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क्या केतकी सिंह भेद पाएंगी रामगोविंद चौधरी का बांसडीह किला? जानिए सियासी सफर

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उत्तर प्रदेश चुनाव में क्षेत्रीय क्षत्रपों को किंग मेकर माना जा रहा है। ये क्षेत्रीय पार्टियां रणनीति के साथ अपने उम्मीदवार घोषित कर रही हैं। डॉ. संजय निषाद की पार्टी निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल निषाद पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए तीन प्रत्याशियों की नई सूची जारी कर दी है। निषाद पार्टी ने बलिया के बांसडीह सीट से भी उम्मीदवार की घोषणा कर दी है। केतकी सिंह को बांसडीह से मैदान में उतारा है। केतकी सिंह के सामने सपा के रामगोविंद चौधरी हैं। बांसडीह सीट को रामगोविंद चौधरी का दुर्ग माना जाता है। यहाँ एक नज़र डालते हैं केतकी सिंह के सियासी सफर पर। बलिया खबर को दिए एक इंटरव्यू में केतकी सिंह ने बताई थी अपनी कहानी।

क्या है राजनीतिक करियर– 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की उम्मीदवार रहीं केतकी सिंह बलिया के बांसडीह विधानसभा से लगभग 30000 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहीं। तब यह सीट सपा के रामगोविंद चौधरी के हाथ लगी। सपा की सरकार बनी और उनका कार्यकाल बतौर शिक्षा मंत्री पूरा हुआ। बीते 2017 के विधानसभा चुनाव में केतकी सिंह दुबारा बांसडीह से ही 49514 वोट पाकर वर्तमान नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी से लगभग 1600 वोटों से निर्दल चुनाव हारीं। भाजपा से टिकट की दावेदार रहीं केतकी सिंह को भाजपा के सुभासपा के गठबंधन के बाद टिकट नहीं मिला। हालांकि 2017 विधानसभा चुनाव में ऐसा उल्लेखनीय प्रदर्शन लगभग दो साल बाद दिसंबर 2018 में पार्टी में लौटने का बड़ा कारण रहा। फिलहाल भाजपा नेत्री के तौर पर अपने राजनीतिक हस्तक्षेप को मजबूत करतीं केतकी सिंह ने बलिया खबर से बात की है।

बी.कॉम की पढ़ाई के दौरान ही हो गया विवाह- बेहद मुखर और ‘फायर ब्रांड’ कही जाने वाली केतकी सिंह ने नवीं कक्षा तक की पढ़ाई छत्तीसगढ़ में पूरी की। 2003 में बलिया के ज्ञान पीठिका स्कूल से 12वीं पास करने के बाद जिले के ही टी.डी. कॉलेज से बी.कॉम की पढ़ाई पूरी की। कंप्यूटर सीखने का दौर था तो उसका कोर्स पूरा किया और फिर पढ़ाई के दौरान ही 2005 में शादी हो गई। कॉलेज में छात्र राजनीति में हस्तक्षेप के सवाल पर केतकी सिंह बताती हैं,

“मैं कॉलेज की राजनीति में नहीं आई। उस समय या अब भी लड़कियों की भूमिका बहुत कम ही रहती है। प्रत्याशी भी कभी इक्का-दुक्का मिल जाएं तो बहुत है। उन्हें कई तरह की समस्या और ह्रासमेंट झेलना पड़ता है। ना हीं लड़कों में वैसे संस्कार हैं और ना हीं समाज एक बेटी को उतनी सुरक्षा दे पाता है।“

राजनीति में अचानक एंट्री का कारण क्या था?– एकदम से मुख्यधारा की राजनीति में आ जाने के सवाल पर केतकी सिंह बताती हैं, ‘यह एक बेहद जरूरी बात है और मुझे लगता है कि सबको जानना चाहिए। घर परिवार की जिम्मेदारियों के बीच जब मैं शादी करके यहां (ससुराल) आयी तो यहां का माहौल दूसरा था। अगर हमें कहीं जाना भी होता तो हमारी गाड़ी तक एकदम बरामदे के पास खड़ी होती। फिर साल 2010 में ग्राम पंचायत के चुनाव के दौरान एक घटना हुई।‘ 2010 के ग्राम पंचायत चुनाव का जिक्र करते हुए केतकी सिंह बताती हैं, ‘ग्राम पंचायत के चुनाव में मेरी सास उम्मीदवार थीं। मतदान के कोई 3-4 दिन पहले जब घर के सारे पुरूष चुनाव प्रचार में निकले थे, दोपहर के वक्त मैं अपनी 1 साल की बेटी के साथ अपने कमरे में थी।

तभी मेरी सासू मां कमरे में आईं और दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। मुझे बिस्तर के बगल में छुपाने की कोशिश करने लगीं। मैंने जानना चाहा मगर वो बस रोए जा रहीं थीं। मैंने खिड़की से बाहर देखा, घर के पीछे की तरफ पुलिस और साथ में बहुत सारे लोग घर में लाठी डंडों के साथ घुस आएं हैं। इतने में मेरे ही बेडरूम का दरवाजा तोड़ कर पुलिस वाले घुस आए। यह सबकुछ इतना जल्दी हो रहा था कि कुछ समझने का मौका ही नहीं मिला। इसके बाद मैंने पुलिस वालों के साथ चिल्ला कर बात की, उन्हें घर के बाहर किया और पहली बार अपने ही घर के सबसे बाहर निकली।‘

केतकी सिंह इस घटना के प्रभाव को राजनीतिक हस्तक्षेप का ट्रिगर प्वाइंट मानती हैं। यह घटना क्यों अथवा कैसे हुई का नपातुला जवाब उनकी राजनीतिक परिपक्वता जानने के लिए काफी है। केतकी सिंह कहती हैं, ‘बाद में पता चला, तब के हमारे बसपा विधायक ने गैरकानूनी तरीके से हमारे घर में यह कह कर पुलिस भेजी थी कि इनके घर में चुनाव जीतने और प्रचार के लिए अवैध सामग्रियां मौजूद हैं’  हालांकि केतकी सिंह के ससुर विश्राम सिंह इलाके में पहले से राजनीतिक हस्तक्षेप रखते थे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखऱ के करीबी माने जाने वाले विश्राम सिंह ने भी अपने राजनीतिक अनुभव और खुली सोच को स्पष्ट किया और केतकी सिंह के लिए विधानसभा की राजनीति में हस्तक्षेप के द्वार खोल दिए।

खैर, क्या केतकी सिंह का राजनीति में आना इतना ही आसान या मुश्किल रहा? यह प्रश्न आने वाले समय का हो सकता है फिलहाल बासंडीह और बलिया की राजनीति में इस स्तर पर केतकी सिंह भाजपा के लिए एकमात्र महिला नेत्री हैं। साथ ही यह और भी उल्लेखनीय बात है कि चुनाव में उतरने वाले सभी राजनीतिक दलों को देखें तो भी केतकी सिंह ही एकमात्र महिला नेत्री हैं।

भाजपा ही क्यों- केतकी सिंह मानती हैं कि भारतीय जनता पार्टी से जुड़ाव का कारण उनकी राष्ट्रवादी सोच रही है मगर 2010 के ग्राम पंचायत चुनाव के दौरान की घटना में भाजपा के नेताओं की मदद भी उनका इस दल से जुड़ने का बड़ा कारण है। वो कहती हैं, ‘जब मैंने भाजपा में जुड़ने को सोचा तब तो पार्टी की हालत इतनी अच्छी नहीं थी लेकिन एक राजनीतिक दल अथवा नेता से आप यही उम्मीद करते हैं कि आपके और समाज के सुख-दुख में वो खड़ा हो। इसलिए मैंने भाजपा जॉइन किया।‘

पहली बार चुनाव लड़ने का अनुभव– केतकी सिंह पहली बार चुनाव लड़ने को लेकर कहती हैं, ‘मैंने देखा कि एक MLA होकर आप पुलिस और लोगों का इस तरह दुरूपयोग कर सकते हैं तो आपके पास चीजें बेहतर करने की कितनी ताकत है। यही कारण था औऱ मैंने सोचा की पहले MLA  बनेंगे और फिर अपने इलाके के स्तर से चीजें ठीक करेंगे’

निर्दल चुनाव लड़ने पर ये स्टैंड– केतकी सिंह 2012 में पहली बार भाजपा के टिकट पर बांसडीह से चुनाव लड़ीं। वोट मिले लगभग 30 हज़ार। इसके बाद के 2017 के चुनाव में भाजपा ने सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) के साथ गठबंधन किया और बांसडीह विधानसभा की सीट सुभासपा के हाथ चली गई। केतकी सिंह का टिकट काट कर सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के बेटे अरविंद राजभर को टिकट दे दिया गया। केतकी सिंह निर्दलीय उम्मीदवार बनीं और 49514 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। केतकी सिंह ने निर्दल चुनाव लड़ने के सवाल पर कहा, ‘मैंने पहले दिन से ये तय किया है कि मुझे अपने मान-सम्मान के साथ अपनी शर्तों पर राजनीति करनी है।

बसपा के चलते मैं राजनीति में आयी, सपा की सरकार देखी है। इसके बाद अगर देखें तो राजनीतिक तौर पर खुल कर तत्कालीन सरकारों का विरोध करने का स्पेस भाजपा में मिला। मैं भाजपा के विरोध में चुनाव में नहीं उतरी थी। यहां से भाजपा का उम्मीदवार होता तो मैं जरूर समर्थन करती। मैं चुनाव लड़ने वाले सहयोगी दल के उम्मीदवार को अपना नेता नहीं मानती थी। मैं विचारधारा की राजनीति करती हूं ऐसे में किसी भी दल के उम्मीदवार के लिए वोट नहीं मांग सकती थी और यही आत्मविश्वास है कि आज मैं नेता प्रतिपक्ष के विरोध में उम्मीदवारी दर्ज करा रही हूं।‘

कितना प्रभावी है जातिगत फैक्टर– जातिगत राजनीति और समीकरणों को लेकर केतकी सिंह काफी बेफिक्र नज़र आती हैं। अपनी बातचीत में महात्मा गांधी, चंद्रशेखऱ और जेपी का जिक्र करते हुए चुनावों में इस फैक्टर के प्रभाव पर केतकी सिंह कहती हैं,  ‘ मुझे अपने दूसरे चुनाव की तैयारी के दौरान ये जाति का फैक्टर समझ आया। कहीं कुछ होनी-अनहोनी  होती जैसे मान लीजिए किसी बस्ती में आग लग गई तो लोग कहते थे,  वहां मत जाइए, वो आपको कभी वोट नहीं देंगे। हालांकि मैंने अब तक के अपने दोनों चुनाव में इस बात का ध्यान नहीं रखा। दूसरी बार निर्दल चुनाव लड़ने के बाद तो यह और साफ हो गया’

बलिया की लड़कियों के लिए बतौर भाजपा नेत्री ने केतकी सिंह ने सबसे आखिर में कुछ रेखांकित करने लायक बात कही। पूरी बातचीत में अपनी दो बेटियों का लगातार जिक्र करती हुई केतकी सिंह खुद में आत्मविश्वास रखने की बात करती हैं। केतकी सिंह कहती हैं, ‘मैं बलिया की लड़कियों को कहना चाहती हूं कि राजनीति में आइये और पूरी तरह आत्मविश्वास के साथ आइये। जनता आत्मविश्वासी नेता के बारे में कभी भी पुरूष या महिला के भेद के साथ नहीं सोचती है। अभिवावकों से अनुरोध है कि बेटे जितना विश्वास बेटी पर भी करें, उनकी उड़ान हर किसी से बेहतर होगी’

पूरी बातचीत में केतकी सिंह के तेवर ने बहुत से नए सवालों को स्थान दिया। पूर्वांचल में भाजपा सहित किसी भी राजनीतिक दल में फिलवक्त इतनी मुखर और बिना प्रभावी पारिवारिक सहयोग की शायद ही कोई महिला नेता हों। अब इस प्रभावशाली तेवर का कारण एक बार की बगावत है या राजनीतिक महत्वकांक्षा, इसका मूल्यांकन तो समय के हाथों है। फिलहाल केतकी सिंह चुनाव से लगभग साल भर पहले ही पूरी तैयारी के साथ लैस हैं। सुबह 11 बजे तक लोगों के मिलती हैं और फिर क्षेत्र में जाती हैं। जब हम केतकी सिंह से बातचीत करने पहुंचे, पंचायत चुनावों में समीकरणों की उठा-पटक के बीच कुछ लोग उनसे मिलने आए थे, वो पंचायत चुनाव के आरक्षण की नई नियमावली से नाखुश थे। उन्हें उम्मीद है कि केतकी सिंह उनकी कुछ मदद करेंगी। उन्हें सहयोग के लिए पूर्णतया आश्वस्त करती केतकी सिंह बड़ी जिम्मेदारी से अभिवादन स्वीकार करती रहीं।

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जमुना राम मेमोरियल स्कूल में धूमधाम से मना 80वां स्वतंत्रता दिवस, बच्चों की प्रस्तुतियों ने बांधा समां

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बलिया। जमुना राम मेमोरियल स्कूल, मानपुर चितबड़ागांव में 15 अगस्त को 80वां स्वतंत्रता दिवस हर्षोल्लास, उमंग और देशभक्ति की भावना के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रोफेसर धर्मात्मा नंद ने मां सरस्वती की पूजा-अर्चना एवं ध्वजारोहण के साथ किया।

ध्वजारोहण के बाद विद्यालय के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शानदार प्रस्तुति दी। बच्चों ने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रानी लक्ष्मीबाई जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों के प्रतीकात्मक रूप धारण कर उनके त्याग, संघर्ष और देशभक्ति की गाथा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम की शुरुआत नंदिनी मिश्रा की मधुर आवाज में प्रस्तुत गीत ‘चिट्ठी आई है’ से हुई। उनकी प्रस्तुति ने मौजूद लोगों को भाव-विभोर कर दिया। इसके बाद ‘जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया’ और ‘भारत की जान है तिरंगा’ जैसे देशभक्ति गीतों ने पूरे विद्यालय परिसर को राष्ट्रप्रेम की भावना से भर दिया।

कक्षा 11 के शारीरिक शिक्षा के विद्यार्थियों ने योग के विभिन्न आसनों का शानदार प्रदर्शन कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। वहीं प्री-प्राइमरी एवं प्राइमरी के बच्चों ने ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ गीत पर मनमोहक प्रस्तुति देकर कार्यक्रम में देशभक्ति के रंग भर दिए। कक्षा 8 की छात्राओं द्वारा पारंपरिक कजरी गीत पर प्रस्तुत नृत्य कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा।

विद्यालय के प्रबंध निदेशक तुषार नंद ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि देश का भविष्य युवा पीढ़ी के हाथों में है। उन्होंने बच्चों से अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।

प्रधानाचार्य अजीत सिंह ने कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए मुख्य अतिथि, अभिभावकों, विद्यार्थियों एवं विद्यालय परिवार के सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में सीनियर कोऑर्डिनेटर अरविंद चौबे, जूनियर कोऑर्डिनेटर नीतू मिश्रा सहित समस्त शिक्षक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इसके बाद विद्यार्थियों एवं उपस्थित लोगों के बीच मिष्ठान का वितरण किया गया।

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बलिया में विनोद राय की दसवीं पुण्यतिथि पर उमड़ा जनसैलाब, दिग्गज नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

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बलिया के नरही थाना गोलीकांड के शहीद विनोद राय की दसवीं पुण्यतिथि पर बुधवार को नरही में श्रद्धांजलि का सैलाब उमड़ पड़ा। हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों ने शहीद विनोद राय को नमन किया। फेफना विधानसभा के विभिन्न गांवों से निकली विशाल तिरंगा यात्रा जब नरही पहुंची तो पूरा इलाका देशभक्ति के नारों और तिरंगों से पट गया। नरही खेल मैदान में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने पहुंचकर शहीद को श्रद्धासुमन अर्पित किए।

पूर्व मंत्री उपेंद्र तिवारी के नेतृत्व में फेफना विधानसभा के विभिन्न गांवों से तिरंगा यात्रा निकाली गई। मोटरसाइकिलों पर सवार हजारों कार्यकर्ता हाथों में तिरंगा लेकर नरही पहुंचे। इसके बाद खेल मैदान में श्रद्धांजलि सभा आयोजित हुई, जहां बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और आम लोगों की मौजूदगी रही।

सभा में प्रभारी मंत्री दयाशंकर मिश्र दयालु, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेश राणा, विधान परिषद सदस्य डॉ. महेंद्र सिंह, बांसडीह विधायक केतकी सिंह, पूर्व मंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला, पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह, पूर्व विधायक संजय यादव समेत कई नेताओं ने विनोद राय के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।

वक्ताओं ने विनोद राय की शहादत को याद करते हुए उनके संघर्ष और बलिदान को नमन किया। भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेश राणा ने कहा कि भाजपा सरकार ने प्रदेश में कानून-व्यवस्था को मजबूत किया है। डॉ. महेंद्र सिंह ने बलिया की क्रांतिकारी धरती को नमन करते हुए कहा कि यहां की मिट्टी, पानी और जवानी में अद्भुत तेवर है।

पूर्व मंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला ने कहा कि विनोद राय जैसे कार्यकर्ताओं का बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा। बांसडीह विधायक केतकी सिंह ने कहा कि अपने संगठन और नेता के लिए जीवन का बलिदान देने वाले विनोद राय को हमेशा नमन किया जाएगा।

 12 अगस्त 2016 की काली रात कभी नहीं भूल सकता

कार्यक्रम संयोजक पूर्व मंत्री उपेंद्र तिवारी ने भावुक होते हुए कहा कि 12 अगस्त 2016 की काली रात और विनोद राय की कुर्बानी को वह कभी नहीं भूल सकते। उन्होंने कहा कि विनोद राय के परिवार को हर कीमत पर न्याय मिलेगा और दोषियों को कतई बख्शा नहीं जाएगा।

उन्होंने श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे सभी लोगों का आभार जताते हुए कहा कि कार्यकर्ता के सम्मान और उसकी शहादत को याद रखना संगठन की जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम में चौसा (बक्सर) ब्लॉक प्रमुख सुनीता राय, कोऑपरेटिव बैंक चेयरमैन विनोद शंकर दूबे समेत कई लोगों ने संबोधित किया। भोजपुरी कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी दीं। कार्यक्रम का संचालन भाजपा जिला उपाध्यक्ष प्रदीप सिंह ने किया।

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तीन बार के विधायक उमाशंकर सिंह नहीं रहे, बलिया की राजनीति ने खोया अपना सबसे बड़ा जननेता

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बलिया। रसड़ा विधानसभा क्षेत्र से लगातार तीन बार विधायक रहे और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के प्रदेश में इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के निधन से पूरे बलिया जिले में शोक की लहर दौड़ गई। बुधवार देर रात उनके निधन की आधिकारिक पुष्टि होते ही उनके आवास पर समर्थकों, शुभचिंतकों और क्षेत्रीय लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। हर ओर गम और सन्नाटा पसरा रहा।

नगरा ब्लॉक के खनवर गांव निवासी उमाशंकर सिंह लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। पिछले कई महीनों से उनका इलाज चल रहा था। उनके स्वास्थ्य को लेकर लगातार चर्चाएं थीं, लेकिन बुधवार रात उनके निधन की खबर ने पूरे पूर्वांचल को स्तब्ध कर दिया।

उमाशंकर सिंह केवल एक विधायक नहीं थे, बल्कि रसड़ा की राजनीति का ऐसा चेहरा थे जिनकी पहचान पार्टी से कहीं अधिक उनके जनसंपर्क, विकास कार्यों और सामाजिक सरोकारों से थी। यही वजह रही कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर हर दल के नेताओं ने उनके निधन को क्षेत्र की अपूरणीय क्षति बताया।

छात्र राजनीति से विधानसभा तक का सफर

सेवानिवृत्त सैनिक घुरहू सिंह के बड़े पुत्र उमाशंकर सिंह ने छात्र राजनीति से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू किया। वे सतीश चंद्र महाविद्यालय, बलिया के छात्रसंघ महामंत्री रहे। इसके बाद वर्ष 2002-03 में जिला पंचायत सदस्य चुने गए और यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा ने नई दिशा पकड़ी।

लगातार तीन चुनाव जीते

साल 2012 में बसपा के टिकट पर पहली बार रसड़ा विधानसभा से चुनाव लड़ते हुए उन्होंने करीब 84 हजार वोट हासिल किए और सपा प्रत्याशी सनातन पांडेय को 52,825 वोटों के बड़े अंतर से हराकर पहली बार विधायक बने।

2017 में भाजपा के पूर्व विधायक राम इकबाल सिंह को 33,885 वोटों से हराकर दूसरी बार विधानसभा पहुंचे।

वहीं 2022 के चुनाव में सपा-सुभासपा गठबंधन की चुनौती के बावजूद उन्होंने सुभासपा प्रत्याशी महेंद्र चौहान को करीब 5 हजार वोटों से हराकर जीत की हैट्रिक पूरी की। बसपा के कमजोर दौर में भी उनकी यह जीत पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बनी थी।

समाजसेवा से बनाई अलग पहचान

राजनीति में आने से पहले उमाशंकर सिंह सड़क निर्माण के व्यवसाय से जुड़े रहे। विधायक बनने के बाद इस कार्य की जिम्मेदारी उनके परिवार ने संभाली। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान समाजसेवी के रूप में रही। उन्होंने अपने जीवनकाल में 600 से अधिक निर्धन कन्याओं के सामूहिक विवाह कराकर समाज में एक अलग मिसाल कायम की।

शोक में डूबा बलिया

उनके निधन की खबर मिलते ही रसड़ा, नगरा और पूरे बलिया जिले में शोक की लहर दौड़ गई। बड़ी संख्या में लोग उनके आवास पर पहुंचकर अंतिम दर्शन कर रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि पूर्वांचल ने आज अपना एक लोकप्रिय, जुझारू और जनसेवा के लिए समर्पित नेता खो दिया।

उमाशंकर सिंह के अंतिम संस्कार और श्रद्धांजलि सभा के कार्यक्रम की जानकारी का इंतजार किया जा रहा है। उनका निधन केवल रसड़ा विधानसभा ही नहीं, बल्कि पूरे बलिया की राजनीति के लिए एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा।

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