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रामगोविंद चौधरी : जिले में चंद्रशेखर के बाद समाजवाद का चेहरा!

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‘सजपा छोड़कर सपा में शामिल होने को चंद्रशेखर ने ही कहा था‘

रामगोविंद चौधरी बलिया के समाजवादी धुरी हैं। चंद्रशेखर से वर्तमान समाजवादियों तक, सब के बीच सामंजस्य के साथ नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी आठवीं बार विधायक हैं। पूर्वांचल की समाजवादी राजनीति में रामगोविंद चौधरी हर दौर में प्रासंगिक रहे। छात्र राजनीति में छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे और अपनी पार्टी की सरकार में शिक्षा मंत्री बने। 68 वर्ष की अवस्था में राम गोविंद चौधरी लखनऊ और अपने क्षेत्र में नियमित आवाजाही करते रहते हैं। बाईपास सर्जरी के बाद कोविड से संक्रमित रहे रामगोविंद चौधरी आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर खासे तैयार हैं। बलिया ख़बर  से एक्सक्लूसिव बातचीत के दौरान वह सरकार बनने को लेकर भी आश्वस्त दिखे। समाजवाद की नई-पुरानी सभी तरह की राजनीति देख चुके रामगोविंद चौधरी से ने विस्तार से बात की है। अपने ऑडिओ इंटरव्यू में श्री चौधरी ने अपने शुरूआती दौर के बारे में विस्तार से बताया।

छात्र राजनीति और छात्रसंघ

रामगोविंद चौधरी छात्र राजनीति में सक्रिय थे। मुरली मनोहर टाउन स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय में 1972-73 में महामंत्री और 1973-74 में छात्रसंघ अध्यक्ष रहे। तब तक किसी पार्टी से जुड़े नहीं रहे। उसी वक्त जेपी के नेतृत्व में छात्र युवा आंदोलन चला, जो संपूर्ण क्रांति के लिए छात्र-युवा संघर्ष समितियों का निर्माण हो रहा था। उससे जुड़े और अगुआई की। अपने सबसे शुरुआती दौर को याद करते हुए श्री चौधरी बताते हैं,’तब जय प्रकाश जी ने मुझे और स्व. गौरी भइया जी को छात्र-युवा संघर्ष समिति का सदस्य बनाया। हमारा रुझान समाजवाद के प्रति वहीं से बढ़ा। इमरजेंसी लगी। हमने तब भी आंदोलन छ: महीने चलाया।

हालांकि हम और गौरी भइया पहले दिन ही गिरफ्तार हो गए। मैं थाने से भाग गया और छ: महीने तक जेल भरो आंदोलन चलवाया। इसी बीच उत्तर प्रदेश छात्र युवा संघर्ष समिति का यह निर्णय हुआ कि अब स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों को बंद कराया जाए। इसी आंदोलन में मेरी गिरफ्तारी हुई। इसके बाद 19 महीना जेल में रहा।’

पूर्व मंत्री स्वर्गीय गौरी भैया के साथ राम गोविन्द चौधरी

जिले से उस वक्त रामगोविंद चौधरी के साथ ही सक्रीय सभी नेता गिरफ्तार हो गए थे। श्री चौधरी याद करते हैं, ‘मेरे साथ जिले के गौरी भइया, राजधारी सिंह, वंश बहादुर सिंह, विश्वंभर सिंह, बाबू शिवमंगल सिंह, विजेंद्र मिश्र, हरेराम चौधरी सहित 200 से अधिक लोग गिरफ्तार थे।’

चंद्रशेखर से मिलना

रामगोविंद चौधरी जेल से आखिरी दिन निकले। वह जेल के आखिरी राजनैतिक कैदी बचे थे। वो बताते हैं कि उस दिन चंद्रशेखर का पर्चा दाखिला था। उन्हें जेल से छुड़ाने बहुत से लोग आए और जब जेल से निकलने के बाद भीड़ उन्हें ले जा रही थी तब चंद्रशेखर ने उत्सुक्तापूर्वक जानना चाहा। इसके बाद चंद्रशेखर ने उन्हें बुलवाया और अपने गाड़ी में उन्हें घर ले गए, खाना खिलाया और तहसीली स्कूल की एक सभा में ले गए। इस सभा के बारे में बताते वक्त श्री चौधरी बहुत खुश होकर बताते हैं कि चंद्रशेखर जी ने उन्हें खड़ा कराया और कहा,

‘बताइये, ये सरकार इतनी जालिम है। ये छात्रसंघ के राम गोविंद चौधरी हैं, इन्हें आज छोड़ा गया है जबकि जेल में कोई नहीं है।’

फरवरी 1977 की इस जनसभा के बाद से राम गोविंद चौधरी और उनके साथी चंद्रशेखर के चुनाव प्रचार में लग गए और इमरजेंसी के ठीक बाद चंद्रशेखर यह चुनाव  भारतीय लोक दल की टिकट पर जीते। इसके 6 महीने के बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए। ठाकुर जग्गनाथ सिंह रामगोविंद चौधरी और गौरी भइया को जेपी के पास विधानसभा का टिकट दिलाने ले गए। कहा, ये बढ़िया काम कर रहे, इन्हें टिकट दिया जाए। इसके बाद जेपी ने चंद्रशेखर से कहकर जून 1977 में बलिया के चिलकहर विधानसभा से रामगोविंद चौधरी और कोपाचीट विधानसभा से गौरी भइया को टिकट दिलाया। दोनों चुनाव जीते। इसके बाद लगातार पांच बार 1993 तक रामगोविंद चौधरी चिलकहर विधानसभा से विधायक होते रहे। चंद्रशेखर के प्रिय बने रहे।

मुलायम सिंह से संबंध

राम गोविंद बताते हैं कि मुलायम सिंह से उनके संबंध 1977 से हैं। समाजवादी पार्टी बनने के बाद वह लगातार पार्टी में आने को कहते भी रहते थे। लेकिन हर बार चंद्रशेखर बीच में आ जाते थे। श्री चौधरी बताते हैं,

‘मेरे उनसे बहुत मधुर संबंध रहे। वह लगातार समाजवादी पार्टी में शामिल होने को भी कहते रहे। मैं कहता जब तक चंद्रशेखर जी जीवित हैं, चुनाव हारूं या कुछ भी हो मैं उनको छोड़कर नहीं जाऊंगा। नेता जी ने मुझसे 10-12 बार कहा।’

इसी सब के बीच 1993 से रामगोविंद चौधरी चंद्रशेखर जी की पार्टी सजपा से लगातार हारते रहे। नेता जी लगातार सपा जॉइन करने को कहते रहे। इसी बीच 2002 में रामगोविंद चौधरी सजपा से 2002 में बांसडीह से विधायक बन गए। इधर चंद्रशेखर भी बीमार रहने लगे। रामगोविंद चौधरी पर मुलायम सिंह का भी दबाव था और आगे राजनीति बनाए रखने का भी। श्री चौधरी बताते हैं,

‘चंद्रशेखर जी अस्पताल से घर आए और फिर मुझे बुला कर कहा कि अमर सिंह और मुलायम सिंह सिंह उनसे मिलने आए थे। कहा है कि रामगोविंद चौधरी सपा जॉइन नहीं करते हैं। कहते हैं कि चंद्रशेखर जी जब तक रहेंगे तब नहीं छोड़ूंगा। इसलिए तुम सपा जॉइन कर लो।’

समाजवादी पार्टी जॉइन करने को लेकर श्री चौधरी आगे बताते हैं,

‘मैंने तब भी चंद्रशेखर जी से कहा कि आपके रहते मैं कहीं नहीं जाऊंगा। आपके सानिध्य से एमएलए हो गए, मंत्री हो गए लेकिन वह नहीं माने। इसके छ: महीने के बाद मैंने सपा जॉइन कर ली।’

पहली चुनावी हार

अपनी पहली चुनावी हार को याद करते हुए श्री चौधरी कहते हैं,

‘वो समय उन्माद का था। भाजपा का अपना उपद्रव था। इस सब से पहले भी मुलायम सिंह ने हमसे कहा था कि अब हमारे साथ आ जाओ। जिस राजनीति से तुम जीतते हो वो अब नहीं होगी।‘

इस बात को विस्तार से समझाते हुए रामगोविंद चौधरी बताते हैं कि मुलायम सिंह के कहने का आशय था कि सजपा में ऊंची बिरादरी का वोट मिलता है और राममंदिर प्रकरण के बाद ये वोट भाजपा को मिलेगा। उनका आंकलन सही था। रामगोविंद 1993 का चुनाव हार गए। इस दौर की राजनीति पर भाजपा को कटघरे में करते हुए श्री चौधरी कहते हैं,

‘यहीं से भाजपा ने राजनीति को पटरी से उतार दिया। इससे पहले लोग नेताओं के नियत पर शक नहीं करते थे। बाबरी मस्जिद टूटी, देश में आंदोलन हुआ और देश का माहौल गड़बड़ाया।‘

एक चुनावी सभा में पूर्व मंत्री स्वर्गीय बच्चा पाठक के साथ राम गोविंद चौधरी

रामगोविंद 2002 के बाद बांसडीह से विधायक रहे। यहां का राजनीतिक करियर बच्चा पाठक के सामने रहा। बच्चा पाठक कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे। 1967, 1969, 1971, 1974, 1977, 1980, 1993 और फिर 1996 में कांग्रेस के विधायक रहे। बलिया और बांसडीह से सात बार विधायक रहे बच्चा पाठक रामगोविंद चौधरी के सामने कभी चुनाव नहीं जीत सके। उन्हें याद करते हुए श्री चौधरी कहते हैं,

बच्चा पाठक से मेरे विद्यार्थी जीवन से ही अच्छे संबंध थे। लेकिन एक स्कूल की प्रबंध कमेटी को लेकर हमारा कुछ मामला था। उसमें उनसे थोड़ा हमारा मतभेद हो गया था। मगर इसी चुनाव में 2017 में हमारा कांग्रेस पार्टी से गठबंधन था तो उन्होंने ईमानदारी से हमारे लिए प्रचार किया, वोट मांगा और हम जीते।’

क्षेत्रीय राजनीतिक दलों पर प्रतिक्रिया

रामगोविंद चौधरी अपना 2017 का चुनाव मात्र 1687 वोटों से जीते। इनके खिलाफ केतकी सिंह 49500 वोट पाकर दूसरे स्थान पर थीं। लेकिन रामगोविंद चौधरी के खिलाफ एक प्रत्याशी और था। अरविंद राजभर। उन्हें मिले 40234 वोट। तीसरे नंबर के कैंडिडेट की पार्टी थी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी। सुभासपा का बीते चुनाव में भाजपा  के साथ गठबंधन था। आठ जगह चुनाव लड़े और चार पर जीते। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को कैबिनेट मिला लेकिन कुछ समय के बाद गठबंधन टूट गया। अब ओवैसी की पार्टी  AIMIM और सुभासपा का गठबंधन है। ये सब कुछ इस चुनाव में काफी प्रभाव डाल सकता है। रामगोविंद चौधरी इस सवाल पर रफा-दफा स्टाइल में जवाब देते हैं। श्री चौधरी ने कहा,

‘हम लोग चंद्रशेखर जी की विचारधारा के लोग हैं। वो किसी भी विरोधी के बारे में कोई टिप्पणी ही नहीं करते थे। मैं भी नहीं कहता हूं। मैं ने कभी किसी भी विरोधी पर मंच या मंच के नीचे भी कोई टिप्पणी नहीं की है। हम अब भी नहीं करेंगे।’

अखिलेश यादव की राजनीति से खासे सहमत हैं नेता प्रतिपक्ष

रामगोविंद चौधरी मानते हैं कि समाजवाद में जातिवाद का कोई स्थान नहीं है। इस सवाल पर कि चंद्रशेखर के बाद मुलायम सिंह के हाथ में की समाजवादी राजनीति का रंग जातिवादी हो गया। श्री मुलायम सिंह के समाजवाद पर श्री चौधरी कहते हैं,

‘समाजवाद में जातिवाद का कोई स्थान नहीं है। चंद्रशेखर जी ने अपने नाम में कभी सिंह नहीं लगाया। मुलायम सिंह भी बहुत पहले से समाजवादी हैं। इस देश में मुलायम सिंह को सौभाग्य है कि वह मुख्यमंत्री बने और पुराने समाजवादीयों के सोच को लागू करने में सफल रहे। और उनसे दो कदम आगे बढ़ कर लागू किया अखिलेश यादव ने। अखिलेश जी समाजवादी पिता के लड़के हैं और पढ़े लिखें हैं।‘

बलिया की राजनीति में बांसडीह से रामगोविंद चौधरी का विधायक होना अब प्रतिष्ठा का भी सवाल नहीं रहा। प्रदेश की राजनीति में हर जरूरी समय में श्री चौधरी विधानसभा के सदस्य रहे हैं। इसके इतर भी रामगोविंद चौधरी का कद समाजवादी पार्टी में शुरु के नेताओं में है। कुल मिलाकर वैचारिक रूप से इतने समृद्ध नेताओं की परिपाटी  के रामगोविंद चौधरी समाजवादी पार्टी में प्रासंगिक हैं, यह सुखद है।

बलिया की और तमाम ख़बरें , जिले से जुड़े लोगों के इंटरव्यू पढने के लिए हमें फेसबुक पेज @balliakhabar पर लाइक करें और ट्विटर पर फॉलो करने के लिए @BalliaKhabar पर क्लिक करें। 

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2027 में रसड़ा की सियासत कैसी होगी? सर्वे में सामने आए आंकड़े

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बलिया: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बलिया ख़बर की ओर से कराए गए ऑनलाइन विधानसभा सर्वे में रसड़ा सीट को लेकर प्रतिभागियों की राय सामने आई है। सर्वे में पूर्व विधायक उमाशंकर सिंह के कार्यकाल के कामकाज की रेटिंग, उनके पुत्र उकेश सिंह को राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने का अवसर देने, पसंदीदा राजनीतिक दल और विभिन्न पार्टियों के संभावित उम्मीदवारों को लेकर सवाल पूछे गए।

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे में उमाशंकर सिंह के कार्यकाल के कामकाज की औसत रेटिंग 10 में से 7.40 दर्ज की गई। वहीं, जब प्रतिभागियों से पूछा गया कि क्या 2027 में उकेश सिंह को अपने पिता की राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने का मौका मिलना चाहिए, तो 50.9 प्रतिशत ने इसके पक्ष में राय दी। 39.1 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें मौका नहीं मिलना चाहिए, जबकि 10 प्रतिशत प्रतिभागियों ने ‘पता नहीं’ का विकल्प चुना।

उमाशंकर सिंह के कार्यकाल को मिले 7.40 अंक

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे में प्रतिभागियों से उमाशंकर सिंह के कार्यकाल के दौरान कामकाज को 1 से 10 के बीच अंक देने के लिए कहा गया। इस सवाल पर औसत रेटिंग 7.40/10 रही।

यह रेटिंग सर्वे में भाग लेने वाले प्रतिभागियों द्वारा दिए गए अंकों का औसत है।

उकेश सिंह को राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने का मौका देने पर क्या राय?

सर्वे में पूछा गया कि क्या 2027 में उकेश सिंह को अपने पिता की राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने का मौका मिलना चाहिए। इस सवाल पर प्रतिभागियों की राय इस प्रकार रही

आंकड़ों के अनुसार, 50.9 प्रतिशत प्रतिभागियों ने उकेश सिंह को मौका देने के पक्ष में जवाब दिया, जबकि 39.1 प्रतिशत ने इसके विपरीत राय रखी। दोनों विकल्पों के बीच 11.8 प्रतिशत अंकों का अंतर रहा।

पार्टी की पसंद में बसपा 34.2%, सपा 32.1%

2027 में रसड़ा विधानसभा क्षेत्र से किस पार्टी का विधायक होना चाहिए, इस सवाल पर बहुजन समाज पार्टी को 34.2 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। समाजवादी पार्टी को 32.1 प्रतिशत और बीजेपी को 25.4 प्रतिशत समर्थन मिला।

सपा में महेंद्र चौहान को 26.2% समर्थन

समाजवादी पार्टी से संभावित उम्मीदवारों की पहली पसंद पूछे जाने पर 33.5 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य नेताओं का विकल्प चुना। महेंद्र चौहान को 26.2 प्रतिशत, आदित्य गर्ग को 21.9 प्रतिशत और मान सिंह सेंगर को 18.4 प्रतिशत समर्थन मिला।

बीजेपी में राम इकबाल सिंह और महंत कौशलेन्द्र गिरी को लगभग बराबर समर्थन

बीजेपी के संभावित उम्मीदवारों के सवाल पर राम इकबाल सिंह को 32.2 प्रतिशत और महंत कौशलेन्द्र गिरी को 31.9 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। हिमांशु प्रताप सिंह को 19.7 प्रतिशत और प्रवीण सिंह को 13.2 प्रतिशत समर्थन मिला।


दोनों प्रमुख नामों के बीच 0.3 प्रतिशत अंकों का अंतर रहा।

बसपा में प्रिंस उकेश सिंह को 78.3% प्रतिभागियों की पसंद

बलिया ख़बर के ऑनलाइन विधानसभा सर्वे 2027 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से संभावित दावेदारों को लेकर पूछे गए सवाल पर प्रिंस उकेश सिंह को 78.3 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अपनी पसंद बताया। वहीं, 21.7 प्रतिशत प्रतिभागियों ने किसी अन्य दावेदार का विकल्प चुना।

सुभासपा में शिवेंद्र बहादुर सिंह को 31.9% प्रतिभागियों ने चुना

बलिया ख़बर के ऑनलाइन विधानसभा सर्वे 2027 में रसड़ा सीट पर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के संभावित दावेदारों को लेकर पूछे गए सवाल पर शिवेंद्र बहादुर सिंह को 31.9 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अपनी पहली पसंद बताया। वहीं, 68.1 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य नेताओं का विकल्प चुना।

कांग्रेस में ओम लता को 74.1% प्रतिभागियों ने चुना

बलिया ख़बर के ऑनलाइन विधानसभा सर्वे 2027 में रसड़ा सीट पर कांग्रेस के संभावित दावेदारों को लेकर पूछे गए सवाल पर ओम लता को 74.1 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अपनी पहली पसंद बताया।

सर्वे के नतीजों में क्या तस्वीर सामने आई?

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे में उमाशंकर सिंह के कार्यकाल की औसत रेटिंग 7.40/10 दर्ज हुई। उनके पुत्र उकेश सिंह को राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने का मौका देने के सवाल पर 50.9 प्रतिशत प्रतिभागियों ने समर्थन किया, जबकि 39.1 प्रतिशत ने इसका विरोध किया।

पार्टी की पसंद के सवाल पर बसपा को 34.2 प्रतिशत, सपा को 32.1 प्रतिशत और बीजेपी को 25.4 प्रतिशत समर्थन मिला। सपा के संभावित उम्मीदवारों में महेंद्र चौहान और बीजेपी में राम इकबाल सिंह तथा महंत कौशलेन्द्र गिरी को लेकर प्रतिभागियों की पसंद के आंकड़े भी सामने आए।

सर्वे के बारे में जरूरी जानकारी

यह सर्वे बलिया ख़बर की ओर से ऑनलाइन माध्यम से कराया गया था। इसके नतीजे सर्वे में शामिल प्रतिभागियों की राय पर आधारित हैं।  इन नतीजों को पूरी रसड़ा विधानसभा के सभी मतदाताओं की राय का प्रतिनिधि निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

 

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बेल्थरा रोड में टिकट से लेकर पार्टी तक, किसे पसंद कर रहे लोग? ऑनलाइन सर्वे में सामने आए चौकाने वालेआंकड़े

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बलिया। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बलिया ख़बर की ओर से कराए गए ऑनलाइन विधानसभा सर्वे में बेल्थरा रोड सीट को लेकर प्रतिभागियों की राय सामने आई है। सर्वे में मौजूदा विधायक हंसू राम के कामकाज की रेटिंग, उन्हें दोबारा टिकट देने की पसंद, अगला विधायक किस पार्टी से हो और विभिन्न राजनीतिक दलों में संभावित उम्मीदवारों की पहली पसंद को लेकर सवाल पूछे गए।

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, विधायक हंसू राम को उनके कामकाज के लिए औसतन 10 में से 3.43 अंक मिले। वहीं, दोबारा टिकट देने के सवाल पर 71.7 प्रतिशत प्रतिभागियों ने ‘नहीं’ कहा। पार्टी की पसंद के सवाल पर बीजेपी 39.8 प्रतिशत के साथ पहले और समाजवादी पार्टी 36.2 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रही।

1. विधायक हंसू राम के कामकाज की औसत रेटिंग 3.43

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे में प्रतिभागियों से पूछा गया कि वे अपने विधायक हंसू राम के काम को 1 से 10 के बीच कितने अंक देंगे। इस सवाल पर औसत रेटिंग 3.43 दर्ज की गई।

आंकड़ों के अनुसार, दोबारा टिकट देने के सवाल पर ‘नहीं’ कहने वाले प्रतिभागियों का प्रतिशत सबसे अधिक रहा। यह नतीजा ऑनलाइन सर्वे में शामिल लोगों की राय को दर्शाता है।

2. 2027 में किस पार्टी का विधायक चाहते हैं ?

अगले विधानसभा चुनाव में किस पार्टी का विधायक बनना चाहिए, इस सवाल पर बीजेपी को सबसे अधिक 39.8 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। समाजवादी पार्टी 36.2 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रही।


पार्टी की पसंद के आंकड़ों में बीजेपी और सपा के बीच 3 प्रतिशत अंकों का अंतर दिखाई देता है। हालांकि, ये आंकड़े सर्वे में भाग लेने वाले प्रतिभागियों की पसंद पर आधारित हैं, न कि चुनाव परिणाम का अनुमान।

3. सुभासपा में प्रवीण प्रकाश पहली पसंद

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) से कौन-सा नेता पहली पसंद है, इस सवाल पर प्रवीण प्रकाश को 54.2 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। मौजूदा विधायक हंसू राम को 25 प्रतिशत समर्थन मिला, जबकि 20.8 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य नेताओं का विकल्प चुना।


इस सवाल के आंकड़ों में प्रवीण प्रकाश को हंसू राम से 29.2 प्रतिशत अंक अधिक मिले।

4. बीजेपी में धनंजय कनौजिया को 34.4% समर्थन

बीजेपी से संभावित उम्मीदवार के सवाल पर धनंजय कनौजिया को 34.4 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अपनी पहली पसंद बताया। जबकि छठू राम को 21.9 प्रतिशत समर्थन मिला। गोरख पासवान को 18.8 और रीना राव को 15.5 प्रतिशत, 9.4 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य नेताओं को चुना।


बीजेपी के विकल्पों में धनंजय कनौजिया को सबसे अधिक समर्थन मिला। वहीं, अन्य नेताओं के विकल्प को चुनने वाले प्रतिभागियों का प्रतिशत भी 9.4 रहा।

5. समाजवादी पार्टी में राजेश पासवान को 35 .5% समर्थन

समाजवादी पार्टी से पहली पसंद के सवाल पर राजेश पासवान को 35.5 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। वहीं, संतोष गर्ग को 20.9 प्रतिशत ने अपनी पसंद बताया।

सपा के आंकड़ों में नामित नेताओं में राजेश पासवान को सबसे ज्यादा समर्थन मिला। अन्य नेताओं का विकल्प 35.7 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहा

6. बसपा में अनुज कुमार भारती को 26.9% समर्थन

बहुजन समाज पार्टी से पहली पसंद के सवाल पर उपलब्ध आंकड़ों में अनुज कुमार भारती को 26.9 प्रतिशत और संतोष कुमार को 7.7 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। वहीं, 42.3 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य विकल्प को प्राथमिकता दी।


इस सवाल के उपलब्ध आंकड़ों में शेष विकल्पों का पूरा विवरण नहीं है, इसलिए उनकी जानकारी अलग से नहीं जोड़ी गई है।

7. कांग्रेस में 69.2% ने चुना अन्य नेताओं का विकल्प

कांग्रेस पार्टी से पहली पसंद के सवाल पर 69.2 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य नेताओं का विकल्प चुना। पारस वर्मा और अखिलेश कनौजिया को 15.4-15.4 प्रतिशत समर्थन मिला।


कांग्रेस के आंकड़ों में किसी एक नामित नेता के बजाय अन्य नेताओं के विकल्प को सबसे अधिक प्रतिभागियों ने चुना।

बेल्थरा रोड में टिकट और पार्टी की पसंद पर क्या कहते हैं आंकड़े?

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे में तीन प्रमुख पहलू सामने आए हैं। पहला, मौजूदा विधायक हंसू राम के कामकाज की औसत रेटिंग 3.43 रही। दूसरा, 71.7 प्रतिशत प्रतिभागियों ने उन्हें दोबारा टिकट देने के पक्ष में राय नहीं दी। तीसरा, पार्टी की पसंद के सवाल पर बीजेपी को 39.8 प्रतिशत और सपा को 36.2 प्रतिशत समर्थन मिला।

उम्मीदवारों की पसंद के सवाल पर सुभासपा में प्रवीण प्रकाश, बीजेपी में धनंजय कनौजिया और सपा में राजेश पासवान को नामित विकल्पों में सबसे अधिक समर्थन मिला। बसपा और कांग्रेस के सवालों में अन्य नेताओं के विकल्प को चुनने वालों का प्रतिशत भी उल्लेखनीय रहा।

सर्वे के बारे में जरूरी जानकारी

यह सर्वे बलिया ख़बर द्वारा ऑनलाइन माध्यम से कराया गया था। ऊपर दिए गए प्रतिशत सर्वे में शामिल प्रतिभागियों के जवाबों पर आधारित हैं।  इन नतीजों को पूरी बेल्थरा रोड विधानसभा के सभी मतदाताओं की राय का प्रतिनिधि सर्वे नहीं माना जाना चाहिए। ये आंकड़े सर्वे में भाग लेने वाले लोगों की पसंद और राय को सामने रखते हैं।

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राम गोविंद चौधरी की विरासत संभालने को तैयार रंजीत चौधरी, फिर उन्हें कमतर दिखाने की कोशिश क्यों?

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बलिया। समाजवादी राजनीति में राम गोविंद चौधरी की पहचान और उनके लंबे राजनीतिक अनुभव की अपनी अहमियत रही है। अब उनके बेटे रंजीत चौधरी को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। वह अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं, लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या उन्हें आगे बढ़ने का पर्याप्त अवसर मिल रहा है या फिर उनके अपने ही राजनीतिक खेमे के कुछ लोग उन्हें कमतर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं?

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राम गोविंद चौधरी के परिवार का पूरा ख्याल रखने की बात कही है। ऐसे में पार्टी के भीतर रंजीत चौधरी की भूमिका और उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं स्वाभाविक हैं। अखिलेश यादव का यह आश्वासन राम गोविंद चौधरी के परिवार के प्रति पार्टी के रुख को दर्शाता है, लेकिन अब सवाल यह है कि इस भरोसे का जमीन पर कितना असर दिखाई देता है और रंजीत चौधरी को संगठन में किस तरह की भूमिका मिलती है।

राम गोविंद चौधरी की राजनीतिक विरासत केवल पारिवारिक पहचान तक सीमित नहीं है। इसमें उनका लंबा राजनीतिक संघर्ष समाजवादी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता और जनता के बीच बनाया गया आधार शामिल है। रंजीत चौधरी के सामने इस विरासत को आगे बढ़ाने के साथ अपनी अलग राजनीतिक पहचान स्थापित करने की चुनौती भी है।

राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि रंजीत चौधरी को लेकर कुछ लोग उन्हें अपेक्षित महत्व देने के बजाय उनकी भूमिका को सीमित करके पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। मीडिया में उनकी राजनीतिक हैसियत और सक्रियता को किस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, इस तरह की चर्चाओं के पीछे किन लोगों की भूमिका है, इसे लेकर कोई ठोस तथ्य सामने आना जरूरी है।

राजनीतिक दलों में नए नेतृत्व को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संगठन की भी होती है। यदि पार्टी नेतृत्व किसी वरिष्ठ नेता के परिवार के साथ खड़े रहने का भरोसा देता है, तो उस भरोसे को व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। रंजीत चौधरी को अपनी क्षमता साबित करने का अवसर देना और संगठन में उनकी भूमिका स्पष्ट करना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

अब निगाहें समाजवादी पार्टी के नेतृत्व पर हैं। अखिलेश यादव ने राम गोविंद चौधरी के परिवार का पूरा ख्याल रखने की बात कही है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रंजीत चौधरी को अपने पिता की राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने के लिए किस तरह का अवसर मिलता है। आखिरकार, विरासत को सम्मान देना केवल आश्वासन देने से नहीं, बल्कि योग्य अवसर और जिम्मेदारी देने से भी जुड़ा होता है।

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