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रामगोविंद चौधरी : जिले में चंद्रशेखर के बाद समाजवाद का चेहरा!

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सजपा छोड़कर सपा में शामिल होने को चंद्रशेखर ने ही कहा था

रामगोविंद चौधरी बलिया के समाजवादी धुरी हैं। चंद्रशेखर से वर्तमान समाजवादियों तक, सब के बीच सामंजस्य के साथ नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी आठवीं बार विधायक हैं। पूर्वांचल की समाजवादी राजनीति में रामगोविंद चौधरी हर दौर में प्रासंगिक रहे। छात्र राजनीति में छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे और अपनी पार्टी की सरकार में शिक्षा मंत्री बने। 68 वर्ष की अवस्था में राम गोविंद चौधरी लखनऊ और अपने क्षेत्र में नियमित आवाजाही करते रहते हैं। बाईपास सर्जरी के बाद कोविड से संक्रमित रहे रामगोविंद चौधरी आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर खासे तैयार हैं। बलिया ख़बर  से एक्सक्लूसिव बातचीत के दौरान वह सरकार बनने को लेकर भी आश्वस्त दिखे। समाजवाद की नई-पुरानी सभी तरह की राजनीति देख चुके रामगोविंद चौधरी से ने विस्तार से बात की है। अपने ऑडिओ इंटरव्यू में श्री चौधरी ने अपने शुरूआती दौर के बारे में विस्तार से बताया।

छात्र राजनीति और छात्रसंघ

रामगोविंद चौधरी छात्र राजनीति में सक्रिय थे। मुरली मनोहर टाउन स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय में 1972-73 में महामंत्री और 1973-74 में छात्रसंघ अध्यक्ष रहे। तब तक किसी पार्टी से जुड़े नहीं रहे। उसी वक्त जेपी के नेतृत्व में छात्र युवा आंदोलन चला, जो संपूर्ण क्रांति के लिए छात्र-युवा संघर्ष समितियों का निर्माण हो रहा था। उससे जुड़े और अगुआई की। अपने सबसे शुरुआती दौर को याद करते हुए श्री चौधरी बताते हैं,’तब जय प्रकाश जी ने मुझे और स्व. गौरी भइया जी को छात्र-युवा संघर्ष समिति का सदस्य बनाया। हमारा रुझान समाजवाद के प्रति वहीं से बढ़ा। इमरजेंसी लगी। हमने तब भी आंदोलन छ: महीने चलाया।

हालांकि हम और गौरी भइया पहले दिन ही गिरफ्तार हो गए। मैं थाने से भाग गया और छ: महीने तक जेल भरो आंदोलन चलवाया। इसी बीच उत्तर प्रदेश छात्र युवा संघर्ष समिति का यह निर्णय हुआ कि अब स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों को बंद कराया जाए। इसी आंदोलन में मेरी गिरफ्तारी हुई। इसके बाद 19 महीना जेल में रहा।’

पूर्व मंत्री स्वर्गीय गौरी भैया के साथ राम गोविन्द चौधरी

जिले से उस वक्त रामगोविंद चौधरी के साथ ही सक्रीय सभी नेता गिरफ्तार हो गए थे। श्री चौधरी याद करते हैं, ‘मेरे साथ जिले के गौरी भइया, राजधारी सिंह, वंश बहादुर सिंह, विश्वंभर सिंह, बाबू शिवमंगल सिंह, विजेंद्र मिश्र, हरेराम चौधरी सहित 200 से अधिक लोग गिरफ्तार थे।’

चंद्रशेखर से मिलना

रामगोविंद चौधरी जेल से आखिरी दिन निकले। वह जेल के आखिरी राजनैतिक कैदी बचे थे। वो बताते हैं कि उस दिन चंद्रशेखर का पर्चा दाखिला था। उन्हें जेल से छुड़ाने बहुत से लोग आए और जब जेल से निकलने के बाद भीड़ उन्हें ले जा रही थी तब चंद्रशेखर ने उत्सुक्तापूर्वक जानना चाहा। इसके बाद चंद्रशेखर ने उन्हें बुलवाया और अपने गाड़ी में उन्हें घर ले गए, खाना खिलाया और तहसीली स्कूल की एक सभा में ले गए। इस सभा के बारे में बताते वक्त श्री चौधरी बहुत खुश होकर बताते हैं कि चंद्रशेखर जी ने उन्हें खड़ा कराया और कहा,

‘बताइये, ये सरकार इतनी जालिम है। ये छात्रसंघ के राम गोविंद चौधरी हैं, इन्हें आज छोड़ा गया है जबकि जेल में कोई नहीं है।’

फरवरी 1977 की इस जनसभा के बाद से राम गोविंद चौधरी और उनके साथी चंद्रशेखर के चुनाव प्रचार में लग गए और इमरजेंसी के ठीक बाद चंद्रशेखर यह चुनाव  भारतीय लोक दल की टिकट पर जीते। इसके 6 महीने के बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए। ठाकुर जग्गनाथ सिंह रामगोविंद चौधरी और गौरी भइया को जेपी के पास विधानसभा का टिकट दिलाने ले गए। कहा, ये बढ़िया काम कर रहे, इन्हें टिकट दिया जाए। इसके बाद जेपी ने चंद्रशेखर से कहकर जून 1977 में बलिया के चिलकहर विधानसभा से रामगोविंद चौधरी और कोपाचीट विधानसभा से गौरी भइया को टिकट दिलाया। दोनों चुनाव जीते। इसके बाद लगातार पांच बार 1993 तक रामगोविंद चौधरी चिलकहर विधानसभा से विधायक होते रहे। चंद्रशेखर के प्रिय बने रहे।

मुलायम सिंह से संबंध

राम गोविंद बताते हैं कि मुलायम सिंह से उनके संबंध 1977 से हैं। समाजवादी पार्टी बनने के बाद वह लगातार पार्टी में आने को कहते भी रहते थे। लेकिन हर बार चंद्रशेखर बीच में आ जाते थे। श्री चौधरी बताते हैं,

‘मेरे उनसे बहुत मधुर संबंध रहे। वह लगातार समाजवादी पार्टी में शामिल होने को भी कहते रहे। मैं कहता जब तक चंद्रशेखर जी जीवित हैं, चुनाव हारूं या कुछ भी हो मैं उनको छोड़कर नहीं जाऊंगा। नेता जी ने मुझसे 10-12 बार कहा।’

इसी सब के बीच 1993 से रामगोविंद चौधरी चंद्रशेखर जी की पार्टी सजपा से लगातार हारते रहे। नेता जी लगातार सपा जॉइन करने को कहते रहे। इसी बीच 2002 में रामगोविंद चौधरी सजपा से 2002 में बांसडीह से विधायक बन गए। इधर चंद्रशेखर भी बीमार रहने लगे। रामगोविंद चौधरी पर मुलायम सिंह का भी दबाव था और आगे राजनीति बनाए रखने का भी। श्री चौधरी बताते हैं,

‘चंद्रशेखर जी अस्पताल से घर आए और फिर मुझे बुला कर कहा कि अमर सिंह और मुलायम सिंह सिंह उनसे मिलने आए थे। कहा है कि रामगोविंद चौधरी सपा जॉइन नहीं करते हैं। कहते हैं कि चंद्रशेखर जी जब तक रहेंगे तब नहीं छोड़ूंगा। इसलिए तुम सपा जॉइन कर लो।’

समाजवादी पार्टी जॉइन करने को लेकर श्री चौधरी आगे बताते हैं,

‘मैंने तब भी चंद्रशेखर जी से कहा कि आपके रहते मैं कहीं नहीं जाऊंगा। आपके सानिध्य से एमएलए हो गए, मंत्री हो गए लेकिन वह नहीं माने। इसके छ: महीने के बाद मैंने सपा जॉइन कर ली।’

पहली चुनावी हार

अपनी पहली चुनावी हार को याद करते हुए श्री चौधरी कहते हैं,

‘वो समय उन्माद का था। भाजपा का अपना उपद्रव था। इस सब से पहले भी मुलायम सिंह ने हमसे कहा था कि अब हमारे साथ आ जाओ। जिस राजनीति से तुम जीतते हो वो अब नहीं होगी।‘

इस बात को विस्तार से समझाते हुए रामगोविंद चौधरी बताते हैं कि मुलायम सिंह के कहने का आशय था कि सजपा में ऊंची बिरादरी का वोट मिलता है और राममंदिर प्रकरण के बाद ये वोट भाजपा को मिलेगा। उनका आंकलन सही था। रामगोविंद 1993 का चुनाव हार गए। इस दौर की राजनीति पर भाजपा को कटघरे में करते हुए श्री चौधरी कहते हैं,

‘यहीं से भाजपा ने राजनीति को पटरी से उतार दिया। इससे पहले लोग नेताओं के नियत पर शक नहीं करते थे। बाबरी मस्जिद टूटी, देश में आंदोलन हुआ और देश का माहौल गड़बड़ाया।‘

एक चुनावी सभा में पूर्व मंत्री स्वर्गीय बच्चा पाठक के साथ राम गोविंद चौधरी

रामगोविंद 2002 के बाद बांसडीह से विधायक रहे। यहां का राजनीतिक करियर बच्चा पाठक के सामने रहा। बच्चा पाठक कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे। 1967, 1969, 1971, 1974, 1977, 1980, 1993 और फिर 1996 में कांग्रेस के विधायक रहे। बलिया और बांसडीह से सात बार विधायक रहे बच्चा पाठक रामगोविंद चौधरी के सामने कभी चुनाव नहीं जीत सके। उन्हें याद करते हुए श्री चौधरी कहते हैं,

बच्चा पाठक से मेरे विद्यार्थी जीवन से ही अच्छे संबंध थे। लेकिन एक स्कूल की प्रबंध कमेटी को लेकर हमारा कुछ मामला था। उसमें उनसे थोड़ा हमारा मतभेद हो गया था। मगर इसी चुनाव में 2017 में हमारा कांग्रेस पार्टी से गठबंधन था तो उन्होंने ईमानदारी से हमारे लिए प्रचार किया, वोट मांगा और हम जीते।’

क्षेत्रीय राजनीतिक दलों पर प्रतिक्रिया

रामगोविंद चौधरी अपना 2017 का चुनाव मात्र 1687 वोटों से जीते। इनके खिलाफ केतकी सिंह 49500 वोट पाकर दूसरे स्थान पर थीं। लेकिन रामगोविंद चौधरी के खिलाफ एक प्रत्याशी और था। अरविंद राजभर। उन्हें मिले 40234 वोट। तीसरे नंबर के कैंडिडेट की पार्टी थी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी। सुभासपा का बीते चुनाव में भाजपा  के साथ गठबंधन था। आठ जगह चुनाव लड़े और चार पर जीते। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को कैबिनेट मिला लेकिन कुछ समय के बाद गठबंधन टूट गया। अब ओवैसी की पार्टी  AIMIM और सुभासपा का गठबंधन है। ये सब कुछ इस चुनाव में काफी प्रभाव डाल सकता है। रामगोविंद चौधरी इस सवाल पर रफा-दफा स्टाइल में जवाब देते हैं। श्री चौधरी ने कहा,

हम लोग चंद्रशेखर जी की विचारधारा के लोग हैं। वो किसी भी विरोधी के बारे में कोई टिप्पणी ही नहीं करते थे। मैं भी नहीं कहता हूं। मैं ने कभी किसी भी विरोधी पर मंच या मंच के नीचे भी कोई टिप्पणी नहीं की है। हम अब भी नहीं करेंगे।’

अखिलेश यादव की राजनीति से खासे सहमत हैं नेता प्रतिपक्ष

रामगोविंद चौधरी मानते हैं कि समाजवाद में जातिवाद का कोई स्थान नहीं है। इस सवाल पर कि चंद्रशेखर के बाद मुलायम सिंह के हाथ में की समाजवादी राजनीति का रंग जातिवादी हो गया। श्री मुलायम सिंह के समाजवाद पर श्री चौधरी कहते हैं,

‘समाजवाद में जातिवाद का कोई स्थान नहीं है। चंद्रशेखर जी ने अपने नाम में कभी सिंह नहीं लगाया। मुलायम सिंह भी बहुत पहले से समाजवादी हैं। इस देश में मुलायम सिंह को सौभाग्य है कि वह मुख्यमंत्री बने और पुराने समाजवादीयों के सोच को लागू करने में सफल रहे। और उनसे दो कदम आगे बढ़ कर लागू किया अखिलेश यादव ने। अखिलेश जी समाजवादी पिता के लड़के हैं और पढ़े लिखें हैं।‘

बलिया की राजनीति में बांसडीह से रामगोविंद चौधरी का विधायक होना अब प्रतिष्ठा का भी सवाल नहीं रहा। प्रदेश की राजनीति में हर जरूरी समय में श्री चौधरी विधानसभा के सदस्य रहे हैं। इसके इतर भी रामगोविंद चौधरी का कद समाजवादी पार्टी में शुरु के नेताओं में है। कुल मिलाकर वैचारिक रूप से इतने समृद्ध नेताओं की परिपाटी  के रामगोविंद चौधरी समाजवादी पार्टी में प्रासंगिक हैं, यह सुखद है।

बलिया की और तमाम ख़बरें , जिले से जुड़े लोगों के इंटरव्यू पढने के लिए हमें फेसबुक पेज @balliakhabar पर लाइक करें और ट्विटर पर फॉलो करने के लिए @BalliaKhabar पर क्लिक करें। 

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सिकंदरपुर की सियासत में नया चेहरा, कौन हैं संजीव कुमार तिवारी? बिजनेस से राजनीति तक कैसे पहुंचा सफर?

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A New Face in Sikandarpur Politics: Who Is Sanjeev Kumar Tiwari? How Did His Journey From Business to Politics Begin?

बलिया। सिकंदरपुर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में अब नए चेहरों की सक्रियता दिखाई देने लगी है। इसी बीच बिजनेस की दुनिया से राजनीति में कदम रखने वाले संजीव कुमार तिवारी का नाम भी चर्चा में है। कारोबारी पृष्ठभूमि से आने वाले संजीव कुमार तिवारी अब राजनीति के जरिए क्षेत्र की समस्याओं को उठाने और विकास की नई सोच के साथ आगे बढ़ने की बात कर रहे हैं।

राजनीति में आने की प्रेरणा कहां से मिली? बिजनेस से राजनीति तक आने का विचार कैसे बना? सिकंदरपुर विधानसभा को ही राजनीतिक कर्मभूमि बनाने के पीछे क्या वजह है? इन सवालों के साथ संजीव कुमार तिवारी अपने राजनीतिक सफर और भविष्य की योजनाओं को लेकर खुलकर बात करते हैं।

सिकंदरपुर की समस्याओं को लेकर उनकी प्राथमिकताओं में बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और युवाओं के लिए बेहतर अवसर जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। उनका मानना है कि क्षेत्र के विकास के लिए केवल सड़क और भवन निर्माण पर्याप्त नहीं है, बल्कि रोजगार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को भी विकास के केंद्र में रखना होगा।

बेरोजगारी और पलायन पर क्या है प्लान?

सिकंदरपुर समेत पूर्वांचल के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में युवाओं का रोजगार के लिए दूसरे शहरों की ओर पलायन लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है। संजीव कुमार तिवारी का कहना है कि युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है। उनका जोर युवाओं को कौशल, रोजगार और उद्यमिता से जोड़ने पर है।

शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर क्या सोच?

संजीव कुमार तिवारी क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर देते हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को बेहतर इलाज और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। विधायक बनने की स्थिति में इन दोनों क्षेत्रों को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करने की बात वह कहते हैं।

क्या पुराने नेताओं से क्षेत्र के साथ न्याय नहीं हुआ?

राजनीति में नए चेहरे के तौर पर सामने आ रहे संजीव कुमार तिवारी से जब यह सवाल पूछा जाता है कि क्या अब तक के जनप्रतिनिधि क्षेत्र के साथ न्याय नहीं कर पाए, तो उनका फोकस आरोप लगाने के बजाय भविष्य की राजनीति पर दिखाई देता है। उनका कहना है कि जनता अब सिर्फ वादे नहीं, बल्कि काम का स्पष्ट रोडमैप चाहती है।

विधायक बने तो पहले 100 दिन में क्या करेंगे?

संजीव कुमार तिवारी के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि अगर उन्हें जनता का समर्थन मिलता है तो सत्ता संभालने के शुरुआती 100 दिनों में उनकी प्राथमिकता क्या होगी। उनका कहना है कि क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं की पहचान, विभागवार समीक्षा और जनता से सीधे संवाद के जरिए प्राथमिकता तय की जाएगी।

क्या होगा विकास मॉडल?

संजीव कुमार तिवारी अपने विकास मॉडल को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, किसानों की समस्याओं और युवाओं के अवसरों से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि सिकंदरपुर का विकास किसी एक वर्ग या इलाके तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विधानसभा के हर गांव और हर तबके तक विकास की पहुंच होनी चाहिए।

क्या चुनाव पैसे और जाति से जीते जाते हैं?

राजनीति में सबसे कठिन सवालों में से एक चुनाव में पैसे और जातीय समीकरण की भूमिका को लेकर भी है। संजीव कुमार तिवारी का मानना है कि चुनाव में जातीय और आर्थिक समीकरण अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन अंततः जनता का भरोसा सबसे बड़ी ताकत है। वह विकास और साफ छवि को अपनी राजनीतिक पूंजी के तौर पर पेश करते हैं।

जीतने के बाद बदल जाएंगे?

नए राजनीतिक चेहरे के सामने जनता का एक बड़ा सवाल यह भी होता है कि चुनाव से पहले किए गए वादे सत्ता में आने के बाद कितने पूरे होंगे। संजीव कुमार तिवारी का कहना है कि राजनीति में आने का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जनता के बीच लगातार उपलब्ध रहना और अपने काम का हिसाब देना होना चाहिए।

राजनीतिक अनुभव नहीं, फिर भरोसा क्यों?

बिना लंबे राजनीतिक अनुभव के चुनावी मैदान में उतरने को लेकर भी संजीव कुमार तिवारी से सवाल उठता है। उनका जवाब है कि राजनीति में अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता की समस्याओं को समझने की इच्छा, ईमानदारी और काम करने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है। उनका दावा है कि कारोबारी जीवन से मिले अनुभव को वह क्षेत्र के विकास में इस्तेमाल करना चाहते हैं।

टिकट नहीं मिला तो क्या करेंगे?

संजीव कुमार तिवारी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का एक और अहम सवाल टिकट को लेकर है। यदि उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो उनकी अगली रणनीति क्या होगी? इस सवाल का जवाब ही यह तय करेगा कि उनकी राजनीति केवल चुनाव तक सीमित है या वह लंबे समय के लिए सक्रिय राजनीति में उतर चुके हैं।

क्या बलिया सदर पर भी नजर?

सिकंदरपुर से दावेदारी के बीच बलिया सदर सीट को लेकर भी उनसे सवाल किया गया। हालांकि उनकी मौजूदा राजनीतिक सक्रियता का केंद्र सिकंदरपुर दिखाई देता है, लेकिन भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं, इस पर भी नजर रहेगी।

मौजूदा विधायक के काम को कैसे देखते हैं?

मौजूदा विधायक के काम को लेकर संजीव कुमार तिवारी का आकलन भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनका कहना है कि जनता को जनप्रतिनिधि के काम का मूल्यांकन विकास और उपलब्धियों के आधार पर करना चाहिए। आने वाले चुनाव में जनता के सामने अपने-अपने काम और विजन के साथ विकल्प होंगे।

परिवार का कितना मिला साथ?

राजनीति में कदम रखने के फैसले में परिवार की भूमिका को भी संजीव कुमार तिवारी महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि सार्वजनिक जीवन आसान नहीं होता और परिवार का सहयोग राजनीतिक सफर को मजबूती देता है।

राजनीति में आने के बाद क्या बदला?

बिजनेस से राजनीति में आने के बाद संजीव कुमार तिवारी के लिए सबसे बड़ा बदलाव लोगों के बीच लगातार रहना और उनकी समस्याओं को करीब से समझना रहा है। अब उनका कहना है कि राजनीति उनके लिए केवल पद हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्र के लिए काम करने का जरिया है।

युवाओं के नाम संदेश

युवाओं को लेकर संजीव कुमार तिवारी का संदेश है कि युवा राजनीति और समाज से दूरी बनाने के बजाय अपनी जिम्मेदारी समझें और बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा बनें। उनका मानना है कि क्षेत्र के भविष्य का सबसे बड़ा आधार युवा शक्ति है।

एक लाइन में क्यों जीतेंगे?

जब उनसे पूछा गया कि आखिर जनता उन्हें ही क्यों चुने, तो उनका जवाब विकास, बदलाव और जनता से सीधे जुड़ाव के इर्द-गिर्द है। संजीव कुमार तिवारी खुद को एक ऐसे नए राजनीतिक विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं, जो बिजनेस की दुनिया से निकलकर अब सिकंदरपुर की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।

अब देखना दिलचस्प होगा कि संजीव कुमार तिवारी की यह राजनीतिक पारी कितनी लंबी चलती है और सिकंदरपुर की जनता उनके विजन और दावेदारी को किस नजर से देखती है।

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मेजर ध्यानचंद जयंती पर जमुना राम मेमोरियल स्कूल में खेल सप्ताह का आगाज, कबड्डी में खिलाड़ियों ने दिखाया दमखम

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चितबड़ागांव (बलिया)। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती के उपलक्ष्य में जमुना राम मेमोरियल स्कूल, चितबड़ागांव में 29 अगस्त से खेल-कूद सप्ताह का भव्य शुभारंभ हुआ। आयोजन के तहत विद्यालय के चारों हाउस—रेड, ग्रीन, ब्लू और येलो—के बालक एवं बालिका वर्ग के बीच कबड्डी प्रतियोगिता कराई गई।

बालिका वर्ग में ग्रीन हाउस ने रेड हाउस को 12-10 के रोमांचक मुकाबले में हराया, जबकि येलो हाउस ने ब्लू हाउस को 20-15 से शिकस्त दी। बालिका वर्ग का खिताबी मुकाबला अगले दिन खेला जाएगा।

वहीं, बालक वर्ग में ब्लू हाउस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए येलो हाउस को 15-8 के अंतर से हराकर जीत दर्ज की। मुकाबलों के दौरान खिलाड़ियों ने जोश, अनुशासन और टीम भावना का शानदार प्रदर्शन किया।

इस अवसर पर विद्यालय के प्रबंध निदेशक इंजीनियर तुषारनंद ने कहा कि मेजर ध्यानचंद का जीवन अनुशासन, समर्पण और देशप्रेम की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि खेल केवल हार-जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण और टीम भावना विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

प्रधानाचार्य अजीत कुमार सिंह ने कहा कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के साथ खेलकूद भी बेहद जरूरी है। ऐसे आयोजनों से बच्चों की प्रतिभा को निखरने का अवसर मिलता है।

कार्यक्रम के दौरान इंचार्ज अरविंद चौबे, इंचार्ज नीतू मिश्रा और हैंडबॉल प्रशिक्षक मनोज कुमार पाण्डेय ने खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं।

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जमुना राम मेमोरियल स्कूल में धूमधाम से मना 80वां स्वतंत्रता दिवस, बच्चों की प्रस्तुतियों ने बांधा समां

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बलिया। जमुना राम मेमोरियल स्कूल, मानपुर चितबड़ागांव में 15 अगस्त को 80वां स्वतंत्रता दिवस हर्षोल्लास, उमंग और देशभक्ति की भावना के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रोफेसर धर्मात्मा नंद ने मां सरस्वती की पूजा-अर्चना एवं ध्वजारोहण के साथ किया।

ध्वजारोहण के बाद विद्यालय के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शानदार प्रस्तुति दी। बच्चों ने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रानी लक्ष्मीबाई जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों के प्रतीकात्मक रूप धारण कर उनके त्याग, संघर्ष और देशभक्ति की गाथा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम की शुरुआत नंदिनी मिश्रा की मधुर आवाज में प्रस्तुत गीत ‘चिट्ठी आई है’ से हुई। उनकी प्रस्तुति ने मौजूद लोगों को भाव-विभोर कर दिया। इसके बाद ‘जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया’ और ‘भारत की जान है तिरंगा’ जैसे देशभक्ति गीतों ने पूरे विद्यालय परिसर को राष्ट्रप्रेम की भावना से भर दिया।

कक्षा 11 के शारीरिक शिक्षा के विद्यार्थियों ने योग के विभिन्न आसनों का शानदार प्रदर्शन कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। वहीं प्री-प्राइमरी एवं प्राइमरी के बच्चों ने ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ गीत पर मनमोहक प्रस्तुति देकर कार्यक्रम में देशभक्ति के रंग भर दिए। कक्षा 8 की छात्राओं द्वारा पारंपरिक कजरी गीत पर प्रस्तुत नृत्य कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा।

विद्यालय के प्रबंध निदेशक तुषार नंद ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि देश का भविष्य युवा पीढ़ी के हाथों में है। उन्होंने बच्चों से अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।

प्रधानाचार्य अजीत सिंह ने कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए मुख्य अतिथि, अभिभावकों, विद्यार्थियों एवं विद्यालय परिवार के सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में सीनियर कोऑर्डिनेटर अरविंद चौबे, जूनियर कोऑर्डिनेटर नीतू मिश्रा सहित समस्त शिक्षक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इसके बाद विद्यार्थियों एवं उपस्थित लोगों के बीच मिष्ठान का वितरण किया गया।

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