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बलिया स्पेशल

बलिया में इस बार किसके ज़िम्मे होगी चंद्रशेखर की विरासत ?

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बलिया. बागी बलिया. चंद्रशेखर का बलिया. तो आपको हम बलिया लिए चलते हैं. यदि इस चुनावी सरगर्मी में हम बलिया को देखें तो हमें बलिया और उसके प्रभाव क्षेत्र के सभी लोकसभा सीटों पर एक बात साफ दिखती है कि आम जनमानस की भावुकता और लोकसभा के प्रत्याशी का चेहरा ही चुनाव में मायने रखता है. 2014 के चुनाव में भी मोदी लहर पर सवार होकर जीते बीजेपी के भरत सिंह को 37% मत मिले. तो चंद्रशेखर के पुत्र व समाजवादी पार्टी के नीरज शेखर को 27% मत मिले, और कौमी एकता दल के अफजाल अंसारी को 16% मत मिले. परंपरागत तौर पर सपा को मिलने वाले मुस्लिम मतों के अफजाल के साथ चले जाने का परिणाम हुआ कि नीरज शेखर हार गए.

इस बार बीजेपी ने वीरेंद्र सिंह मस्त को अपना उम्मीदवार बनाया है. वे खुद को चंद्रशेखर का शिष्य मानते हैं. संघ के ढर्रे पर खेती-किसानी पर राजनीति करते हैं. भदोही के निवर्तमान सांसद हैं. हालांकि भरत सिंह का टिकट कटना बताता है कि बलिया को लेकर भाजपा का आत्मविश्वास डिगा है. भरत सिंह को लेकर आम जनमानस तो असमंजस में था ही वहीं भाजपा का जिला नेतृत्व भी भीतरखाने से बड़ा गेम कर रहा था. इस बीच नीरज शेखर को लेकर लोग आश्वस्त दिखे. आम जन से बातचीत में ऐसा प्रतीत होता है कि नीरज शेखर की उम्मीदवारी पर महागठबंधन फायदे में रहेगा. ऐसे में बलिया का चुनावी माहौल पता करने हेतु हमारी टीम भी बलिया के तीन विधानसभाओं में घूमी. यहां यह भी बताना जरूरी है कि चंद्रशेखर की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में भाजपा के वर्तमान प्रत्याशी वीरेंद्र सिंह मस्त चुनाव हार गए थे और नीरज शेखर को जीत मिली थी.

बलिया

चंद्रशेखर इफेक्ट?

गौरतलब है कि नीरज शेखर बलिया से दो बार सांसद रह चुके हैं. छवि तो साफ सुथरी है लेकिन वे सड़क पर कम ही नजर आए हैं. चंद्रशेखर को लेकर भावुक हो जाने वाली जनता भी नीरज शेखर के प्रति खुल कर स्नेह दिखाती है. हालांकि अब तक उनकी उम्मीदवारी तय नहीं है लेकिन उनकी सुलभता और व्यवहार उन्हें बढ़त दिलवाता है. यहां यह भी बताना है कि बलिया लोक सभा में 5 विधानसभा साझा हो रहे हैं. जिनमे ग़ाज़ीपुर का जहूराबाद और मुहम्मदाबाद एवं बलिया के बैरिया, बलिया सदर और फेफना हैं.

एक नज़र पिछले चुनाव पर

एक नजर पिछले लोक सभा पर डालें तो 2014 के चुनाव में मोदी का कथित मैजिक सबपर तारी था. सांसद के चेहरे से अधिक मोदी मैजिक चर्चा का विषय था. चाय पर चर्चा से लगायत बूथ स्तर पर नए-नए कार्यक्रमों ने भाजपा के पक्ष में एक सकारात्मक माहौल खड़ा कर दिया था. यहां बीजेपी की नाव भले ही जर्जर रही हो लेकिन उसे मोदी लहर ने किनारे लगा दिया. तिसपर से भरत सिंह का एक पुराना नेता होना उनके पक्ष में रहा. नीरज शेखर तमाम प्रभाव व कोशिश के बावजूद हार गए.

कौमी एकता दल और बसपा का कोण

यहां यह भी बताना जरूरी है कि बीते चुनाव में कौमी एकता दल के अफजाल अंसारी को यहां 17 फीसदी वोट मिले थे. इस वोट को सपा के वोटबैंक में तगड़ी सेंधमारी कहा जा सकता है. बसपा के वीरेंद्र पाठक को भी 14 फीसदी वोट मिले थे. इस बार सपा और बसपा साथ हैं और अफजाल अंसारी के बसपा बैनर तले गाजीपुर से लड़ने के चर्चे हैं.

कहां थी कांग्रेस?

बलिया में कहां रही कांग्रेस या फिर कहां रहेगी यह बड़ा सवाल है. अब तो प्रियंका गांधी भी मैदान में हैं. उन्हें खासतौर पर पूर्वांचल का प्रभारी बनाया गया है. बीते चुनाव में किसी जमाने के कद्दावर राजनेता रहे कल्पनाथ राय की पत्नी  सुधा राय को कांग्रेस ने टिकट दिया था. उन्हें महज 1.5 फीसदी वोट मिले थे. कुल मिलाकर देखें तो पिछले चुनाव में बलिया मोदी लहर के प्रभाव में आया तो जरूर मगर जातीय व धार्मिक समीकरण के साथ ही सबकी दलगत राजनीति बची रही.

ऐसे में 2019 का चुनाव बलिया लोकसभा के लिए और अधिक उल्लेखनीय हो जाता है. बीजेपी ने बीरेंद्र सिंह मस्त की उम्मीदवारी तय कर दी है. गठबंधन में नीरज शेखर का नाम सबसे ऊपर है. कांग्रेस के पास अब भी प्रत्याशी खोजे नहीं मिल रहा. ऐसे में यह चुनाव विधानसभाओं के समीकरण पर अधिक निर्भर होता दिख रहा है.

बीते सप्ताह हमारी टीम ने बलिया लोकसभा के अंतर्गत आने वाले तीन विधानसभाओं में जा कर सामान्य जनमानस से संवाद किया. हमने पाया कि अब भी कई जगहों खासतौर पर गरीब परिवारों में मोदी इफेक्ट कायम है. लोग किसी भी तरह से ‘विपक्ष के न होने पर मोदी ही’ की बात कर रहे हैं. ऐसे में प्रत्याशी का चेहरा और उनके पार्टी का राजनीतिक पैटर्न, जातीय समीकरण काफी हद तक मायने रखेगा.

बैरिया विधानसभा में हल्दी क्षेत्र के आस पास चाय की दुकान पर बात शुरू हुई तो बीजेपी विधायक सुरेंद्र सिंह (विवादित बयानों वाले) के मायावती के बयान पर चर्चा देखने-सुनने को मिली. चाय वाला राजभर था सो उखड़ा हुआ था. मौके पर एक ठाकुर साहब थे जो बलिया अस्पताल से दवा लेकर आए थे और महंगाई पर बहस शुरू करना चाह रहे थे. हमें वहां एक पंडितजी भी मिले जो अखिलेश के साथ थे. लोकसभा पर बातचीत मे लोग ‘मोदी ही’ से शुरू हुए और अंत में ‘कोई विकल्प ना होने के कारण ऐसा होगा’ के निष्कर्ष पर आ गए. कुछ और जगहों पर ऐसी ही बातचीत इस बात की पुष्टि करती हैं कि बैरिया या लगभग सभी जगहों पर कथित मोदी मैजिक के बजाय जातीय समीकरण हावी रहेगा .

बैरिया

बीते विधानसभा में क्या रहा बैरिया का पैटर्न?

एक नजर बैरिया के निर्णायक मतों को देखें तो ठाकुर और यादव बिरादरी के लोग यहां प्रभावी हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में भी सपा के जयप्रकाश अंचल दूसरे स्थान पर रहे. यहां बीजेपी के सुरेंद्र सिंह को जीत मिली. यदि भाजपा और सपा के बीच ठाकुर मत आपस में बंट भी जाएं तो यादव वोट नीरज शेखर को बढ़त दिला सकते हैं. ऐसा साफ दिखता है कि बैरिया में महागठबंधन मजबूत है.

बलिया सदर बणिक समुदाय के प्रभाव में है. शहर के छोटे बड़े कई व्यापारियों से बातचीत यह दिखा कि जीएसटी लागू होने की वजह से बीजेपी को घाटा हो सकता है. नोटबंदी को भी लगभग सभी व्यापारियों ने नकारात्मक करार दिया. बलिया सदर से मौजूदा विधायक आनंद स्वरूप शुक्ला हैं. वे बीजेपी के बैनर तले जीते. वे इलाके के स्थानीय सतीशचन्द्र कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके हैं, मगर शहर के तीनों कॉलेजों में उन्हें लेकर छात्रों में तल्खी दिखी. व्यापारी अथवा सक्रिय लोग भी उनके शहर में कम रहने पर बात करते रहे. इसका भी असर इस चुनाव पर पड़ सकता है.

गौरतलब है कि यहां हम वास्तुस्थिति को तुलनात्मक तौर पर देखने व दिखाने की कोशिश रहे हैं. सदर में काफी संख्या में ठाकुर और ब्राह्मण मत हैं. वे प्राय: उन्हें ही जिताते रहे हैं जो जीत रहा हो. ऐसे में नीरज शेखर का यहां से उम्मीदवार बीजेपी के लिए खासी मुश्किल खड़ा कर सकता है. यहां हम आपको बता दें कि फेफना विधानसभा से उपेंद्र तिवारी विधायक हैं. वे बीजेपी के बैनर तले यहां से जीते हैं. वहीं पूर्व सपाई और वर्तमान में बसपा के साथ राजनीति कर रहे अम्बिका चौधरी भी कद्दावर नेता हैं. मुलायम सिंह के बेहद करीबी हैं, मगर पिछले विधानसभा चुनाव में टिकट कटने पर बसपा से उम्मीदवार थे. वर्तमान गठजोड़ के हिसाब से उन्हें गठबंधन के साथ ही रहना होगा.

क्या है फेफना और जहूराबाद का जातीय समीकरण?

जाति के लिहाज से देखें तो फेफना विधानसभा यादव और राजभर बाहुल्य क्षेत्र है. कई बार भूमिहार भी निर्णायक मतदाता साबित होते हैं. बीजेपी भले ही उपेंद्र तिवारी के उभार का फायदा उठाने की कोशिश करे लेकिन अम्बिका चौधरी और खुद नीरज शेखर का प्रभाव भी कम नही है. यादव बाहुल्यता से यहां गठबंधन का पलड़ा भारी है.

जहूराबाद विधानसभा गाजीपुर जिले में पड़ता है. यहां भूमिहार और राजभर निर्णायक मतदाता हैं. ठाकुर भी भरपूर हैं. इस बात के मजबूत आसार हैं कि भूमिहार मत बीजेपी के कद्दावर नेता मनोज सिन्हा के प्रभाव में रहेंगे. तो गठबंधन के लिए जहूराबाद में सेंध लगाना एक मुश्किल काम होगा. अपनी बेबाक बयानबाजी के लिए सुर्खियों में रहने वाले ओम प्रकाश राजभर यहां के विधायक हैं. इनकी पार्टी का और बीजेपी का 2014 से गठबंधन है. राजभर समुदाय के ओमप्रकाश का प्रभाव पूर्वांचल के लगभग हर सीट पर देखा जा सकता है. वे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. मुहम्मदाबाद विधानसभा भी गाजीपुर का हिस्सा है. वर्तमान में बीजेपी के चर्चित नेता स्व. कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय वहां से विधायक हैं. मुस्लिम और भूमिहार यहां के निर्णायक वोट हैं.

अंसारी और राजभर इफेक्ट कितना प्रभावी?

पूर्वांचल की राजनीति के लिहाज से यह सवाल सौ टके का है कि अंसारी परिवार किधर है. कभी बनारस से लड़ने वाले मुख्तार अंसारी का कुनबा इस बार किसे सपोर्ट कर रहा है. बीजेपी कोई कोरकसर छोड़ेगी ऐसा दिखता नहीं. राजभर समुदाय का पूर्वांचल में के भीतर वोट और उसके नेता का भाजपा के साथ गठबंधन में होना भाजपा के पक्ष में जा सकता है. जातीय राजनीति से इनकार करने वाली भाजपा साल 2014 से ही ओम प्रकाश राजभर के नाज-ओ-नखरे उठा रही है. यदि भाजपा फिर से इस वोटबैंक को साध पाई तो यहां बड़ा खेल हो सकता है.

बलिया राजनीति

राष्ट्रवाद कि जातिवाद?

यहां अंत में हम आपको बताते चलें कि भाजपा खुद को राष्ट्रवाद और विकास की राजनीति करने वाला दल कहती है. जबकि भाजपा ने पूर्वांचल में जातिगत राजनीति करने वाले दो दलों क्रमशः अपना दल और सुभासपा के साथ गठबंधन कर लिया है. अपना दल को कथित तौर पर पटेल बिरादरी की वकालत करने वाले दल के तौर पर देखा जाता है ओम प्रकाश राजभर की पार्टी राजभर समुदाय की वकालत करता है. कहना न होगा कि बीजेपी इस बार कहीं भी विकास के नाम पर वोट मांगती नहीं दिख रही.
गठबंधन के उम्मीदवारों को देखते हुए भाजपा अपने प्रत्याशी उतार रही है. गठबंधन की भी अपनी मुश्किलें हैं किसे कहां से लड़ाया जाए और अपने भीतरघात पर काबू पाया जा सके. वहीं कांग्रेस प्रत्याशी खोज रही है. कम से कम बलिया और सलेमपुर की स्थिति तो यही है. वर्तमान सरकार के प्रति नाराज़गी का लाभ गठबंधन को मिलने की प्रबल संभावनाएं हैं. कुल मिलाकर बलिया का चुनाव गठबंधन बनाम भाजपा ही दिख रहा है. कांग्रेस कहीं दूर तक नज़र नही आती…

(लेखक बलिया के मूल निवासी हैं और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र है)

साभार सहित धन्यवाद-  thebiharmail.com

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बलिया BJP की इनसाइड स्टोरी! संगठन में पद की लड़ाई अश्लील वीडियो तक आई?

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बलिया। बांसडीह में भाजपा से जुड़ी महिला कार्यकर्ता के निजी वीडियो के कथित प्रसार को लेकर दर्ज मुकदमे ने अब संगठन के भीतर चल रही कथित खींचतान की चर्चाओं को भी हवा दे दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या संगठन में पद और प्रभाव की लड़ाई का विवाद इतना बढ़ गया कि मामला निजी वीडियो तक जा पहुंचा? सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे प्रकरण के पीछे संगठन में पद पाने की कथित होड़ और आपसी राजनीतिक खींचतान का एंगल भी सामने आ रहा है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस जांच में ही वास्तविक तस्वीर साफ होगी।

क्या है पूरा मामला?: बांसडीह थाना क्षेत्र में भाजपा से जुड़ी एक महिला कार्यकर्ता ने पुलिस में शिकायत देकर आरोप लगाया कि उसका निजी वीडियो उसकी अनुमति के बिना प्रसारित किया जा रहा है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की है।

मामले में नामजद आरोपियों में भाजपा से जुड़े पदाधिकारियों के नाम होने की बात सामने आई है। महिला ने अपनी शिकायत में बताया है कि वीडियो कॉल के दौरान उसका निजी वीडियो बनाए जाने और बाद में उसके प्रसारित होने की जानकारी उसे बातचीत के दौरान मिली। शिकायतकर्ता ने पुलिस को संबंधित बातचीत के ऑडियो-वीडियो साक्ष्य उपलब्ध होने की बात भी कही है।

पद की कथित लड़ाई से जुड़ा दूसरा एंगल : सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे मामले की एक दूसरी तस्वीर भी सामने आ रही है। सूत्रों का दावा है कि संगठन में पद और जिम्मेदारी को लेकर कुछ लोगों के बीच कथित तौर पर अंदरूनी खींचतान चल रही थी। इसी खींचतान के बीच विवाद ने ऐसा रूप लिया कि कुछ लोगों ने कथित तौर पर एक-दूसरे को निशाने पर लेने और फंसाने के लिए मामले का फायदा उठाया।

सूत्रों का यह भी कहना है कि संगठनात्मक पद को लेकर चल रही प्रतिस्पर्धा के बीच व्यक्तिगत विवाद भी जुड़ता चला गया और आखिरकार मामला पुलिस तक पहुंच गया। हालांकि, यह दावा फिलहाल सूत्रों के हवाले से है। पुलिस जांच में इसकी पुष्टि होना बाकी है कि कथित संगठनात्मक खींचतान का इस मामले से वास्तव में कोई सीधा संबंध है या नहीं।

जिले से लेकर लखनऊ तक मामला पहुंचाने की होड़?: इस पूरे प्रकरण को लेकर सूत्र एक और महत्वपूर्ण दावा कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, जिले से जुड़े भाजपा के कुछ प्रभावशाली नेता कथित तौर पर मामले को दबाने की कोशिश में जुटे हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ नेता इस प्रकरण को लखनऊ तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।

यानी एक तरफ मामले को स्थानीय स्तर पर संभालने और शांत कराने की कोशिश की चर्चा है, तो दूसरी तरफ इसे पार्टी के उच्च स्तर तक ले जाने की कवायद की बात सामने आ रही है। सूत्रों का दावा है कि इसके पीछे भी संगठन में पद और प्रभाव को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान एक वजह हो सकती है।

राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज: मामले में भाजपा से जुड़े पदाधिकारियों के नाम सामने आने के बाद स्थानीय राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। पुलिस की जांच, डिजिटल साक्ष्य और शिकायतकर्ता की ओर से उपलब्ध कराए गए कथित वीडियो एवं अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।

फिलहाल बांसडीह पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि यह मामला केवल निजी वीडियो के कथित प्रसार का है या इसके पीछे संगठनात्मक पद की कथित लड़ाई, आपसी विवाद और राजनीतिक खींचतान की भी कोई भूमिका रही है।

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उत्तर प्रदेश

बलिया का बढ़ा मान! जमुना राम मेमोरियल स्कूल सीबीएसई ईस्ट जोन हैंडबॉल के फाइनल में

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मिर्जापुर। सनबीम एकेडमी नॉलेज पार्क, मिर्जापुर में आयोजित सीबीएसई ईस्ट जोन हैंडबॉल प्रतियोगिता 2026-27 में जमुना राम मेमोरियल स्कूल, चितबड़ागांव (बलिया) की टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल में प्रवेश कर लिया।

प्रतियोगिता के दूसरे दिन खेले गए रोमांचक मुकाबले में जमुना राम मेमोरियल स्कूल ने मेजबान सनबीम एकेडमी नॉलेज पार्क को 06-02 के बड़े अंतर से हराया। मैच की शुरुआत से ही जमुना राम मेमोरियल स्कूल की टीम ने आक्रामक खेल का प्रदर्शन किया और पूरे मुकाबले में अपनी पकड़ बनाए रखी।

टीम की ओर से अंकिता कुशवाहा ने 2, रितिका यादव ने 2, आइशा गुप्ता ने 1 और श्रेया ने 1 गोल कर टीम की जीत में अहम योगदान दिया। इस शानदार जीत के साथ टीम ने प्रतियोगिता के खिताबी मुकाबले में अपनी जगह पक्की कर ली है। फाइनल मुकाबला कल खेला जाएगा।

टीम की सफलता पर विद्यालय के प्रबंध निदेशक इंजीनियर तुषारनंद एवं प्रधानाचार्य अजीत सिंह ने खिलाड़ियों और खेल स्टाफ को बधाई दी। उन्होंने शारीरिक शिक्षक सरदार मोहम्मद अफ़ज़ल, टीम प्रशिक्षक मनोज कुमार और टीम मैनेजर रश्मि श्रीवास्तव को भी शुभकामनाएं देते हुए फाइनल के लिए उत्साह बढ़ाया।

इस अवसर पर इंचार्ज अरविंद चौबे, आनन्द मिश्रा, नीतू मिश्रा सहित विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं ने खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन की सराहना करते हुए उन्हें फाइनल के लिए शुभकामनाएं दीं।

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तीन बार के विधायक उमाशंकर सिंह नहीं रहे, बलिया की राजनीति ने खोया अपना सबसे बड़ा जननेता

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बलिया। रसड़ा विधानसभा क्षेत्र से लगातार तीन बार विधायक रहे और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के प्रदेश में इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के निधन से पूरे बलिया जिले में शोक की लहर दौड़ गई। बुधवार देर रात उनके निधन की आधिकारिक पुष्टि होते ही उनके आवास पर समर्थकों, शुभचिंतकों और क्षेत्रीय लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। हर ओर गम और सन्नाटा पसरा रहा।

नगरा ब्लॉक के खनवर गांव निवासी उमाशंकर सिंह लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। पिछले कई महीनों से उनका इलाज चल रहा था। उनके स्वास्थ्य को लेकर लगातार चर्चाएं थीं, लेकिन बुधवार रात उनके निधन की खबर ने पूरे पूर्वांचल को स्तब्ध कर दिया।

उमाशंकर सिंह केवल एक विधायक नहीं थे, बल्कि रसड़ा की राजनीति का ऐसा चेहरा थे जिनकी पहचान पार्टी से कहीं अधिक उनके जनसंपर्क, विकास कार्यों और सामाजिक सरोकारों से थी। यही वजह रही कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर हर दल के नेताओं ने उनके निधन को क्षेत्र की अपूरणीय क्षति बताया।

छात्र राजनीति से विधानसभा तक का सफर

सेवानिवृत्त सैनिक घुरहू सिंह के बड़े पुत्र उमाशंकर सिंह ने छात्र राजनीति से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू किया। वे सतीश चंद्र महाविद्यालय, बलिया के छात्रसंघ महामंत्री रहे। इसके बाद वर्ष 2002-03 में जिला पंचायत सदस्य चुने गए और यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा ने नई दिशा पकड़ी।

लगातार तीन चुनाव जीते

साल 2012 में बसपा के टिकट पर पहली बार रसड़ा विधानसभा से चुनाव लड़ते हुए उन्होंने करीब 84 हजार वोट हासिल किए और सपा प्रत्याशी सनातन पांडेय को 52,825 वोटों के बड़े अंतर से हराकर पहली बार विधायक बने।

2017 में भाजपा के पूर्व विधायक राम इकबाल सिंह को 33,885 वोटों से हराकर दूसरी बार विधानसभा पहुंचे।

वहीं 2022 के चुनाव में सपा-सुभासपा गठबंधन की चुनौती के बावजूद उन्होंने सुभासपा प्रत्याशी महेंद्र चौहान को करीब 5 हजार वोटों से हराकर जीत की हैट्रिक पूरी की। बसपा के कमजोर दौर में भी उनकी यह जीत पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बनी थी।

समाजसेवा से बनाई अलग पहचान

राजनीति में आने से पहले उमाशंकर सिंह सड़क निर्माण के व्यवसाय से जुड़े रहे। विधायक बनने के बाद इस कार्य की जिम्मेदारी उनके परिवार ने संभाली। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान समाजसेवी के रूप में रही। उन्होंने अपने जीवनकाल में 600 से अधिक निर्धन कन्याओं के सामूहिक विवाह कराकर समाज में एक अलग मिसाल कायम की।

शोक में डूबा बलिया

उनके निधन की खबर मिलते ही रसड़ा, नगरा और पूरे बलिया जिले में शोक की लहर दौड़ गई। बड़ी संख्या में लोग उनके आवास पर पहुंचकर अंतिम दर्शन कर रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि पूर्वांचल ने आज अपना एक लोकप्रिय, जुझारू और जनसेवा के लिए समर्पित नेता खो दिया।

उमाशंकर सिंह के अंतिम संस्कार और श्रद्धांजलि सभा के कार्यक्रम की जानकारी का इंतजार किया जा रहा है। उनका निधन केवल रसड़ा विधानसभा ही नहीं, बल्कि पूरे बलिया की राजनीति के लिए एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा।

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