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जयंती विशेष: ‘चंद्रशेखर को और मौके मिलते तो वो सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में होते’

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देश के 11वें प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर का जन्म 17 अप्रैल 1927 को बलिया जिले में इब्राहिम पट्टी गांव में हुआ था.
आज पूर्व प्रधानमंत्री और समाजवादी नेता चंद्रशेखर के 96 वें जन्मदिन पर राष्‍ट्र ने उन्‍हें याद किया और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की.

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ में सामयिक इतिहास ने न्याय नहीं किया. लगभग डेढ़ साल पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का संस्मरण आया था जिसमें उन्होंने लिखा था अगर चंद्रशेखर को और मौका मिला होता तो वो देश के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से एक साबित हुए होते.

जब वेंकटरमन भारत के राष्ट्रपति थे और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने भी कहा कि चंद्रशेखर के पास अगर बहुमत होता तो बेहतर होता. क्योंकि एक तरफ वो अयोध्या में हल निकालने की कोशिश कर रहे थे तो दूसरी तरफ सिख समस्या को सुलझाने की कोशिशों में लगे थे. कश्मीर में सकारात्मक कदम उठाए जा रहे थे. असम में चुनाव कराए गए.

सिर्फ चार महीने की सरकार इतने बड़े काम लेकर निर्णायक रूप से आगे बढ़ रही थी और यही कांग्रेस को अखर रहा था. चंद्रशेखर सफलता की ओर और ज्यादा न बढ़ें इसलिए कांग्रेस ने सरकार को गिरा दिया. जबकि इस वादे के साथ चंद्रशेखर शपथ ली थी कि कम से कम एक साल तक सरकार को चलने दिया जाएगा.

कांग्रेस के डरने के पीछे भी अहम कारण थे. दरअसल चंद्रशेखर का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था. एक प्रसंग है.

चंद्रशेखर ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को कहा था हिमालयन ब्लंडर

जब देश में ऑपरेशन ब्लूस्टार हुआ तो वह अकेले राजनेता थे जिन्होंने कहा था कि ये हिमालयन ब्लंडर है. देश को इसकी भारी कीमत चुकानी होगी. उन्होंने ऐसा कहने के पीछे कारण भी बताया. दरअसल वो इमरजेंसी के दौरान लंबे समय तक पटियाला जेल में बंद रखे गए, वो भी तन्हाई में.

कम लोगों को पता होगा कि तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने जॉर्ज फर्नांडिस के बाद अगर किसी को सबसे लंबे समय तक जेल में रखा था तो वो चंद्रशेखर ही थे. उन्होंने बताया था कि इसी दौरान उन्होंने सिख इतिहास और पंजाब का इतिहास पढ़ा. और उसी इतिहास के अनुभव पर वो बोले कि मैं कह रहा हूं कि स्वर्ण मंदिर में हुई कार्रवाई का बहुत खराब असर पड़ने वाला है. दुर्भाग्य से कुछ दिनों बाद इंदिरा गांधी की हत्या हो गई. उसके बाद देशभर में दंगे हुए.

इसके बाद खास तौर पर अरुण नेहरू ने कमान संभाली कि कैसे चंद्रशेखर को चुनाव हराना है. वो बलिया भी गए और कुछ अपने चुनिंदा पुलिस अधिकारियों के जरिए इस बात का भी इंतजाम कराया कि चंद्रशेखरजी को हराया जाए. जब लोकसभा चुनावों की घोषणा हो गई तो चंद्रशेखर बलिया गए. वो ट्रेन से स्टेशन पर जैसे ही उतरे तो अचानक कांग्रेसियों की प्रायोजित भीड़ ने उन्हें घेरकर नारे लगाने शुरू कर दिए कि बलिया के भिंडरावाले वापस जाओ और भिंडरावाले की थैली लाए हैं चुनाव में हराएंगे. चंद्रशेखर उतरे और वहीं पर खड़े हो गए तो नारा लगाने वाले सारे लोग स्तब्ध हो गए.

उन्होंने जो कहा वो आज के राजनेताओं के लिए एक सबक है. उन्होंने कहा, ‘भारत और पंजाब का इतिहास मैंने पढ़ा है और हां, मैने कहा है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार भारत के इतिहास में हिमालयन ब्लंडर है. मैंने ये देशहित के लिए कहा है. चुनाव तो आते-जाते रहते हैं. और मैं तो इतिहास का मामूली कॉमा या फुल स्टॉप भी नहीं हूं. दुनिया में बड़े-बड़े लोग आएंगे-जाएंगे लेकिन जो सच हो वो बोलना चाहिए. जिन लोगों को मेरी ये बात खराब लगे मुझे उन लोगों के वोट नहीं चाहिए. चुनाव जीतने के लिए मैं अपने मत नहीं बदलता.’

चंद्रशेखर ने इंदिरा से कहा था पूरे करें वादे 

ऐसे और भी बहुत सारे प्रसंग है. बलिया के मामूली परिवार से निकले चंद्रशेखर देश की राजनीति में जब तक रहे निर्णायक रूप से उन्होंने अपनी जगह बनाई. इंदिरा गांधी की इच्छा के खिलाफ 1972 में शिमला में उन्होंने कांग्रेस वर्किंग कमेटी का चुनाव जीता. फिर इंदिरा गांधी को उनकी लोकप्रियता देखकर उन्हें कांग्रेस वर्किंग कमेटी में रखना पड़ा. और वो पहली आवाज थे जिन्होंने इंदिरा गांधी को चेताया कि हमने जो वायदे किए 71 के चुनाव में, जीतने के बाद पहले हमें उनको पूरा करना चाहिए.

ये ऐतिहासिक तथ्य है कि इंदिरा गांधी के बाद उन दिनों कांग्रेस में जो नेता चुनाव प्रचार की दृष्टि से जो सबसे पॉपुलर नेता थे तो वो चंद्रशेखर ही थे. इसीलिए इंदिरा गांधी ने चंद्रशेखर से कहा कि आप राज्यसभा में ही रहिए क्योंकि आप चुनाव लड़ेंगे तो लड़ाएगा कौन?

जब चुनाव में भारी कामयाबी मिल गई तो चंद्रशेखर ने इंदिरा गांधी से कहा कि आप वायदों को पूरा कीजिए नहीं तो देश में असंतोष होगा. जब बिहार आंदोलन खड़ा हुआ तो चंद्रशेखर ने कहा कि जयप्रकाश जी को मलीन न करें आप. वह ऋषितुल्य नेता हैं. उन्होंने देश से कुछ लिया नहीं है, दिया ही है. अगर राजसत्ता संतसत्ता से टकराएगी तो आगे नहीं बढ़ पाएगी. ये उन्होंने एडिटोरियल लिखा और कांग्रेस वर्किंग कमेटी जो उन दिनों नरौरा में मिल रही थी उसके बीच बहस का विषय रहा. वहां पर उसको लेकर काफी चर्चा हुई.

चंद्रशेखर ने की थी जेपी और इंदिरा में समझौता कराने की कोशिश 

उन्हीं दिनों मध्य प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता डीपी मिश्र, जो कांग्रेस के चाणक्य कहे जाते थे, उन्होंने चंद्रशेखर को देखा तो बाकी कांग्रेसियों से कहा कि इस आदमी से सावधान रहना क्योंकि इसे कुछ चाहिए नहीं. ये खरी बातें करता है. और चंद्रशेखर से कहा जिसकी पीठ पर कोई बोझ न हो वो ही तुम्हारी तरह हो सकता है. तुम बेलौस बोल रहे हो. लोग ध्यान नहीं देंगे तो इतिहास पलट जाएगा.

फिर उनकी बात सही साबित हुई. चंद्रशेखर के कहे अनुसार बिहार आंदोलन बढ़ता गया. उनकी कोशिश थी कि इंदिरा और जेपी में समझौता हो लेकिन इंदिरा गांधी के आस-पास ऐसे लोग थे जिन्होंने ऐसा नहीं होने दिया. फिर आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस सत्ता से हटी.

व्यक्तिगत राग द्वेष से दूर रहने वाले राजनेता

एक और अंतिम प्रसंग है. कांग्रेस जब सत्ता से हट गई तो इंदिरा गांधी ने तो बहुत कोशिश की कि चंद्रशेखर फिर से कांग्रेस में आ जाएं लेकिन फिर चंद्रशेखर जी ने मना कर दिया. उन्होंने कहा, ‘मैं किस तरह वापस आऊं. मैंने तो कांग्रेस नहीं छोड़ी थी. मेरे वापस आने का मतलब होगा कि मैं गलत था. लेकिन जब वो चुनाव जीत कर आए तो इंदिरा गांधी के लिए उनके मन में कोई मैल नहीं था.’

जब मोरारजी की सरकार में जब चरण सिंह ने यह तय किया कि इंदिरा का सरकारी आवास खाली कराया जाए तो चंद्रशेखर ने इसका विरोध किया. उन्होंने कहा ये गलत काम नहीं होना चाहिए. वो इंदिरा गांधी से मिले और उन्हें आश्वस्त किया.

वो व्यक्तिगत राग द्वेष से दूर रहने वाले राजनेता थे. देश के बारे में सोचा करते थे. इसलिए लोग उन्हें सुनते भी थे. जब वो संसद में खड़े होते थे बोलने के लिए पक्ष-विपक्ष के सभी लोग उन्हें आदर के साथ सुनते थे. चंद्रशेखर जी का जाना इस देश की राजनीति से साहस की विदाई है. वैसा कोई नेता अभी दिखाई नहीं देता जो पद और राजनीति की चिंता छोड़कर सच कह सके.

चंद्रशेखर के पुत्र एवं राज्यसभा सांसद नीरज शेखर ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री ने हमेशा शोषित एवं वंचित तबके के लिए आवाज उठायी और सामाजिक बदलाव की नीतियों को प्राथमिकता दी. देश उनके योगदान को सदा याद रखेगा.
(यह लेख पूर्व में छप चुका है)
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2027 में रसड़ा की सियासत कैसी होगी? सर्वे में सामने आए आंकड़े

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बलिया: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बलिया ख़बर की ओर से कराए गए ऑनलाइन विधानसभा सर्वे में रसड़ा सीट को लेकर प्रतिभागियों की राय सामने आई है। सर्वे में पूर्व विधायक उमाशंकर सिंह के कार्यकाल के कामकाज की रेटिंग, उनके पुत्र उकेश सिंह को राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने का अवसर देने, पसंदीदा राजनीतिक दल और विभिन्न पार्टियों के संभावित उम्मीदवारों को लेकर सवाल पूछे गए।

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे में उमाशंकर सिंह के कार्यकाल के कामकाज की औसत रेटिंग 10 में से 7.40 दर्ज की गई। वहीं, जब प्रतिभागियों से पूछा गया कि क्या 2027 में उकेश सिंह को अपने पिता की राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने का मौका मिलना चाहिए, तो 50.9 प्रतिशत ने इसके पक्ष में राय दी। 39.1 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें मौका नहीं मिलना चाहिए, जबकि 10 प्रतिशत प्रतिभागियों ने ‘पता नहीं’ का विकल्प चुना।

उमाशंकर सिंह के कार्यकाल को मिले 7.40 अंक

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे में प्रतिभागियों से उमाशंकर सिंह के कार्यकाल के दौरान कामकाज को 1 से 10 के बीच अंक देने के लिए कहा गया। इस सवाल पर औसत रेटिंग 7.40/10 रही।

यह रेटिंग सर्वे में भाग लेने वाले प्रतिभागियों द्वारा दिए गए अंकों का औसत है।

उकेश सिंह को राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने का मौका देने पर क्या राय?

सर्वे में पूछा गया कि क्या 2027 में उकेश सिंह को अपने पिता की राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने का मौका मिलना चाहिए। इस सवाल पर प्रतिभागियों की राय इस प्रकार रही

आंकड़ों के अनुसार, 50.9 प्रतिशत प्रतिभागियों ने उकेश सिंह को मौका देने के पक्ष में जवाब दिया, जबकि 39.1 प्रतिशत ने इसके विपरीत राय रखी। दोनों विकल्पों के बीच 11.8 प्रतिशत अंकों का अंतर रहा।

पार्टी की पसंद में बसपा 34.2%, सपा 32.1%

2027 में रसड़ा विधानसभा क्षेत्र से किस पार्टी का विधायक होना चाहिए, इस सवाल पर बहुजन समाज पार्टी को 34.2 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। समाजवादी पार्टी को 32.1 प्रतिशत और बीजेपी को 25.4 प्रतिशत समर्थन मिला।

सपा में महेंद्र चौहान को 26.2% समर्थन

समाजवादी पार्टी से संभावित उम्मीदवारों की पहली पसंद पूछे जाने पर 33.5 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य नेताओं का विकल्प चुना। महेंद्र चौहान को 26.2 प्रतिशत, आदित्य गर्ग को 21.9 प्रतिशत और मान सिंह सेंगर को 18.4 प्रतिशत समर्थन मिला।

बीजेपी में राम इकबाल सिंह और महंत कौशलेन्द्र गिरी को लगभग बराबर समर्थन

बीजेपी के संभावित उम्मीदवारों के सवाल पर राम इकबाल सिंह को 32.2 प्रतिशत और महंत कौशलेन्द्र गिरी को 31.9 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। हिमांशु प्रताप सिंह को 19.7 प्रतिशत और प्रवीण सिंह को 13.2 प्रतिशत समर्थन मिला।


दोनों प्रमुख नामों के बीच 0.3 प्रतिशत अंकों का अंतर रहा।

बसपा में प्रिंस उकेश सिंह को 78.3% प्रतिभागियों की पसंद

बलिया ख़बर के ऑनलाइन विधानसभा सर्वे 2027 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से संभावित दावेदारों को लेकर पूछे गए सवाल पर प्रिंस उकेश सिंह को 78.3 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अपनी पसंद बताया। वहीं, 21.7 प्रतिशत प्रतिभागियों ने किसी अन्य दावेदार का विकल्प चुना।

सुभासपा में शिवेंद्र बहादुर सिंह को 31.9% प्रतिभागियों ने चुना

बलिया ख़बर के ऑनलाइन विधानसभा सर्वे 2027 में रसड़ा सीट पर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के संभावित दावेदारों को लेकर पूछे गए सवाल पर शिवेंद्र बहादुर सिंह को 31.9 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अपनी पहली पसंद बताया। वहीं, 68.1 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य नेताओं का विकल्प चुना।

कांग्रेस में ओम लता को 74.1% प्रतिभागियों ने चुना

बलिया ख़बर के ऑनलाइन विधानसभा सर्वे 2027 में रसड़ा सीट पर कांग्रेस के संभावित दावेदारों को लेकर पूछे गए सवाल पर ओम लता को 74.1 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अपनी पहली पसंद बताया।

सर्वे के नतीजों में क्या तस्वीर सामने आई?

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे में उमाशंकर सिंह के कार्यकाल की औसत रेटिंग 7.40/10 दर्ज हुई। उनके पुत्र उकेश सिंह को राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने का मौका देने के सवाल पर 50.9 प्रतिशत प्रतिभागियों ने समर्थन किया, जबकि 39.1 प्रतिशत ने इसका विरोध किया।

पार्टी की पसंद के सवाल पर बसपा को 34.2 प्रतिशत, सपा को 32.1 प्रतिशत और बीजेपी को 25.4 प्रतिशत समर्थन मिला। सपा के संभावित उम्मीदवारों में महेंद्र चौहान और बीजेपी में राम इकबाल सिंह तथा महंत कौशलेन्द्र गिरी को लेकर प्रतिभागियों की पसंद के आंकड़े भी सामने आए।

सर्वे के बारे में जरूरी जानकारी

यह सर्वे बलिया ख़बर की ओर से ऑनलाइन माध्यम से कराया गया था। इसके नतीजे सर्वे में शामिल प्रतिभागियों की राय पर आधारित हैं।  इन नतीजों को पूरी रसड़ा विधानसभा के सभी मतदाताओं की राय का प्रतिनिधि निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

 

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बेल्थरा रोड में टिकट से लेकर पार्टी तक, किसे पसंद कर रहे लोग? ऑनलाइन सर्वे में सामने आए चौकाने वालेआंकड़े

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बलिया। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बलिया ख़बर की ओर से कराए गए ऑनलाइन विधानसभा सर्वे में बेल्थरा रोड सीट को लेकर प्रतिभागियों की राय सामने आई है। सर्वे में मौजूदा विधायक हंसू राम के कामकाज की रेटिंग, उन्हें दोबारा टिकट देने की पसंद, अगला विधायक किस पार्टी से हो और विभिन्न राजनीतिक दलों में संभावित उम्मीदवारों की पहली पसंद को लेकर सवाल पूछे गए।

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, विधायक हंसू राम को उनके कामकाज के लिए औसतन 10 में से 3.43 अंक मिले। वहीं, दोबारा टिकट देने के सवाल पर 71.7 प्रतिशत प्रतिभागियों ने ‘नहीं’ कहा। पार्टी की पसंद के सवाल पर बीजेपी 39.8 प्रतिशत के साथ पहले और समाजवादी पार्टी 36.2 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रही।

1. विधायक हंसू राम के कामकाज की औसत रेटिंग 3.43

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे में प्रतिभागियों से पूछा गया कि वे अपने विधायक हंसू राम के काम को 1 से 10 के बीच कितने अंक देंगे। इस सवाल पर औसत रेटिंग 3.43 दर्ज की गई।

आंकड़ों के अनुसार, दोबारा टिकट देने के सवाल पर ‘नहीं’ कहने वाले प्रतिभागियों का प्रतिशत सबसे अधिक रहा। यह नतीजा ऑनलाइन सर्वे में शामिल लोगों की राय को दर्शाता है।

2. 2027 में किस पार्टी का विधायक चाहते हैं ?

अगले विधानसभा चुनाव में किस पार्टी का विधायक बनना चाहिए, इस सवाल पर बीजेपी को सबसे अधिक 39.8 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। समाजवादी पार्टी 36.2 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रही।


पार्टी की पसंद के आंकड़ों में बीजेपी और सपा के बीच 3 प्रतिशत अंकों का अंतर दिखाई देता है। हालांकि, ये आंकड़े सर्वे में भाग लेने वाले प्रतिभागियों की पसंद पर आधारित हैं, न कि चुनाव परिणाम का अनुमान।

3. सुभासपा में प्रवीण प्रकाश पहली पसंद

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) से कौन-सा नेता पहली पसंद है, इस सवाल पर प्रवीण प्रकाश को 54.2 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। मौजूदा विधायक हंसू राम को 25 प्रतिशत समर्थन मिला, जबकि 20.8 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य नेताओं का विकल्प चुना।


इस सवाल के आंकड़ों में प्रवीण प्रकाश को हंसू राम से 29.2 प्रतिशत अंक अधिक मिले।

4. बीजेपी में धनंजय कनौजिया को 34.4% समर्थन

बीजेपी से संभावित उम्मीदवार के सवाल पर धनंजय कनौजिया को 34.4 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अपनी पहली पसंद बताया। जबकि छठू राम को 21.9 प्रतिशत समर्थन मिला। गोरख पासवान को 18.8 और रीना राव को 15.5 प्रतिशत, 9.4 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य नेताओं को चुना।


बीजेपी के विकल्पों में धनंजय कनौजिया को सबसे अधिक समर्थन मिला। वहीं, अन्य नेताओं के विकल्प को चुनने वाले प्रतिभागियों का प्रतिशत भी 9.4 रहा।

5. समाजवादी पार्टी में राजेश पासवान को 35 .5% समर्थन

समाजवादी पार्टी से पहली पसंद के सवाल पर राजेश पासवान को 35.5 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। वहीं, संतोष गर्ग को 20.9 प्रतिशत ने अपनी पसंद बताया।

सपा के आंकड़ों में नामित नेताओं में राजेश पासवान को सबसे ज्यादा समर्थन मिला। अन्य नेताओं का विकल्प 35.7 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहा

6. बसपा में अनुज कुमार भारती को 26.9% समर्थन

बहुजन समाज पार्टी से पहली पसंद के सवाल पर उपलब्ध आंकड़ों में अनुज कुमार भारती को 26.9 प्रतिशत और संतोष कुमार को 7.7 प्रतिशत प्रतिभागियों ने चुना। वहीं, 42.3 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य विकल्प को प्राथमिकता दी।


इस सवाल के उपलब्ध आंकड़ों में शेष विकल्पों का पूरा विवरण नहीं है, इसलिए उनकी जानकारी अलग से नहीं जोड़ी गई है।

7. कांग्रेस में 69.2% ने चुना अन्य नेताओं का विकल्प

कांग्रेस पार्टी से पहली पसंद के सवाल पर 69.2 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अन्य नेताओं का विकल्प चुना। पारस वर्मा और अखिलेश कनौजिया को 15.4-15.4 प्रतिशत समर्थन मिला।


कांग्रेस के आंकड़ों में किसी एक नामित नेता के बजाय अन्य नेताओं के विकल्प को सबसे अधिक प्रतिभागियों ने चुना।

बेल्थरा रोड में टिकट और पार्टी की पसंद पर क्या कहते हैं आंकड़े?

बलिया ख़बर के ऑनलाइन सर्वे में तीन प्रमुख पहलू सामने आए हैं। पहला, मौजूदा विधायक हंसू राम के कामकाज की औसत रेटिंग 3.43 रही। दूसरा, 71.7 प्रतिशत प्रतिभागियों ने उन्हें दोबारा टिकट देने के पक्ष में राय नहीं दी। तीसरा, पार्टी की पसंद के सवाल पर बीजेपी को 39.8 प्रतिशत और सपा को 36.2 प्रतिशत समर्थन मिला।

उम्मीदवारों की पसंद के सवाल पर सुभासपा में प्रवीण प्रकाश, बीजेपी में धनंजय कनौजिया और सपा में राजेश पासवान को नामित विकल्पों में सबसे अधिक समर्थन मिला। बसपा और कांग्रेस के सवालों में अन्य नेताओं के विकल्प को चुनने वालों का प्रतिशत भी उल्लेखनीय रहा।

सर्वे के बारे में जरूरी जानकारी

यह सर्वे बलिया ख़बर द्वारा ऑनलाइन माध्यम से कराया गया था। ऊपर दिए गए प्रतिशत सर्वे में शामिल प्रतिभागियों के जवाबों पर आधारित हैं।  इन नतीजों को पूरी बेल्थरा रोड विधानसभा के सभी मतदाताओं की राय का प्रतिनिधि सर्वे नहीं माना जाना चाहिए। ये आंकड़े सर्वे में भाग लेने वाले लोगों की पसंद और राय को सामने रखते हैं।

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राम गोविंद चौधरी की विरासत संभालने को तैयार रंजीत चौधरी, फिर उन्हें कमतर दिखाने की कोशिश क्यों?

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बलिया। समाजवादी राजनीति में राम गोविंद चौधरी की पहचान और उनके लंबे राजनीतिक अनुभव की अपनी अहमियत रही है। अब उनके बेटे रंजीत चौधरी को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। वह अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं, लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या उन्हें आगे बढ़ने का पर्याप्त अवसर मिल रहा है या फिर उनके अपने ही राजनीतिक खेमे के कुछ लोग उन्हें कमतर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं?

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राम गोविंद चौधरी के परिवार का पूरा ख्याल रखने की बात कही है। ऐसे में पार्टी के भीतर रंजीत चौधरी की भूमिका और उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं स्वाभाविक हैं। अखिलेश यादव का यह आश्वासन राम गोविंद चौधरी के परिवार के प्रति पार्टी के रुख को दर्शाता है, लेकिन अब सवाल यह है कि इस भरोसे का जमीन पर कितना असर दिखाई देता है और रंजीत चौधरी को संगठन में किस तरह की भूमिका मिलती है।

राम गोविंद चौधरी की राजनीतिक विरासत केवल पारिवारिक पहचान तक सीमित नहीं है। इसमें उनका लंबा राजनीतिक संघर्ष समाजवादी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता और जनता के बीच बनाया गया आधार शामिल है। रंजीत चौधरी के सामने इस विरासत को आगे बढ़ाने के साथ अपनी अलग राजनीतिक पहचान स्थापित करने की चुनौती भी है।

राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि रंजीत चौधरी को लेकर कुछ लोग उन्हें अपेक्षित महत्व देने के बजाय उनकी भूमिका को सीमित करके पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। मीडिया में उनकी राजनीतिक हैसियत और सक्रियता को किस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, इस तरह की चर्चाओं के पीछे किन लोगों की भूमिका है, इसे लेकर कोई ठोस तथ्य सामने आना जरूरी है।

राजनीतिक दलों में नए नेतृत्व को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संगठन की भी होती है। यदि पार्टी नेतृत्व किसी वरिष्ठ नेता के परिवार के साथ खड़े रहने का भरोसा देता है, तो उस भरोसे को व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। रंजीत चौधरी को अपनी क्षमता साबित करने का अवसर देना और संगठन में उनकी भूमिका स्पष्ट करना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

अब निगाहें समाजवादी पार्टी के नेतृत्व पर हैं। अखिलेश यादव ने राम गोविंद चौधरी के परिवार का पूरा ख्याल रखने की बात कही है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रंजीत चौधरी को अपने पिता की राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने के लिए किस तरह का अवसर मिलता है। आखिरकार, विरासत को सम्मान देना केवल आश्वासन देने से नहीं, बल्कि योग्य अवसर और जिम्मेदारी देने से भी जुड़ा होता है।

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