तित्व की एक सबसे बड़ी पहचान यह रही कि वे फक्कड़ थे और सत्ता में बने रहने के लिए कतई चिंता नहीं करते थे। जो अमूमन आज की राजनीतिक परिदृश्य से बिल्कुल विपरीत है।
वो कांग्रेस के इकलौते नेता रहे होंगे जो आपातकाल में जेल भी गए। वहां बहुचर्चित पुस्तक “जेल डायरी” लिखा। चंद्रशेखर की राजनीति जनता की राजनीति थी । उनका कद राजनीति और विकास से ऊपर रहा उन्होंने कई दफे इसको साबित भी किया।
“धर्मयुग” में अनीस जंग लिखती हैं एक बार मैंने चंद्रशेखर से पूछा राजनीति आपके लिए क्या है ? उन्होंने जवाब दिया राजनीति उनके जीवन का दसवां हिस्सा है पूरी राजनीति में डूबना मेरी प्रकृति नहीं।
बाबू साहेब दूसरों की तरह दिखावटी धार्मिक नहीं थे। न वे जनेऊ पहनते थे न कोई ताबीज, ना उंगली में कोई अंगूठी ,न देवी देवता की कोई तस्वीर। उनको जानने वाले लोग यह जरूर बताते हैं कि उनके कमरे में दो लोगों की तस्वीर लगी रहती थी एक अचार्य नरेंद्र देव और दूसरा जयप्रकाश।
केदारनाथ सिंह लिखते हैं, चंद्रशेखर के जितने प्रशंसक हैं उतने ही आलोचक उनके पक्ष विपक्ष में बहुत सारी बातें कही जाती है। बलिया के संदर्भ में भी मैं जोर देकर कहना चाहता हूं ,चंद्रशेखर केवल बलिया के नहीं है पूरे देश के नेता है। चंद्रशेखर एक बेहतरीन राजनीतिक योद्धा,सफल लेखक, पत्रकार,सर्वश्रेष्ठ सांसद और पर्यावरणविद भी रहे।
वह अपने आत्मसम्मान की रक्षा करना जानते थे दूसरों के सम्मान का भी उतना ही ध्यान रखते थे। उनका कद आज की राजनीति में काफी ऊंचा है आज के प्रधानमंत्री पद के दावेदार उनके समक्ष बौने नजर आते हैं।
चंद्रशेखर का ना होना इसीलिए आज अखरता है कि सड़क से संसद तक वो बेबाकी खत्म हो रही है, जिसमें तर्क भी हो, संयम भी और संवेदना भी उनका यही गुण उनको आज के नेताओं से अलग करता है।
( बलिया से ताल्लुक रखने वाले शुभम मिश्र, लखनऊ विश्वविद्यालय में वाणिज्य के छात्र हैं )
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जमुना राम मेमोरियल स्कूल में धूमधाम से मना 80वां स्वतंत्रता दिवस, बच्चों की प्रस्तुतियों ने बांधा समां
बलिया। जमुना राम मेमोरियल स्कूल, मानपुर चितबड़ागांव में 15 अगस्त को 80वां स्वतंत्रता दिवस हर्षोल्लास, उमंग और देशभक्ति की भावना के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रोफेसर धर्मात्मा नंद ने मां सरस्वती की पूजा-अर्चना एवं ध्वजारोहण के साथ किया।

ध्वजारोहण के बाद विद्यालय के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शानदार प्रस्तुति दी। बच्चों ने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रानी लक्ष्मीबाई जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों के प्रतीकात्मक रूप धारण कर उनके त्याग, संघर्ष और देशभक्ति की गाथा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम की शुरुआत नंदिनी मिश्रा की मधुर आवाज में प्रस्तुत गीत ‘चिट्ठी आई है’ से हुई। उनकी प्रस्तुति ने मौजूद लोगों को भाव-विभोर कर दिया। इसके बाद ‘जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया’ और ‘भारत की जान है तिरंगा’ जैसे देशभक्ति गीतों ने पूरे विद्यालय परिसर को राष्ट्रप्रेम की भावना से भर दिया।
कक्षा 11 के शारीरिक शिक्षा के विद्यार्थियों ने योग के विभिन्न आसनों का शानदार प्रदर्शन कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। वहीं प्री-प्राइमरी एवं प्राइमरी के बच्चों ने ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ गीत पर मनमोहक प्रस्तुति देकर कार्यक्रम में देशभक्ति के रंग भर दिए। कक्षा 8 की छात्राओं द्वारा पारंपरिक कजरी गीत पर प्रस्तुत नृत्य कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा।
विद्यालय के प्रबंध निदेशक तुषार नंद ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि देश का भविष्य युवा पीढ़ी के हाथों में है। उन्होंने बच्चों से अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।

प्रधानाचार्य अजीत सिंह ने कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए मुख्य अतिथि, अभिभावकों, विद्यार्थियों एवं विद्यालय परिवार के सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में सीनियर कोऑर्डिनेटर अरविंद चौबे, जूनियर कोऑर्डिनेटर नीतू मिश्रा सहित समस्त शिक्षक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इसके बाद विद्यार्थियों एवं उपस्थित लोगों के बीच मिष्ठान का वितरण किया गया।
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बलिया में विनोद राय की दसवीं पुण्यतिथि पर उमड़ा जनसैलाब, दिग्गज नेताओं ने दी श्रद्धांजलि
बलिया के नरही थाना गोलीकांड के शहीद विनोद राय की दसवीं पुण्यतिथि पर बुधवार को नरही में श्रद्धांजलि का सैलाब उमड़ पड़ा। हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों ने शहीद विनोद राय को नमन किया। फेफना विधानसभा के विभिन्न गांवों से निकली विशाल तिरंगा यात्रा जब नरही पहुंची तो पूरा इलाका देशभक्ति के नारों और तिरंगों से पट गया। नरही खेल मैदान में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने पहुंचकर शहीद को श्रद्धासुमन अर्पित किए।

पूर्व मंत्री उपेंद्र तिवारी के नेतृत्व में फेफना विधानसभा के विभिन्न गांवों से तिरंगा यात्रा निकाली गई। मोटरसाइकिलों पर सवार हजारों कार्यकर्ता हाथों में तिरंगा लेकर नरही पहुंचे। इसके बाद खेल मैदान में श्रद्धांजलि सभा आयोजित हुई, जहां बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और आम लोगों की मौजूदगी रही।
सभा में प्रभारी मंत्री दयाशंकर मिश्र दयालु, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेश राणा, विधान परिषद सदस्य डॉ. महेंद्र सिंह, बांसडीह विधायक केतकी सिंह, पूर्व मंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला, पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह, पूर्व विधायक संजय यादव समेत कई नेताओं ने विनोद राय के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।

वक्ताओं ने विनोद राय की शहादत को याद करते हुए उनके संघर्ष और बलिदान को नमन किया। भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेश राणा ने कहा कि भाजपा सरकार ने प्रदेश में कानून-व्यवस्था को मजबूत किया है। डॉ. महेंद्र सिंह ने बलिया की क्रांतिकारी धरती को नमन करते हुए कहा कि यहां की मिट्टी, पानी और जवानी में अद्भुत तेवर है।
पूर्व मंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला ने कहा कि विनोद राय जैसे कार्यकर्ताओं का बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा। बांसडीह विधायक केतकी सिंह ने कहा कि अपने संगठन और नेता के लिए जीवन का बलिदान देने वाले विनोद राय को हमेशा नमन किया जाएगा।

12 अगस्त 2016 की काली रात कभी नहीं भूल सकता
कार्यक्रम संयोजक पूर्व मंत्री उपेंद्र तिवारी ने भावुक होते हुए कहा कि 12 अगस्त 2016 की काली रात और विनोद राय की कुर्बानी को वह कभी नहीं भूल सकते। उन्होंने कहा कि विनोद राय के परिवार को हर कीमत पर न्याय मिलेगा और दोषियों को कतई बख्शा नहीं जाएगा।
उन्होंने श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे सभी लोगों का आभार जताते हुए कहा कि कार्यकर्ता के सम्मान और उसकी शहादत को याद रखना संगठन की जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम में चौसा (बक्सर) ब्लॉक प्रमुख सुनीता राय, कोऑपरेटिव बैंक चेयरमैन विनोद शंकर दूबे समेत कई लोगों ने संबोधित किया। भोजपुरी कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी दीं। कार्यक्रम का संचालन भाजपा जिला उपाध्यक्ष प्रदीप सिंह ने किया।
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तीन बार के विधायक उमाशंकर सिंह नहीं रहे, बलिया की राजनीति ने खोया अपना सबसे बड़ा जननेता
बलिया। रसड़ा विधानसभा क्षेत्र से लगातार तीन बार विधायक रहे और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के प्रदेश में इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के निधन से पूरे बलिया जिले में शोक की लहर दौड़ गई। बुधवार देर रात उनके निधन की आधिकारिक पुष्टि होते ही उनके आवास पर समर्थकों, शुभचिंतकों और क्षेत्रीय लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। हर ओर गम और सन्नाटा पसरा रहा।
नगरा ब्लॉक के खनवर गांव निवासी उमाशंकर सिंह लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। पिछले कई महीनों से उनका इलाज चल रहा था। उनके स्वास्थ्य को लेकर लगातार चर्चाएं थीं, लेकिन बुधवार रात उनके निधन की खबर ने पूरे पूर्वांचल को स्तब्ध कर दिया।
उमाशंकर सिंह केवल एक विधायक नहीं थे, बल्कि रसड़ा की राजनीति का ऐसा चेहरा थे जिनकी पहचान पार्टी से कहीं अधिक उनके जनसंपर्क, विकास कार्यों और सामाजिक सरोकारों से थी। यही वजह रही कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर हर दल के नेताओं ने उनके निधन को क्षेत्र की अपूरणीय क्षति बताया।
छात्र राजनीति से विधानसभा तक का सफर
सेवानिवृत्त सैनिक घुरहू सिंह के बड़े पुत्र उमाशंकर सिंह ने छात्र राजनीति से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू किया। वे सतीश चंद्र महाविद्यालय, बलिया के छात्रसंघ महामंत्री रहे। इसके बाद वर्ष 2002-03 में जिला पंचायत सदस्य चुने गए और यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा ने नई दिशा पकड़ी।
लगातार तीन चुनाव जीते
साल 2012 में बसपा के टिकट पर पहली बार रसड़ा विधानसभा से चुनाव लड़ते हुए उन्होंने करीब 84 हजार वोट हासिल किए और सपा प्रत्याशी सनातन पांडेय को 52,825 वोटों के बड़े अंतर से हराकर पहली बार विधायक बने।
2017 में भाजपा के पूर्व विधायक राम इकबाल सिंह को 33,885 वोटों से हराकर दूसरी बार विधानसभा पहुंचे।
वहीं 2022 के चुनाव में सपा-सुभासपा गठबंधन की चुनौती के बावजूद उन्होंने सुभासपा प्रत्याशी महेंद्र चौहान को करीब 5 हजार वोटों से हराकर जीत की हैट्रिक पूरी की। बसपा के कमजोर दौर में भी उनकी यह जीत पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बनी थी।
समाजसेवा से बनाई अलग पहचान
राजनीति में आने से पहले उमाशंकर सिंह सड़क निर्माण के व्यवसाय से जुड़े रहे। विधायक बनने के बाद इस कार्य की जिम्मेदारी उनके परिवार ने संभाली। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान समाजसेवी के रूप में रही। उन्होंने अपने जीवनकाल में 600 से अधिक निर्धन कन्याओं के सामूहिक विवाह कराकर समाज में एक अलग मिसाल कायम की।
शोक में डूबा बलिया
उनके निधन की खबर मिलते ही रसड़ा, नगरा और पूरे बलिया जिले में शोक की लहर दौड़ गई। बड़ी संख्या में लोग उनके आवास पर पहुंचकर अंतिम दर्शन कर रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि पूर्वांचल ने आज अपना एक लोकप्रिय, जुझारू और जनसेवा के लिए समर्पित नेता खो दिया।
उमाशंकर सिंह के अंतिम संस्कार और श्रद्धांजलि सभा के कार्यक्रम की जानकारी का इंतजार किया जा रहा है। उनका निधन केवल रसड़ा विधानसभा ही नहीं, बल्कि पूरे बलिया की राजनीति के लिए एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा।
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