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रामगोविंद चौधरी : जिले में चंद्रशेखर के बाद समाजवाद का चेहरा!

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सजपा छोड़कर सपा में शामिल होने को चंद्रशेखर ने ही कहा था

रामगोविंद चौधरी बलिया के समाजवादी धुरी हैं। चंद्रशेखर से वर्तमान समाजवादियों तक, सब के बीच सामंजस्य के साथ नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी आठवीं बार विधायक हैं। पूर्वांचल की समाजवादी राजनीति में रामगोविंद चौधरी हर दौर में प्रासंगिक रहे। छात्र राजनीति में छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे और अपनी पार्टी की सरकार में शिक्षा मंत्री बने। 68 वर्ष की अवस्था में राम गोविंद चौधरी लखनऊ और अपने क्षेत्र में नियमित आवाजाही करते रहते हैं। बाईपास सर्जरी के बाद कोविड से संक्रमित रहे रामगोविंद चौधरी आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर खासे तैयार हैं। बलिया ख़बर  से एक्सक्लूसिव बातचीत के दौरान वह सरकार बनने को लेकर भी आश्वस्त दिखे। समाजवाद की नई-पुरानी सभी तरह की राजनीति देख चुके रामगोविंद चौधरी से ने विस्तार से बात की है। अपने ऑडिओ इंटरव्यू में श्री चौधरी ने अपने शुरूआती दौर के बारे में विस्तार से बताया।

छात्र राजनीति और छात्रसंघ

रामगोविंद चौधरी छात्र राजनीति में सक्रिय थे। मुरली मनोहर टाउन स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय में 1972-73 में महामंत्री और 1973-74 में छात्रसंघ अध्यक्ष रहे। तब तक किसी पार्टी से जुड़े नहीं रहे। उसी वक्त जेपी के नेतृत्व में छात्र युवा आंदोलन चला, जो संपूर्ण क्रांति के लिए छात्र-युवा संघर्ष समितियों का निर्माण हो रहा था। उससे जुड़े और अगुआई की। अपने सबसे शुरुआती दौर को याद करते हुए श्री चौधरी बताते हैं,’तब जय प्रकाश जी ने मुझे और स्व. गौरी भइया जी को छात्र-युवा संघर्ष समिति का सदस्य बनाया। हमारा रुझान समाजवाद के प्रति वहीं से बढ़ा। इमरजेंसी लगी। हमने तब भी आंदोलन छ: महीने चलाया।

हालांकि हम और गौरी भइया पहले दिन ही गिरफ्तार हो गए। मैं थाने से भाग गया और छ: महीने तक जेल भरो आंदोलन चलवाया। इसी बीच उत्तर प्रदेश छात्र युवा संघर्ष समिति का यह निर्णय हुआ कि अब स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों को बंद कराया जाए। इसी आंदोलन में मेरी गिरफ्तारी हुई। इसके बाद 19 महीना जेल में रहा।’

पूर्व मंत्री स्वर्गीय गौरी भैया के साथ राम गोविन्द चौधरी

जिले से उस वक्त रामगोविंद चौधरी के साथ ही सक्रीय सभी नेता गिरफ्तार हो गए थे। श्री चौधरी याद करते हैं, ‘मेरे साथ जिले के गौरी भइया, राजधारी सिंह, वंश बहादुर सिंह, विश्वंभर सिंह, बाबू शिवमंगल सिंह, विजेंद्र मिश्र, हरेराम चौधरी सहित 200 से अधिक लोग गिरफ्तार थे।’

चंद्रशेखर से मिलना

रामगोविंद चौधरी जेल से आखिरी दिन निकले। वह जेल के आखिरी राजनैतिक कैदी बचे थे। वो बताते हैं कि उस दिन चंद्रशेखर का पर्चा दाखिला था। उन्हें जेल से छुड़ाने बहुत से लोग आए और जब जेल से निकलने के बाद भीड़ उन्हें ले जा रही थी तब चंद्रशेखर ने उत्सुक्तापूर्वक जानना चाहा। इसके बाद चंद्रशेखर ने उन्हें बुलवाया और अपने गाड़ी में उन्हें घर ले गए, खाना खिलाया और तहसीली स्कूल की एक सभा में ले गए। इस सभा के बारे में बताते वक्त श्री चौधरी बहुत खुश होकर बताते हैं कि चंद्रशेखर जी ने उन्हें खड़ा कराया और कहा,

‘बताइये, ये सरकार इतनी जालिम है। ये छात्रसंघ के राम गोविंद चौधरी हैं, इन्हें आज छोड़ा गया है जबकि जेल में कोई नहीं है।’

फरवरी 1977 की इस जनसभा के बाद से राम गोविंद चौधरी और उनके साथी चंद्रशेखर के चुनाव प्रचार में लग गए और इमरजेंसी के ठीक बाद चंद्रशेखर यह चुनाव  भारतीय लोक दल की टिकट पर जीते। इसके 6 महीने के बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए। ठाकुर जग्गनाथ सिंह रामगोविंद चौधरी और गौरी भइया को जेपी के पास विधानसभा का टिकट दिलाने ले गए। कहा, ये बढ़िया काम कर रहे, इन्हें टिकट दिया जाए। इसके बाद जेपी ने चंद्रशेखर से कहकर जून 1977 में बलिया के चिलकहर विधानसभा से रामगोविंद चौधरी और कोपाचीट विधानसभा से गौरी भइया को टिकट दिलाया। दोनों चुनाव जीते। इसके बाद लगातार पांच बार 1993 तक रामगोविंद चौधरी चिलकहर विधानसभा से विधायक होते रहे। चंद्रशेखर के प्रिय बने रहे।

मुलायम सिंह से संबंध

राम गोविंद बताते हैं कि मुलायम सिंह से उनके संबंध 1977 से हैं। समाजवादी पार्टी बनने के बाद वह लगातार पार्टी में आने को कहते भी रहते थे। लेकिन हर बार चंद्रशेखर बीच में आ जाते थे। श्री चौधरी बताते हैं,

‘मेरे उनसे बहुत मधुर संबंध रहे। वह लगातार समाजवादी पार्टी में शामिल होने को भी कहते रहे। मैं कहता जब तक चंद्रशेखर जी जीवित हैं, चुनाव हारूं या कुछ भी हो मैं उनको छोड़कर नहीं जाऊंगा। नेता जी ने मुझसे 10-12 बार कहा।’

इसी सब के बीच 1993 से रामगोविंद चौधरी चंद्रशेखर जी की पार्टी सजपा से लगातार हारते रहे। नेता जी लगातार सपा जॉइन करने को कहते रहे। इसी बीच 2002 में रामगोविंद चौधरी सजपा से 2002 में बांसडीह से विधायक बन गए। इधर चंद्रशेखर भी बीमार रहने लगे। रामगोविंद चौधरी पर मुलायम सिंह का भी दबाव था और आगे राजनीति बनाए रखने का भी। श्री चौधरी बताते हैं,

‘चंद्रशेखर जी अस्पताल से घर आए और फिर मुझे बुला कर कहा कि अमर सिंह और मुलायम सिंह सिंह उनसे मिलने आए थे। कहा है कि रामगोविंद चौधरी सपा जॉइन नहीं करते हैं। कहते हैं कि चंद्रशेखर जी जब तक रहेंगे तब नहीं छोड़ूंगा। इसलिए तुम सपा जॉइन कर लो।’

समाजवादी पार्टी जॉइन करने को लेकर श्री चौधरी आगे बताते हैं,

‘मैंने तब भी चंद्रशेखर जी से कहा कि आपके रहते मैं कहीं नहीं जाऊंगा। आपके सानिध्य से एमएलए हो गए, मंत्री हो गए लेकिन वह नहीं माने। इसके छ: महीने के बाद मैंने सपा जॉइन कर ली।’

पहली चुनावी हार

अपनी पहली चुनावी हार को याद करते हुए श्री चौधरी कहते हैं,

‘वो समय उन्माद का था। भाजपा का अपना उपद्रव था। इस सब से पहले भी मुलायम सिंह ने हमसे कहा था कि अब हमारे साथ आ जाओ। जिस राजनीति से तुम जीतते हो वो अब नहीं होगी।‘

इस बात को विस्तार से समझाते हुए रामगोविंद चौधरी बताते हैं कि मुलायम सिंह के कहने का आशय था कि सजपा में ऊंची बिरादरी का वोट मिलता है और राममंदिर प्रकरण के बाद ये वोट भाजपा को मिलेगा। उनका आंकलन सही था। रामगोविंद 1993 का चुनाव हार गए। इस दौर की राजनीति पर भाजपा को कटघरे में करते हुए श्री चौधरी कहते हैं,

‘यहीं से भाजपा ने राजनीति को पटरी से उतार दिया। इससे पहले लोग नेताओं के नियत पर शक नहीं करते थे। बाबरी मस्जिद टूटी, देश में आंदोलन हुआ और देश का माहौल गड़बड़ाया।‘

एक चुनावी सभा में पूर्व मंत्री स्वर्गीय बच्चा पाठक के साथ राम गोविंद चौधरी

रामगोविंद 2002 के बाद बांसडीह से विधायक रहे। यहां का राजनीतिक करियर बच्चा पाठक के सामने रहा। बच्चा पाठक कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे। 1967, 1969, 1971, 1974, 1977, 1980, 1993 और फिर 1996 में कांग्रेस के विधायक रहे। बलिया और बांसडीह से सात बार विधायक रहे बच्चा पाठक रामगोविंद चौधरी के सामने कभी चुनाव नहीं जीत सके। उन्हें याद करते हुए श्री चौधरी कहते हैं,

बच्चा पाठक से मेरे विद्यार्थी जीवन से ही अच्छे संबंध थे। लेकिन एक स्कूल की प्रबंध कमेटी को लेकर हमारा कुछ मामला था। उसमें उनसे थोड़ा हमारा मतभेद हो गया था। मगर इसी चुनाव में 2017 में हमारा कांग्रेस पार्टी से गठबंधन था तो उन्होंने ईमानदारी से हमारे लिए प्रचार किया, वोट मांगा और हम जीते।’

क्षेत्रीय राजनीतिक दलों पर प्रतिक्रिया

रामगोविंद चौधरी अपना 2017 का चुनाव मात्र 1687 वोटों से जीते। इनके खिलाफ केतकी सिंह 49500 वोट पाकर दूसरे स्थान पर थीं। लेकिन रामगोविंद चौधरी के खिलाफ एक प्रत्याशी और था। अरविंद राजभर। उन्हें मिले 40234 वोट। तीसरे नंबर के कैंडिडेट की पार्टी थी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी। सुभासपा का बीते चुनाव में भाजपा  के साथ गठबंधन था। आठ जगह चुनाव लड़े और चार पर जीते। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को कैबिनेट मिला लेकिन कुछ समय के बाद गठबंधन टूट गया। अब ओवैसी की पार्टी  AIMIM और सुभासपा का गठबंधन है। ये सब कुछ इस चुनाव में काफी प्रभाव डाल सकता है। रामगोविंद चौधरी इस सवाल पर रफा-दफा स्टाइल में जवाब देते हैं। श्री चौधरी ने कहा,

हम लोग चंद्रशेखर जी की विचारधारा के लोग हैं। वो किसी भी विरोधी के बारे में कोई टिप्पणी ही नहीं करते थे। मैं भी नहीं कहता हूं। मैं ने कभी किसी भी विरोधी पर मंच या मंच के नीचे भी कोई टिप्पणी नहीं की है। हम अब भी नहीं करेंगे।’

अखिलेश यादव की राजनीति से खासे सहमत हैं नेता प्रतिपक्ष

रामगोविंद चौधरी मानते हैं कि समाजवाद में जातिवाद का कोई स्थान नहीं है। इस सवाल पर कि चंद्रशेखर के बाद मुलायम सिंह के हाथ में की समाजवादी राजनीति का रंग जातिवादी हो गया। श्री मुलायम सिंह के समाजवाद पर श्री चौधरी कहते हैं,

‘समाजवाद में जातिवाद का कोई स्थान नहीं है। चंद्रशेखर जी ने अपने नाम में कभी सिंह नहीं लगाया। मुलायम सिंह भी बहुत पहले से समाजवादी हैं। इस देश में मुलायम सिंह को सौभाग्य है कि वह मुख्यमंत्री बने और पुराने समाजवादीयों के सोच को लागू करने में सफल रहे। और उनसे दो कदम आगे बढ़ कर लागू किया अखिलेश यादव ने। अखिलेश जी समाजवादी पिता के लड़के हैं और पढ़े लिखें हैं।‘

बलिया की राजनीति में बांसडीह से रामगोविंद चौधरी का विधायक होना अब प्रतिष्ठा का भी सवाल नहीं रहा। प्रदेश की राजनीति में हर जरूरी समय में श्री चौधरी विधानसभा के सदस्य रहे हैं। इसके इतर भी रामगोविंद चौधरी का कद समाजवादी पार्टी में शुरु के नेताओं में है। कुल मिलाकर वैचारिक रूप से इतने समृद्ध नेताओं की परिपाटी  के रामगोविंद चौधरी समाजवादी पार्टी में प्रासंगिक हैं, यह सुखद है।

बलिया की और तमाम ख़बरें , जिले से जुड़े लोगों के इंटरव्यू पढने के लिए हमें फेसबुक पेज @balliakhabar पर लाइक करें और ट्विटर पर फॉलो करने के लिए @BalliaKhabar पर क्लिक करें। 

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‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत जमुना राम पीजी कॉलेज में हुआ पौधरोपण, वन महोत्सव-2026 का आयोजन

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बलिया। पर्यावरण संरक्षण और हरियाली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बुधवार को श्री जमुना राम पीजी कॉलेज, चितबड़ागांव में ‘वन महोत्सव-2026’ के अंतर्गत ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान चलाया गया। कार्यक्रम में आम के फलदार पौधे रोपकर प्रकृति संरक्षण का संदेश दिया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, चितबड़ागांव शाखा के वरिष्ठ शाखा प्रबंधक शक्ति कुमार ने पांच आम के पौधे लगाकर अभियान की शुरुआत की। उन्होंने अधिक से अधिक पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने का आह्वान किया।

इस अवसर पर महाविद्यालय के संस्थापक प्रबंधक प्रो. धर्मात्मानंद, उप प्राचार्य डॉ. विपिन गुप्ता, शिक्षा संकायाध्यक्ष डॉ. उदयनारायण श्रीवास्तव, डॉ. विनोद यादव, डॉ. राकेश गुप्ता, डॉ. आशुतोष उपाध्याय, बृजेश गुप्ता, आरती पांडे, मंदाकिनी सिंह, मदन सिंह सहित महाविद्यालय परिवार के सदस्य उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में सभी ने पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हुए अधिक से अधिक पौधरोपण और उनकी नियमित देखभाल करने का संदेश दिया।

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आवास योजना में लापरवाही पर सभी एसडीएम का वेतन रोकने के आदेश

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बलिया। जिले में राजस्व और विकास कार्यों की समीक्षा के दौरान जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह ने लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया। मंगलवार को कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित समीक्षा बैठक में उन्होंने भूमि आवंटन और आवासीय पट्टा वितरण में खराब प्रगति पर सभी उपजिलाधिकारियों (एसडीएम) का वेतन रोकने के आदेश दिए। साथ ही लंबित राजस्व वादों के 15 दिनों के भीतर निस्तारण और 90 दिन से अधिक पुराने मामलों को मिशन मोड में खत्म करने के निर्देश दिए।

जिलाधिकारी ने विभिन्न विभागों से जुड़े 25 महत्वपूर्ण एजेंडों की समीक्षा करते हुए आईजीआरएस, डिजिटल क्रॉप सर्वे, स्वामित्व योजना, अंश निर्धारण, मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना, भूमि आवंटन, मत्स्य पट्टा, चकबंदी, बाढ़ प्रबंधन और अन्य राजस्व मामलों की प्रगति पर अधिकारियों से जवाब-तलब किया।

उन्होंने आईजीआरएस के लंबित प्रकरणों का गुणवत्तापूर्ण एवं समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करने को कहा। स्वामित्व योजना के तहत लक्ष्य के सापेक्ष 1,286 गांवों में सर्वे कार्य शेष रहने पर नाराजगी जताते हुए सभी एसडीएम को अभियान चलाकर कार्य पूरा करने के निर्देश दिए।

आगामी बाढ़ को देखते हुए डीएम ने रेड जोन के गांवों की पहचान, नावों की उपलब्धता, मेडिकल कैंप, पशुओं के चारे, राहत सामग्री और कंट्रोल रूम की अग्रिम व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने 183 संभावित बाढ़ प्रभावित गांवों के लिए समुचित तैयारी रखने को भी कहा।

राजस्व वादों की समीक्षा के दौरान जिलाधिकारी ने धारा 24, 33, 34, 67 और 116 से संबंधित लंबित मामलों की स्थिति जानी और निर्देश दिया कि सभी लंबित वादों का 15 दिनों के भीतर निस्तारण किया जाए। 90 दिन से अधिक पुराने मामलों के लिए विशेष कार्ययोजना बनाकर मिशन मोड में कार्रवाई करने को कहा।

मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के तहत सभी तहसीलों में 16 प्रकरण लंबित मिलने पर उन्होंने संबंधित लेखपालों और कानूनगो के विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए।

भूमि आवंटन की समीक्षा में रसड़ा, सिकंदरपुर और बैरिया तहसीलों में कृषि पट्टों का आवंटन नहीं होने पर 10 दिन के भीतर कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए। वहीं आवासीय पट्टा वितरण में लक्ष्य के अनुरूप प्रगति न मिलने पर सभी एसडीएम का वेतन रोकने के आदेश जारी किए।

मत्स्य पालन के लिए पट्टा आवंटन में बांसडीह, बलिया सदर और बैरिया तहसीलों की खराब प्रगति पर संबंधित तहसीलदारों का वेतन रोकने के निर्देश दिए गए। वहीं चकबंदी विभाग में 4,969 मुकदमे लंबित मिलने पर संबंधित अधिकारियों को शोकॉज नोटिस जारी करने और पांच वर्ष से अधिक पुराने मामलों का प्राथमिकता के आधार पर निस्तारण सुनिश्चित करने को कहा।

बैठक में अन्नपूर्णा भवनों के उद्घाटन, सस्ता गल्ला दुकानों के चयन, अवैध खनन पर कार्रवाई, भूमि अधिग्रहण, नदी कटान निरोधक कार्य, गंगा ऑडिटोरियम के जीर्णोद्धार, एसटीपी परियोजना तथा अन्य विकास कार्यों की भी समीक्षा की गई। इस दौरान अपर जिलाधिकारी अनिल कुमार, मुख्य राजस्व अधिकारी गुलशन जी, सभी एसडीएम, तहसीलदार, नायब तहसीलदार एवं अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।

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धूप में पसीने से तरबतर एक डॉक्टर! बलिया को सुषमा शेखर जैसे नेताओं की ज़रूरत क्यों है?

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सियासत में बड़े नामों की कोई कमी नहीं है। मंचों पर भाषण देने वाले नेता भी बहुत हैं और सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाले चेहरे भी। लेकिन कभी-कभी कुछ नज़ारे ऐसे सामने आते हैं जो राजनीति की पारंपरिक तस्वीर से बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। वे केवल एक कार्यक्रम नहीं होते, बल्कि एक संदेश बन जाते हैं। बलिया में पूर्व प्रधानमंत्री एवं जननायक चंद्रशेखर की जन्मशताब्दी वर्ष पर शुरू हुआ तीन दिवसीय फ्री मेडिकल कैंप ऐसा ही एक नज़ारा लेकर आया।

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पुत्रवधू, वरिष्ठ चिकित्सक एवं राज्यसभा सांसद नीरज शेखर की पत्नी डॉ. सुषमा शेखर के नेतृत्व में शुरू हुए इस स्वास्थ्य अभियान के पहले दिन एक हजार से अधिक मरीजों का स्वास्थ्य परीक्षण हुआ। वाराणसी और लखनऊ से आए विशेषज्ञ डॉक्टरों ने निःशुल्क परामर्श दिया और दवाएं वितरित कीं। लेकिन इस पूरे आयोजन की सबसे बड़ी चर्चा डॉक्टरों की संख्या या मरीजों की भीड़ नहीं रही, बल्कि स्वयं डॉ. सुषमा शेखर की सक्रियता रही।

तेज धूप थी। उमस इतनी कि कुछ मिनट खड़ा रहना भी मुश्किल था। लेकिन डॉ. सुषमा शेखर लगातार मरीजों के बीच मौजूद रहीं। वे केवल मंच पर बैठी अतिथि नहीं थीं, बल्कि व्यवस्था संभाल रही थीं, मरीजों से बातचीत कर रही थीं, कई लोगों का स्वयं ब्लड प्रेशर (बीपी) जांच रही थीं, दवाइयों के वितरण पर नजर रख रही थीं और यह सुनिश्चित कर रही थीं कि कोई भी जरूरतमंद बिना इलाज के वापस न लौटे। उनके कपड़े पसीने से भीग चुके थे, लेकिन सेवा का उनका उत्साह कम नहीं हुआ।

शायद ही कभी ऐसा दृश्य देखने को मिलता हो कि देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री के परिवार का कोई सदस्य स्वयं घंटों तक आम मरीजों के बीच खड़ा होकर स्वास्थ्य शिविर में इस तरह सक्रिय भूमिका निभा रहा हो। आमतौर पर बड़े राजनीतिक परिवारों के कार्यक्रम औपचारिकता तक सीमित दिखाई देते हैं, लेकिन यहां तस्वीर कुछ अलग थी। यहां सेवा केवल भाषण का विषय नहीं थी, बल्कि जमीन पर दिखाई दे रही थी।

यह भी उल्लेखनीय है कि डॉ. सुषमा शेखर केवल एक राजनीतिक परिवार का हिस्सा नहीं हैं। वे स्वयं एक वरिष्ठ चिकित्सक हैं। यही कारण है कि मरीजों के प्रति उनका व्यवहार किसी राजनीतिक औपचारिकता से अधिक एक डॉक्टर की संवेदनशीलता को दर्शाता है। चिकित्सा सेवा से जुड़े होने के कारण वे लोगों की जरूरतों को नजदीक से समझती हैं और शायद यही अनुभव इस पूरे अभियान में दिखाई दिया।

यह स्वास्थ्य शिविर केवल एक दिन का आयोजन नहीं है। 26 से 28 जून तक जिले के विभिन्न क्षेत्रों में तीन दिनों तक यह अभियान चलेगा। हजारों लोगों को विशेषज्ञ चिकित्सकों से निःशुल्क जांच, परामर्श और दवाओं का लाभ मिलेगा। यदि इस तरह के प्रयास नियमित रूप से होते रहें, तो ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी काफी हद तक दूर की जा सकती है।

पिछले कुछ समय से फेफना विधानसभा क्षेत्र में डॉ. सुषमा शेखर की सक्रियता को लेकर राजनीतिक चर्चाएं भी हो रही हैं। उन्हें संभावित दावेदार के रूप में देखा जा रहा है। उम्मीदवार कौन होगा, इसका निर्णय राजनीतिक दल करते हैं, लेकिन लोकतंत्र में जनता का आकलन भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता।

यदि राजनीति में ऐसे लोग आगे आएं जिनकी पहचान केवल भाषणों से नहीं बल्कि सेवा, शिक्षा और समाज के प्रति संवेदनशीलता से हो, तो निश्चित रूप से लोकतंत्र और मजबूत होगा। एक डॉक्टर जब जनप्रतिनिधि बनता है, तो वह केवल विकास योजनाओं की नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय जरूरतों की भाषा भी समझता है।

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर हमेशा राजनीति को जनसेवा का माध्यम मानते थे। उनकी जन्मशताब्दी वर्ष में आयोजित यह स्वास्थ्य अभियान उसी विचार की एक झलक देता है। किसी भी महान नेता को सच्ची श्रद्धांजलि केवल माल्यार्पण से नहीं, बल्कि उनके विचारों को व्यवहार में उतारकर दी जाती है।

यह संपादकीय किसी राजनीतिक समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि एक सकारात्मक पहल की सराहना का प्रयास है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति बिना किसी सरकारी पद के, धूप की परवाह किए बिना, हजारों मरीजों के बीच खड़ा होकर सेवा करता है, तो वह दृश्य उम्मीद जगाता है।

शायद राजनीति की सबसे बड़ी ताकत भी यही है जब सत्ता की इच्छा से पहले सेवा का संस्कार दिखाई दे। और यदि जनप्रतिनिधित्व की कसौटी सेवा, संवेदनशीलता और समर्पण हो, तो ऐसे चेहरों पर समाज का ध्यान जाना स्वाभाविक है।

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