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विधानसभा’वार 2012: उमाशंकर सिंह के जीत की कहानी; केरोसिन से करोड़ों का सफर!
विधानसभा- रसड़ा
वर्ष- 2012
विधायक- उमाशंकर सिंह(बसपा)
विधानसभा’वार में आज हम बात करेंगे जिले की रसड़ा विधानसभा की। 2012 में जब नया परिसिमन हुआ तो चिलकहर विधानसभा समाप्त हो गई। इसके बात 2007 तक सुरक्षित रहने वाली रसड़ा विधानसभा में काफी कुछ भौगोलिक रूप से बदल गया जिसके बाद यह सामान्य सीट हो गई। 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां से विधायक बने बसपा के प्रत्याशी उमाशंकर सिंह। श्री सिंह ने सपा के सनातन पांडेय को लगभग 52000 मतों से हराया।सपा के कद्दावर चेहरे सनातन पांडेय के सामने उमाशंकर सिंह का यह पहला चुनाव था और वह बसपा के प्रत्याशी थे।
कमाल यह की सपा की लहर और सत्ता दल से स्वाभाविक नाराजगी के बाद भी वह 50 हजार से अधिक अंतर से चुनाव जीते। पुराने नेता सनातन पांडेय का हारना तब जिले में चर्चा का विषय बना लेकिन उमाशंकर सिंह पर सबकी नज़र टिकी रही। उमाशंकर सिंह इससे पूर्व कंस्ट्रक्शन कंपनी के एमडी थे और काफी फैला हुआ कारोबार था। आलम ये बना की पांच साल बीतते-बीतते 2017 के चुनाव से ठीक पहले ही भारतीय निर्वाचन आयोग की सलाह पर विधायक उमाशंकर सिंह की विधानसभा सदस्यता रद्द करने का आदेश आ गया। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उपचुनाव के लगभग सप्ताह भर पहले इस फैसले पर स्टे लगा दिया। विधायकी रद्द होने के पूरे घटनाक्रम को हम आगे समझेंगे फिलहाल एक नज़र उमाशंकर सिंह के पॉलिटिकल करियर पर डाल लेते हैं।
कैसा है उमाशंकर सिंह का इतिहास
उत्तर प्रदेश के टॉप टेन अमीर विधायकों में गिने जाने वाले उमाशंकर सिंह के पिता सेना के जवान थे। चुनाव आयोग को दिए अपने ब्योरे में उमाशंकर सिंह ने बताया है कि उनकी कुल चल अचल संपति 20 करोड़ की है। लेकिन समान्य परिवार के उमाशंकर सिंह की संपत्ति को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं। उमाशंकर सिंह छात्र राजनीति में थे।1989-90 में जिले के सतीश चंद्र डिग्री कॉलेज के महामंत्री बने। इसके बाद 2000- 2005 के बीच पहली बार जिलापंचायत सदस्य बने। उनके करीबी और तत्कालीन छात्र राजनीति में टीडी कॉलेज से 1994-95 में छात्रसंघ के उपाध्यक्ष रणवीर सिंह सेंगर बताते हैं कि श्री सिंह उससे पहले केरोसिन तेल की कोटेदारी में सक्रिय थे।
90 के दशक में प्रदेश भर में कॉलेज के विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए आठ लीटर केरोसिन तेल मिलता था। उमाशंकर सिंह के पास सैनिक कोटे की दुकान थी। जिले के टी.डी. कॉलेज, एस.सी. कॉलेज, कुंवर सिंह पीजी कॉलेज और गुलाब देवी महिला महाविद्यालय के विद्यार्थियों को हर माह केरोसिन का तेल मिलता था। जिसकी कोटेदारी का जिम्मा उमाशंकर सिंह को था। इस पर बात करते हुए रणवीर सिंह सेंगर ने बलिया खबर से कहा,
” आस पास के कॉलेजों में तेल बांटने की कोटेदारी उमाशंकर सिंह की थी। वो छात्रसंघ के प्रतिनिध रह चुके थे। राजनीतिक हस्तक्षेप रखने में इसका लाभ हुआ। इस कोटेदारी के ही दौरान उमाशंकर सिंह, सीयर(वर्तमान में बिल्थरारोड विधानसभा) विधायक और तत्कालीन मंत्री हरिनारायण राजभर के प्रतिनिधि भी थे।”
श्री सेंगर ने आगे स्पष्ट किया कि तत्कालीन विधायक के प्रतिनिधि होने के नाते क्षेत्र में प्रभाव बढ़ा और वह 2000-2005 के दौरान जिला पंचायत के सदस्य बने। श्री सेंगर बताते हैं,
“धीरे-धीरे राजनीतिक सक्रियता बढ़ती रही और फिर ठीका-पट्टा का काम मिलने लगे जिसके बाद उमाशंकर सिंह का कद बढ़ता गया। उनको सबसे पहला काम वर्क ऑर्डर का मिला जिसमें किसी ड्रेनेज की खुदाई की जिम्मेदारी थी। यह काम मुश्किल से 10-15 हज़ार का रहा होगा। लेकिन फिर काम मिलता गया। उन्होंने आगे छात्र शक्ति इंफ्राकंस्ट्रक्शन कंपनी बनाई और ईमानदारी से काम करते रहे। बाद में कुसुम राय के पीडब्ल्यू डी मंत्री होने पर उन्हें लगभग 100 करोड़ का काम मिला जिसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा”
क्या रहा चुनाव जीतने का फैक्टर
उमाशंकर सिंह 2012 विधानसभा चुनाव लड़ने को लेकर पूर्व से ही खासे तैयार थे। उन्होंने चुनाव लड़ने से पूर्व एक आयोजन किया। सामूहिक विवाह का। इस आयोजन में 251 जोड़ों की शादियां कराईं गईं। कहा गया कि इसमें उत्तर प्रदेश, बिहार एवं आसपास के जोड़ों का विवाह हुआ। इसका असर जिले और विधानसभा के आमजनमानस पर पड़ा और परिणाम हुआ कि श्री सिंह चर्चित व्यक्तित्व बन गए। राजनीतिक हस्तक्षेप की इस कोशिश को बल मिला जब श्री सिंह ने विधानसभा के लगभग सभी गांवों में इन शादियों से पूर्व कंबल वितरण करवाया। उनके करीबी बताते हैं कि तकरीबन 50 ट्रक में हज़ारों कंबल वितरित किए गए जिसका असर ऐसा हुआ कि उन्हें राजनीतिक विकल्प के तौर पर देखा जाने लगा। चुनाव लड़ने और जीतने पर बात करते हुए रणवीर सिंह सेंगर बताते हैं,
“उमाशंकर सिंह अपने काम से लोकप्रिय होते गए। उनकी बनवाई सड़कें आज भी मिसाल के तौर पर ली जाती हैं। इसके अलावा वह क्षेत्र के लोगों और खासकर गरीब तबके को जरूरत के समय में सीधे आर्थिक मदद देते रहे हैं। अस्पताल से लेकर तीर्थटन के लिए ट्रेन-बसें भिजवाने का असर हुआ कि लोगों ने उनको विधायक बनाया”
विधानसभा रसड़ा में जातिगत फैक्टरों का जोर बीते दो चुनावों से धीमा होता चला गया है। उमाशंकर सिंह की छवि का इसमें बड़ा योगदान है। हालांकि यह विधानसभा 2012 से पूर्व आरक्षित रही है। आइये एक नज़र विधानसभा पर डाल लेते हैं।
क्या है रसड़ा विधानसभा की स्थिति
सन 1967 के बाद से 2012 तक जिले की रसड़ा विधनसभा आरक्षित रही है। साल 2012 के आंकड़ों के मुताबिक इस विधानसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओँ की संख्या 3 लाख 5 हजार 817 रही, जिसमें पुरुष मतदाताओँ की संख्या 1 लाख 69 हजार 246 जबकि महिला मतदाताओँ की संख्या 1 लाख 36 हजार 549 थी। कभी यह कम्युनिस्टों का गढ़ था जिसमें माकपा के राम रतन राम व रघुनाथ राम विधायर बने। जनता दल के घुरहू राम, कांग्रेस के मन्नू राम तथा रामवचन धुसिया तथा भाजपा के अनिल कुमार भी यहां से विधायक रहे हैं। आखिरी बार बसपा विधायक घूरा राम ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। ऐसे में यहां का लगभग सभी दलों को प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है। बावजूद इसके कुछ समस्याों ने रसड़ा को अपना घर बना लिया है। इसमें सबसे बड़ी समस्या है जल निकासी।
क्या है विधानसभा की सबसे मूल समस्या
जल निकासी और नाले में जमे पानी की समस्या 2012 के काफी पहले से बनी हुई है। जो अबतक वैसी ही है। आलम ये है कि रसड़ा के टोंस नदी, बसनहीं नाला और लकड़ा नाला के प्रशासनिक और राजनीतिक कुप्रबंधन से अभी तक एक दर्जन से अधिक गांव और 10 हज़ार बीघे से अधिक धान की फसल में पानी लगा हुआ है। सरायभारती रसड़ा का सबसे बड़ा गांव है। यहां के रहने वाले दिनेश कुमार के घर में अभी भी पानी लगा है। हमसे बातचीत में उन्होंने बताया,
“ हर साल का यही हाल है। पानी लगता ही है। आधा किलोमीटर के बंधा न बनने से यह परेशानी हमलोग न मालूम कितने साल से उठा रहे हैं और आगे उठाना पड़ेगा।”
स्थानीयों की मानें तो यही हाल चोंगड़ा-चिलकहर मार्ग का है। श्री सेंगर बताते हैं कि इस मार्ग पर तो मोटरसाइकल डूब जाएगी। उन्होंने बताया कि इस मार्ग पर अभी भी तकरीबन दो मीटर तक पानी लगा हुआ है। ऐसे में जनप्रिय छवि वाले लगातार दो बार के विधायक उमाशंकर सिंह के प्रबंधन पर भी सवाल उठना लाजमी है। स्थानीयों में अच्छी छवि वाले उमाशंकर सिंह से अभी भी जलजमाव से प्रभावित ग्रामीणों को उम्मीदे हैं। फिलहाल जलजमाव जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे रसड़ा में नगरपालिका को लेकर भी लोगों में रोष है।
बलिया खबर के पाठकों, ये है हमारा नया कार्यक्रम विधानसभा’वार । इस कार्यक्रम में हम जिले की सभी विधानसभाओं पर 2007 से लेकर अब तक के सभी चुनावों पर विस्तृत रिपोर्ट करेंगे। इसके माध्यम से तत्कालीन चुनावी परिस्थितियों, स्थानीय मुद्दों और विजयी प्रत्याशी के राजनीतिक जीवन का ब्योरा देंगे। आप अपने सुझाव balliakhabar@gmail.com पर भेज सकते हैं।
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बलिया BJP की इनसाइड स्टोरी! संगठन में पद की लड़ाई अश्लील वीडियो तक आई?
बलिया। बांसडीह में भाजपा से जुड़ी महिला कार्यकर्ता के निजी वीडियो के कथित प्रसार को लेकर दर्ज मुकदमे ने अब संगठन के भीतर चल रही कथित खींचतान की चर्चाओं को भी हवा दे दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या संगठन में पद और प्रभाव की लड़ाई का विवाद इतना बढ़ गया कि मामला निजी वीडियो तक जा पहुंचा? सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे प्रकरण के पीछे संगठन में पद पाने की कथित होड़ और आपसी राजनीतिक खींचतान का एंगल भी सामने आ रहा है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस जांच में ही वास्तविक तस्वीर साफ होगी।
क्या है पूरा मामला?: बांसडीह थाना क्षेत्र में भाजपा से जुड़ी एक महिला कार्यकर्ता ने पुलिस में शिकायत देकर आरोप लगाया कि उसका निजी वीडियो उसकी अनुमति के बिना प्रसारित किया जा रहा है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की है।
मामले में नामजद आरोपियों में भाजपा से जुड़े पदाधिकारियों के नाम होने की बात सामने आई है। महिला ने अपनी शिकायत में बताया है कि वीडियो कॉल के दौरान उसका निजी वीडियो बनाए जाने और बाद में उसके प्रसारित होने की जानकारी उसे बातचीत के दौरान मिली। शिकायतकर्ता ने पुलिस को संबंधित बातचीत के ऑडियो-वीडियो साक्ष्य उपलब्ध होने की बात भी कही है।
पद की कथित लड़ाई से जुड़ा दूसरा एंगल : सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे मामले की एक दूसरी तस्वीर भी सामने आ रही है। सूत्रों का दावा है कि संगठन में पद और जिम्मेदारी को लेकर कुछ लोगों के बीच कथित तौर पर अंदरूनी खींचतान चल रही थी। इसी खींचतान के बीच विवाद ने ऐसा रूप लिया कि कुछ लोगों ने कथित तौर पर एक-दूसरे को निशाने पर लेने और फंसाने के लिए मामले का फायदा उठाया।
सूत्रों का यह भी कहना है कि संगठनात्मक पद को लेकर चल रही प्रतिस्पर्धा के बीच व्यक्तिगत विवाद भी जुड़ता चला गया और आखिरकार मामला पुलिस तक पहुंच गया। हालांकि, यह दावा फिलहाल सूत्रों के हवाले से है। पुलिस जांच में इसकी पुष्टि होना बाकी है कि कथित संगठनात्मक खींचतान का इस मामले से वास्तव में कोई सीधा संबंध है या नहीं।
जिले से लेकर लखनऊ तक मामला पहुंचाने की होड़?: इस पूरे प्रकरण को लेकर सूत्र एक और महत्वपूर्ण दावा कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, जिले से जुड़े भाजपा के कुछ प्रभावशाली नेता कथित तौर पर मामले को दबाने की कोशिश में जुटे हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ नेता इस प्रकरण को लखनऊ तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
यानी एक तरफ मामले को स्थानीय स्तर पर संभालने और शांत कराने की कोशिश की चर्चा है, तो दूसरी तरफ इसे पार्टी के उच्च स्तर तक ले जाने की कवायद की बात सामने आ रही है। सूत्रों का दावा है कि इसके पीछे भी संगठन में पद और प्रभाव को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान एक वजह हो सकती है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज: मामले में भाजपा से जुड़े पदाधिकारियों के नाम सामने आने के बाद स्थानीय राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। पुलिस की जांच, डिजिटल साक्ष्य और शिकायतकर्ता की ओर से उपलब्ध कराए गए कथित वीडियो एवं अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।
फिलहाल बांसडीह पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि यह मामला केवल निजी वीडियो के कथित प्रसार का है या इसके पीछे संगठनात्मक पद की कथित लड़ाई, आपसी विवाद और राजनीतिक खींचतान की भी कोई भूमिका रही है।
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सिकंदरपुर की सियासत में नया चेहरा, कौन हैं संजीव कुमार तिवारी? बिजनेस से राजनीति तक कैसे पहुंचा सफर?
बलिया। सिकंदरपुर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में अब नए चेहरों की सक्रियता दिखाई देने लगी है। इसी बीच बिजनेस की दुनिया से राजनीति में कदम रखने वाले संजीव कुमार तिवारी का नाम भी चर्चा में है। कारोबारी पृष्ठभूमि से आने वाले संजीव कुमार तिवारी अब राजनीति के जरिए क्षेत्र की समस्याओं को उठाने और विकास की नई सोच के साथ आगे बढ़ने की बात कर रहे हैं।
राजनीति में आने की प्रेरणा कहां से मिली? बिजनेस से राजनीति तक आने का विचार कैसे बना? सिकंदरपुर विधानसभा को ही राजनीतिक कर्मभूमि बनाने के पीछे क्या वजह है? इन सवालों के साथ संजीव कुमार तिवारी अपने राजनीतिक सफर और भविष्य की योजनाओं को लेकर खुलकर बात करते हैं।
सिकंदरपुर की समस्याओं को लेकर उनकी प्राथमिकताओं में बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और युवाओं के लिए बेहतर अवसर जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। उनका मानना है कि क्षेत्र के विकास के लिए केवल सड़क और भवन निर्माण पर्याप्त नहीं है, बल्कि रोजगार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को भी विकास के केंद्र में रखना होगा।
बेरोजगारी और पलायन पर क्या है प्लान?
सिकंदरपुर समेत पूर्वांचल के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में युवाओं का रोजगार के लिए दूसरे शहरों की ओर पलायन लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है। संजीव कुमार तिवारी का कहना है कि युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है। उनका जोर युवाओं को कौशल, रोजगार और उद्यमिता से जोड़ने पर है।
शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर क्या सोच?
संजीव कुमार तिवारी क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर देते हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को बेहतर इलाज और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। विधायक बनने की स्थिति में इन दोनों क्षेत्रों को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करने की बात वह कहते हैं।
क्या पुराने नेताओं से क्षेत्र के साथ न्याय नहीं हुआ?
राजनीति में नए चेहरे के तौर पर सामने आ रहे संजीव कुमार तिवारी से जब यह सवाल पूछा जाता है कि क्या अब तक के जनप्रतिनिधि क्षेत्र के साथ न्याय नहीं कर पाए, तो उनका फोकस आरोप लगाने के बजाय भविष्य की राजनीति पर दिखाई देता है। उनका कहना है कि जनता अब सिर्फ वादे नहीं, बल्कि काम का स्पष्ट रोडमैप चाहती है।
विधायक बने तो पहले 100 दिन में क्या करेंगे?
संजीव कुमार तिवारी के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि अगर उन्हें जनता का समर्थन मिलता है तो सत्ता संभालने के शुरुआती 100 दिनों में उनकी प्राथमिकता क्या होगी। उनका कहना है कि क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं की पहचान, विभागवार समीक्षा और जनता से सीधे संवाद के जरिए प्राथमिकता तय की जाएगी।
क्या होगा विकास मॉडल?
संजीव कुमार तिवारी अपने विकास मॉडल को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, किसानों की समस्याओं और युवाओं के अवसरों से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि सिकंदरपुर का विकास किसी एक वर्ग या इलाके तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विधानसभा के हर गांव और हर तबके तक विकास की पहुंच होनी चाहिए।
क्या चुनाव पैसे और जाति से जीते जाते हैं?
राजनीति में सबसे कठिन सवालों में से एक चुनाव में पैसे और जातीय समीकरण की भूमिका को लेकर भी है। संजीव कुमार तिवारी का मानना है कि चुनाव में जातीय और आर्थिक समीकरण अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन अंततः जनता का भरोसा सबसे बड़ी ताकत है। वह विकास और साफ छवि को अपनी राजनीतिक पूंजी के तौर पर पेश करते हैं।
जीतने के बाद बदल जाएंगे?
नए राजनीतिक चेहरे के सामने जनता का एक बड़ा सवाल यह भी होता है कि चुनाव से पहले किए गए वादे सत्ता में आने के बाद कितने पूरे होंगे। संजीव कुमार तिवारी का कहना है कि राजनीति में आने का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जनता के बीच लगातार उपलब्ध रहना और अपने काम का हिसाब देना होना चाहिए।
राजनीतिक अनुभव नहीं, फिर भरोसा क्यों?
बिना लंबे राजनीतिक अनुभव के चुनावी मैदान में उतरने को लेकर भी संजीव कुमार तिवारी से सवाल उठता है। उनका जवाब है कि राजनीति में अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता की समस्याओं को समझने की इच्छा, ईमानदारी और काम करने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है। उनका दावा है कि कारोबारी जीवन से मिले अनुभव को वह क्षेत्र के विकास में इस्तेमाल करना चाहते हैं।
टिकट नहीं मिला तो क्या करेंगे?
संजीव कुमार तिवारी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का एक और अहम सवाल टिकट को लेकर है। यदि उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो उनकी अगली रणनीति क्या होगी? इस सवाल का जवाब ही यह तय करेगा कि उनकी राजनीति केवल चुनाव तक सीमित है या वह लंबे समय के लिए सक्रिय राजनीति में उतर चुके हैं।
क्या बलिया सदर पर भी नजर?
सिकंदरपुर से दावेदारी के बीच बलिया सदर सीट को लेकर भी उनसे सवाल किया गया। हालांकि उनकी मौजूदा राजनीतिक सक्रियता का केंद्र सिकंदरपुर दिखाई देता है, लेकिन भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं, इस पर भी नजर रहेगी।
मौजूदा विधायक के काम को कैसे देखते हैं?
मौजूदा विधायक के काम को लेकर संजीव कुमार तिवारी का आकलन भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनका कहना है कि जनता को जनप्रतिनिधि के काम का मूल्यांकन विकास और उपलब्धियों के आधार पर करना चाहिए। आने वाले चुनाव में जनता के सामने अपने-अपने काम और विजन के साथ विकल्प होंगे।
परिवार का कितना मिला साथ?
राजनीति में कदम रखने के फैसले में परिवार की भूमिका को भी संजीव कुमार तिवारी महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि सार्वजनिक जीवन आसान नहीं होता और परिवार का सहयोग राजनीतिक सफर को मजबूती देता है।
राजनीति में आने के बाद क्या बदला?
बिजनेस से राजनीति में आने के बाद संजीव कुमार तिवारी के लिए सबसे बड़ा बदलाव लोगों के बीच लगातार रहना और उनकी समस्याओं को करीब से समझना रहा है। अब उनका कहना है कि राजनीति उनके लिए केवल पद हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्र के लिए काम करने का जरिया है।
युवाओं के नाम संदेश
युवाओं को लेकर संजीव कुमार तिवारी का संदेश है कि युवा राजनीति और समाज से दूरी बनाने के बजाय अपनी जिम्मेदारी समझें और बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा बनें। उनका मानना है कि क्षेत्र के भविष्य का सबसे बड़ा आधार युवा शक्ति है।
एक लाइन में क्यों जीतेंगे?
जब उनसे पूछा गया कि आखिर जनता उन्हें ही क्यों चुने, तो उनका जवाब विकास, बदलाव और जनता से सीधे जुड़ाव के इर्द-गिर्द है। संजीव कुमार तिवारी खुद को एक ऐसे नए राजनीतिक विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं, जो बिजनेस की दुनिया से निकलकर अब सिकंदरपुर की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि संजीव कुमार तिवारी की यह राजनीतिक पारी कितनी लंबी चलती है और सिकंदरपुर की जनता उनके विजन और दावेदारी को किस नजर से देखती है।
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मेजर ध्यानचंद जयंती पर जमुना राम मेमोरियल स्कूल में खेल सप्ताह का आगाज, कबड्डी में खिलाड़ियों ने दिखाया दमखम
चितबड़ागांव (बलिया)। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती के उपलक्ष्य में जमुना राम मेमोरियल स्कूल, चितबड़ागांव में 29 अगस्त से खेल-कूद सप्ताह का भव्य शुभारंभ हुआ। आयोजन के तहत विद्यालय के चारों हाउस—रेड, ग्रीन, ब्लू और येलो—के बालक एवं बालिका वर्ग के बीच कबड्डी प्रतियोगिता कराई गई।
बालिका वर्ग में ग्रीन हाउस ने रेड हाउस को 12-10 के रोमांचक मुकाबले में हराया, जबकि येलो हाउस ने ब्लू हाउस को 20-15 से शिकस्त दी। बालिका वर्ग का खिताबी मुकाबला अगले दिन खेला जाएगा।
वहीं, बालक वर्ग में ब्लू हाउस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए येलो हाउस को 15-8 के अंतर से हराकर जीत दर्ज की। मुकाबलों के दौरान खिलाड़ियों ने जोश, अनुशासन और टीम भावना का शानदार प्रदर्शन किया।

इस अवसर पर विद्यालय के प्रबंध निदेशक इंजीनियर तुषारनंद ने कहा कि मेजर ध्यानचंद का जीवन अनुशासन, समर्पण और देशप्रेम की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि खेल केवल हार-जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण और टीम भावना विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

प्रधानाचार्य अजीत कुमार सिंह ने कहा कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के साथ खेलकूद भी बेहद जरूरी है। ऐसे आयोजनों से बच्चों की प्रतिभा को निखरने का अवसर मिलता है।
कार्यक्रम के दौरान इंचार्ज अरविंद चौबे, इंचार्ज नीतू मिश्रा और हैंडबॉल प्रशिक्षक मनोज कुमार पाण्डेय ने खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं।


