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रवीश का ब्लॉग: ट्विटर तो ख़रीद लिया मस्क ने, बलिया के पत्रकारों सा हौसला कहां से लाएंगे?
बीते दिन दो खबरें मीडिया की सुर्खियों रहीं। एलन मस्क ने ट्विटर की खरीद लिया है तो वहीं कल बलिया पेपर लीक मामले में जेल गए निर्दोष पत्रकारों की रिहाई हो गई। इस मुद्दे पर NDTV की बेवसाइट पर वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने अपने विचार साझा किए हैं। आप भी पढ़िए उनका ब्लॉग।
जब कोई कंपनी आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ठेका लेने लगे और गारंटी देने लगे, तो थोड़ा सतर्क हो जाने में कोई बुराई नहीं है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एडिट बटन की स्वतंत्रता देकर वाहवाही लूटने वाली वही कंपनियां अपने पास अलगोरिद्म का अधिकार रखती हैं, जिसकी मदद से किस सूचना या विचार को सब तक पहुंचाना है और गायब कर देना है, इसका खेल खेला जाता है. फेसबुक, व्हाट्स एप से लेकर हम ट्विटर के मामले में यह खेल देख चुके हैं.
एलन मस्क ने ट्विटर को साबुन के भाव में खरीद लिया, इसे लेकर न तो आशंकित होने की ज़रूरत है और न उत्साहित. क्योंकि मौजूदा मालिकों के हाथ में सोशल मीडिया का यह प्लेटफार्म किस तरह से किसी का खाता बंद कर देते हैं, किसी के विचारों को पहुंचने नहीं देते हैं,आप देख कर अनदेखा कर भी चुके हैं. चूंकि, दुनिया के सबसे धनिक एलन मस्क अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नए गारंटर बनकर घूम रहे हैं, तब ऐसे में इस गारंटी की समीक्षा कर लेनी चाहिए. बेशक एलन मस्क ट्विटर पर आरोप लगा रहे हैं कि यहां आवाज दबाई गई और वह सही भी है लेकिन आवाज़ नहीं दबाई जाएगी, इसकी गारंटी जब देने लगे, तब थोड़ा सा सतर्क रहिए. लेकिन यह जो खरीद बिक्री हो रही है उस पर नज़र ज़रूर रखनी चाहिए.
आपको याद होगा, जब पराग अग्रवाल को सीईओ बनाया गया था, तब भारत के खास तबके में ज़बरदस्त उत्साह था कि भारत के अग्रवाल अमरीकी कंपनी के सीईओ बन गए. फिर चारों तरफ रिपोर्ट छपने लगी कि कहां-कहां भारतीय सीईओ बन गए. अब वहीं तबका एलन मस्क को लेकर उत्साहित है कि ट्विटर को खरीद लिया. इन दोनों घटनाओं में एक बात आप चाहें तो देख सकते हैं कि तबका वही है, उसे हर घटना से उत्साहित होने का मौक़ा चाहिए ताकि वह जोक्स बना सके, गर्व कर सके, इन बदलावों के पीछे एक प्लेटफार्म अभिव्यक्ति का किस तरह से धंधा करता है, इससे जुड़े मुश्किल सवालों से किसी को मतलब नहीं रहता है.
पराग अग्रवाल का कोई घाटा नहीं होगा, उन्हें भी कई मिलियन डॉलर मिलने की चर्चा से लोग बाग़ खुश हैं, लेकिन ख़ुशी के इस ज्वार-भाटा में वाकई हम लोकतंत्र और अभिव्यक्ति के इन नए मंचों की भूमिका के बारे में सोचने के लिए हमारे पास धीरज बचा है? क्या आप जानते हैं कि इन्हीं कंपनियों की टेक्नालजी ने आपके भीतर के धीरज को ख़त्म भी कर दिया है? जब तक आप यह नहीं जानेंगे ट्विटर और लोकतंत्र में उसके खटर-पटर को लेकर कैसे विचार करेंगे?
एलन मस्क अपनी टेस्ला बेचने के लिए क्या किसी सरकार से पंगा लेंगे, उसकी शर्तों को ठुकरा देंगे कि कार अपनी जगह है, सरकार अपनी जगह है. लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपनी जगह है? मस्क मसीहा नहीं हैं और न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी मसीहा देगा. यह गारंटी आपके या किसी भी देश में संविधान से आती है, उसके तहत काम करने वाली संस्थाओं और उन संस्थाओं में काम करने वाले उन लोगों से आती है जिनकी पीठ में एक रीढ़ होती है और रीढ़ में हड्डी होती है.
अजीत ओझा, दिग्विजय सिंह और मनोज गुप्ता, यूपी के बलिया ज़िले के पत्रकार हैं. इन तीनों ने बारहवीं की परीक्षा में नकल होने की ख़बर छाप दी. प्रशासन ने इन पर ही नकल में मिलीभगत का आरोप लगाकर इन्हें जेल में ठूंस दिया. ये पत्रकार अपनी खबर से पीछे नहीं हटे और बलिया पुलिस के इस वैन में बैठ कर 28 दिनों के लिए जेल चले गए. एलन मस्क एक दिन के लिए इस वैन में बैठ कर देख लें, टेस्ला का आनंद आ जाएगा. बेशक प्रेस क्लब आफ इंडिया, एडिटर्स गिल्ड और ट्विटर पर भी कुछ लोगों ने इन पत्रकारों की गिरफ्तारी के खिलाफ आवाज़ बुलंद की, लेकिन इससे बड़ी लड़ाई बलिया में लड़ी गई.
वहां के पत्रकार साथियों ने लड़ी. शहर के नागरिकों ने पत्रकारों का साथ दिया और बलिया बंद में शामिल हुए. हवन तक हुआ. इन पत्रकारों ने जेल के ख़तरे उठाए, लेकिन अपनी खबर से पीछे नहीं हटे, क्या एलन मस्क इस तरह का रिस्क किसी सरकार के साथ ले सकते हैं? मस्क मोशाय, बोरे में बिलियन डॉलर लेकर घूमना अलग बात है और बलिया की जेल में रहना अलग बात है. बस यही बताना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मुक्त अभिव्यक्ति की लड़ाई का असली मैदान कहां है. ट्विटर पर क्या है, क्या नहीं है, इसके सवालों को खारिज नहीं कर रहा लेकिन ट्विटर या फेसबुक पर इल्ज़ाम है कि उन्होंने कई तरीके से अभिव्यक्ति का गला घोंटा है. झूठ और नफरत फैलने दिया है.
वहां ज़रूर इसकी लड़ाई होनी चाहिए, मगर अंतिम और असली लड़ाई तो उस मैदान में होनी है जिसे आप संविधान कहते हैं. दुनिया भर के देशों में संविधान बनाने के लिए लोगों ने ख़ून बहा दिए, इसलिए कि गारंटी संविधान दे, कोई कंपनी और उसे खरीदने वाला मालिक गारंटी न दे. इसी ट्विटर और फेसबुक पर प्रधानमंत्री के खिलाफ लिखने भर से जेल हो जाती है और पोस्ट डिलिट करना पड़ता है.इतना अंतर समझ लेने के बाद वापस लौटते हैं. बलिया के तीन पत्रकारों की कहानी पर,यह बताने के लिए मुक्त अभिव्यक्ति की लड़ाई वो लोग नहीं लड़ रहे हैं, जो एलन मस्क के सर्वे में एडिट बटन का अधिकार मांग रहे हैं, बल्कि वो लड़ रहे हैं जो जेल जा रहे हैं, नौकरी गंवा रहे हैं.एलन मस्क या पराग अग्रवाल बस इतनी ही गारंटी दे दें कि किसी सरकार के दबाव में ट्विट डिलिट नहीं करेंगे, पीछे नहीं हटेंगे, बल्कि बलिया तक वकील भेज कर मुकदमा लड़ेंगे, इतना पूछ दीजिए मस्क मोशाय, मालदा आम का रेट पूछने लगेंगे ताकि हेडलाइन बदल जाए.
बलिया के तीनों पत्रकारों ने 25 दिन जेल में बिताए, हम और आप इस बात से अनजान ही रहेंगे कि उनका घर कैसे चला, उनके बच्चों पर क्या बीती, उनकी पत्नियों का मनोबल कितना टूट गया होगा. यह उदारहण इसलिए दे रहा हूं ताकि आप बकवास और काम की बात में अंतर कर सकें. वकील अखिलेंद्र चौधरी का कहना है कि पुलिस बलिया के पत्रकारों के खिलाफ पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर पाई. अजीत ओझा, दिग्विजय सिंह और मनोज गुप्ता की तरह एलन मस्क पांच मिनट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं लड़ सकते. एक FIR होने पर दांत चियार देंगे और जो सरकार कहेगी वही करेंगे. बलिया की अदालत ने इस बात की आलोचना भी कि पत्रकारों को जेल में रखने के लिए कानून की सख्त धाराओं का इस्तमाल किया गया है. लेकिन क्या कोई सरकार प्रशासन को सज़ा देगी, कोई समाज पूछेगा कि इन तीनों को किस बात के लिए 25 दिनों के लिए जेल में रखा गया? और यह कोई पहला मामला नहीं है.
जिग्नेश मेवाणी को ट्विटर पर प्रधानमंत्री के खिलाफ लिख देने भर से गिरप्तार कर लिया जाता है, उस मामले में ज़मानत मिलती है तो दूसरे मामले में गिरफ्तार कर लिया जाता है. एक समुदाय की बहू-बेटियों के साथ बलात्कार की धमकी देने वाले बजरंग मुनी को ज़मानत मिल जाती है. एलन मस्क किसकी मुक्त अभिव्यक्ति की लड़ाई लड़ेंगे? जिग्नेश मेवानी की , अजीत झा की या बजरंग मुनी की? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर अगर परखना है तो किसी देश की पुलिस और अदालत और सरकार को परखिए, ट्विटर और फेसबुक एक दुकान हैं, इनका नंबर आता है, मगर सरकारों के बाद में आता है.
मस्क दुनिया के सबसे धनिक व्यक्ति हैं, वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के लिए ट्विटर नहीं खरीद रहे.उन्होंने जो सवाल उठाए हैं, उससे सोशल मीडिया और मीडिया प्लेटफार्म की कड़वी सच्चाइयां सामने तो आई हैं, लेकिन अभी आप आश्वस्त नहीं हो सकते कि एलन मस्क की दौलत से खरीदा गया ट्विटर गांधीवादी आंदोलन में बदलने जा रहा है. गांधी जिनसे चंदा लेते थे, उन्हीं की आलोचना बकायदा लिख कर करते थे. 1915 में अहमदाबाद में टेक्सटाइल सत्याग्रह हुआ तो उसी अबालाल साराभाई के खिलाफ बोल रहे थे, जिन्होंने कोचरब आश्रम के लिए चंदा दिया था और साराभाई की बहन गांधी जी के साथ थीं. बेशक एलन मस्क के इस सौदे के पीछे जो सवाल हैं उस पर बात करनी चाहिए. मीडिया संस्थान, लोकल और ग्लोबल लेवल पर अरपबतियों के हाथ में जा रहे हैं जिनके दूसरे कई धंधे हैं.
वे अपने उन धंधों की खातिर मीडिया को खरीद लेते हैं और खबरों को सेंसर करते हैं. कई धनिक मीडिया खरीद रहे हैं ताकि ताकि और अधिक खबरों को रोका जा सके. सवालों की हर खिड़की बंद कर दी जाए. सरकार ने सूचना के हर दरवाज़े बंद कर दिए हैं, आप बिना सूचना के ट्विटर पर मुक्त अभिव्यक्ति का अभिनय ही कर सकते हैं, अभिव्यक्ति हासिल नहीं कर सकते. (न्यूयार्क पोस्ट की खबरों में ) हुआ यह कि जो बाइडन के बेटे हंटर बाइडन का लैपटॉप कहीं छूट गया. उस लैपटॉप में मौजूद सामग्री के आधार पर न्यूयार्क पोस्ट ने अक्तूबर 2020 में कई खबरें छाप दी कि हंटर बाइडन के यूक्रेन और चीन की ऊर्जा कंपनियों संबंध रहे हैं. जिस दिन न्यूयार्क पोस्ट ने इस खबर को ट्विटर और फेसबुक पर साझा किया, थोड़ी ही देर में रिपोर्टर और अखबार पर हमला शुरू हो गया.
जिन पत्रकारों ने इस खबर के ट्विट को लाइक किया गया था, उन्हें भी नहीं छोड़ा गया. इस ख़बर पर सवाल उठाना ठीक था लेकिन तुरंत ही ट्विटर और फेसबुक ने इस पर रोक लगा दी. फेसबुक ने ठेका ले लिया कि कंपनी न्यूयार्क पोस्ट की खबर के तथ्यों की जांच कर रही है तब तक इसका प्रसार सीमित किया जाता है .दोपहर होते-होते ट्विटर ने भी अपने यूजर से कहा कि वे इसके लिंक को पोस्ट नहीं कर सकते, क्योंकि इसमें जो सामग्री है उससे काफी नुकसान हो सकता है. ट्विटर ने न्यू यार्क पोस्ट का अकाउंट ब्लॉक कर दिया. LA टाइम्स की पत्रकार मैट पियर्स ने कहा है कि न्यूयार्क पोस्ट की खबर की पुष्टि की जानी चाहिए. लेकिन फेसबुक इसके प्रसार को रोक रहा है, यह कुछ इस तरह से है कि अखबार का वितरण करने वाली ट्रक कंपनी ने तय कर लिया कि उसे यह स्टोरी पसंद नहीं है तो वह आज अपने ट्रक से इस अखबार की कापी नहीं बांटेगी.
न्यूयार्क पोस्ट अमरीका के पुराने अखबारों में से एक है, 1801 से छप रहा है, इसे दक्षिण पंथी विचारों वाले रुपर्ट मर्डोक ने ख़रीद लिया है. लेकिन राष्ट्रपति जो बाइडन के बेटे की खबर दबाने की घटना का असर भी तक अमरीका की राजनीति में हैं. भारत में ऐसे अनेक खबरों के उदाहरण दिए जा सकते हैं कि छापने के बाद भी अखबार ने अपनी वेबसाइट से ख़बर को हटा लिया है. आपके सामने भारत सहित दुनिया भर से कई उदाहऱण हैं कि फेसबुक ने भी चुनाव को प्रभावित करने के लिए एक खास राजनीतिक दल को बढ़ावा दिया. उनकी पोस्ट हर जगह पहुंचाने में मदद की और विरोधियों के पोस्ट या उनसे जुड़ी जानकारी को रोक दिया.
इसका मतलब है कि इन माध्यमों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसीहा बनाने से पहले अपने सवाल ठीक करें और समझ भी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का खेल कौन लोग खेल रहा है और दुनिया भर में इस काम के लिए बिठाई गई अदालतें और संस्थाएं क्या कर रही हैं? चुनाव कराने और सरकार बनाने में इन माध्यमों की सीधे तौर पर कई बार भूमिकाएं सामने आई हैं और कई बार यह भी कि इनके कर्मचारी बाद में सरकार बनाने में भीतर से काम करने लगते हैं. जब कारपोरेट का सरकार के साथ उठना-बैठना ज़्यादा हो जाए और वह कंपनी आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सपना दिखाए तो सपना देखिए लेकिन दिन में नहीं.
दो साल बाद 16 मार्च 2022 को न्यूयार्क टाइम्स ने हंटर बाइडन की खबर प्रकाशित की और लिखा कि अब उन्होंने हंटर बाइडन के लैपटाप और ईमेल की प्रमाणिकता की पुष्टि कर ली है. इन्ही ईमेल के आधार पर न्यूयार्क पोस्ट ने खबर लिखी थी लेकिन अक्तूबर 2020 में न्यूयार्क टाइम्स ने इस खबर के सोर्स को लेकर कई सवाल उठाए थे. कम से कम इस अखबार ने दो साल बाद सोर्स की जांच की और खबर को छापने और मानने लायक माना, लेकिन जिन अखबारों ने इस खबर को दबा दिया उन्होंने इसकी जांच दोबारा नहीं कि और न अपनी राय बदली. अमरीका में FBI इन्हीं ईमेल के आधार पर जांच कर रही है.
अमरीका के मशहूर पत्रकार ग्लेन ग्लीनवाल्ड इंटरसेप्ट नाम के न्यूज़ संस्थान के संस्थापकों में से एक थे. जिस संस्थान की स्थापना की थी, उसी ने उन्हें जो बाइडन के बेटे के खिलाफ खबर छापने से रोका तो ग्लेन ग्लीनवाल्ड ने इस्तीफा दे दिया. आज ग्लेन ग्लीनवाल्ड मुख्यधारा की मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं कि CNN, हफपोस्ट, इंटरसेप्ट, एन सी बी और पी बी एस ने इस खबर को छापने से रोका ताकि जो बाइडन का चुनाव प्रभावित न हो. उनका सवाल है कि पत्रकार को खबर क्यों रोकनी चाहिए, चाहे कोई हारे या जीते.
एलन मस्क ने ट्विटर खरीद लिया, कोई बड़ी बात नहीं है. अफसोस आपको होना चाहिए कि अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर आप दिन रात जिस ट्विटर पर लगे रहते हैं, आपने उसका वैल्यू कितना बढ़ा दिया, उस ट्विटर से आपको कितनी जागरुकता मिली है कभी तौल कर देखिएगा, आप बिल्कुल तौल सकते हैं, और ट्विटर वाले ने कितना पैसा कमाया ये आप सर्च कर पता लगा सकते हैं. इस डील से उत्साहित यूज़र को एक धेला नहीं मिला.इसे ऐसे समझिए,ज़मींदारी के पुराने सिस्टम में आप किसी के खेत में बेगार खट रहे थे. मालिक ने आपको गर्मी के दिनों में गमछा फ्री में दे दिया,फ्री गमछा पाते ही आप और ज्यादा बेगार करने लगे और ज़मींदार ने आपके बेगार से खूब मुनाफा कमाया.ट्विटर का फ्री स्पीच ही ज़मींदार का फ्री गमछा है.अगर आपको इन दोनों में अंतर लगे तो ज़रूर बताइयेगा.
साढ़े तीन लाख करोड़ देकर ट्विटर खरीदने वाले एलन मस्क दनादन ट्विट कर हवा बना रहे हैं कि ट्विटर पर खुलापन नहीं है. जैसे ही सवाल पूछा, जवाब देने वालों में 70 प्रतिशत ने कहा खुलापन नहीं है. सोचिए मस्क के पहले ही ट्विटर की यह हालत है तो मस्क के आने के बाद क्या सपना देखना, क्या डर जाना, फालतू में टाइम बर्बाद करना है. मसीहा मस्क से लोगो ने कहा ट्विटर मुक्त अभिव्यक्ति की रक्षा नहीं करता है, अपनी मर्ज़ी से लोगों के पोस्ट ब्लाक करता है, हटा देता है. लेकिन, इसकी क्या गारंटी है कि मस्क ऐसा नहीं करेंगे? क्या वे बलिया के पत्रकारों की तरह जेल में रहने का जोखिम उठा सकते हैं या (jeff bezos ki tarah) अपने अंतरिक्ष यान में बैठ अंतरिक्ष में भाग जाएंगे जहां पहुंचना बलिया की पुलिस से उम्मीद करना ठीक भी नहीं होगा.
एलन मस्क यह इशारा कर रहे हैं कि ट्विटर पर नकली अकाउंट का दौर समाप्त हो जाएगा. सबकी पहचान स्थापित की जाएगी लेकिन इससे नकली अकाउंट खोल कर ट्रोल करने वाली सेना समाप्त हो जाएगी यह ज़रूरी नहीं. वह सेना सोशल मीडिया के दूसरे माध्यमों में भी सक्रिय है. मस्क की इस बात को भी संभावना से देखा जा सकता है कि अलगोरिदम गुप्त नहीं रहेगा. अलगोरिदम टेक्नालजी का वह फार्मूला है जिसके ज़रिए कौन सी पोस्ट लोगों तक पहुंचेगी उसे बढ़ावा दिया जाता है या किसी पोस्ट को पहुंचने से रोका जाता है. देखना होगा कि ओपन सोर्स कर देने से ट्विटर के कंटेंट पर क्या असर पड़ता है, इसका दूसरे माध्यमों पर क्या असर पड़ता है, क्या ट्विटर मैदान में टिका रह पाएगा?
एलन मस्क का दावा है कि वे लेफ्ट और राइट के विचारों को बराबर की जगह देंगे. इस बहस में कूद कर खुश होने वाले ज़रा यह भी बताएं कि सूचनाएं कहां हैं. सूचनाएं लाने वाले पत्रकार या तो जेल में हैं या संस्थानों से निकाल दिए गए हैं. क्या मस्क नफरती बातों का भी प्रसार मुक्त रुप से होने देंगे? क्या मस्क दुनिया की अलग अलग सरकारों के सामने अभिव्यक्ति के लिए खड़े हो सकते हैं? भारत के इलेक्ट्रानिक और टेक्नालजी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर का बयान है कि “मैं एलन मस्क को बहुत बधाई देता हूं. भारत में काम करने वाले जितने भी मध्यस्थ माध्यम हैं, उनसे जवाबदेही, सुरक्षा और भरोसे को लेकर जो आशा है, लक्ष्य है, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा” यानी मस्क अपने अंतरिक्ष यान से जो भी बयान देते रहें लेकिन भारत में भारत का कानून मानना होगा.
अमरीका के राष्ट्र जो बाइडन कब से कह रहे हैं कि शक्तिशाली सोशल मीडिया पर लगाम लगाने के लिए कानून लाएंगे लेकिन आज तक कानून नहीं ला सके. मस्क के ट्विटर खरीदने पर व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव जेन पेस्की का बयान है कि ट्विटर का मालिक कौन है उससे हमें फर्क नहीं पड़ता. उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए.
वह कहती हैं कि मैं सामान्य ढंग से आपको बता सकती हूं. ट्विटर का मालिक या चलाने वाला कोई भी हो, राष्ट्रपति विशाल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की ताकत को लेकर चिंतित रहे हैं. हमारे रोजमर्रा के जीवन पर उनका प्रभाव है, उसको लेकर उन्होंने अक्सर ये सवाल उठाया है कि प्लैटफॉर्म उन नुकसानों के लिए जवाबदेह ठहराए जाने चाहिए, जो वे करते रहे हैं.
इन बयानों का मतलब साफ है. जवाबदेही और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर नए सिरे से जंग छिड़ने वाली है. जंग की दिशा क्या होगी, दुर्दशा जानती होगी. क्या ट्विटर सरकारी सेंसरशिप से लोहा ले पाएगा, ले सकता है अगर मस्क और उनका पूरा दफ्तर अंतरिक्ष में चला जाए और वहां से ट्विटर चलाए तो. सरकार ही नहीं मस्क का टकराव पारंपरिक मीडिया से भी होगा, जिससे उनके रिश्ते अच्छे नहीं रहे हैं. क्या मस्क उन समाचार संस्थानों के लिए सेंसर बन जाएंगे?
मुक्त अभिव्यक्ति के दायरे में हेट स्पीच का भी सवाल आता है. जहां आस्था के नाम पर झूठ और नफरत का इस्तेमाल हथियार के रूप में हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच को लेकर हिमाचल प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है, लेकिन क्या इसके बाद नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी?या कार्रवाई के नाम पर ख़ानापूर्ति होगी? अदालत ने उत्तराखंड सरकार को चेतावनी दी है कि हेट स्पीच को लेकर कदम उठाने होंगे. इस रिपोर्ट को हम एलन मस्क के संदर्भ में ही दिखा रहे हैं कि जब ऐसी बात आएगी तो फैसला संविधान की संस्था करेगी या मस्क की दुकान.
वक्त आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट मॉबलिंचिग, हेट क्राइम रोकने के लिए 2018 के फैसले की समीक्षा करे और एक स्टेटस रिपोर्ट तैयार हो कि इसमें जो दिशा-निर्देश दिए गए हैं, उसका कितना पालन हुआ है. फ्री स्पीच एलन मस्क नहीं, उन संस्थाओं से हासिल होगी जिनका काम सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों को लागू करना है. उनके रिकार्ड देखा कीजिए, मस्क अपनी जगह ठीक है. उनके जैसा चश्मा भले पहन लीजिए लेकिन उस चश्मे से पढ़िए संविधान ही . लेकिन उसमें काफी मेहनत करनी होगी.
बेहतर है लाउडस्पीकर विवाद टाइप आसान विवादों में उलझे रहिए. इसमें शामिल होने के लिए दसवीं में टाप करने की ज़रूरत नहीं है, गर्व स्टोर में जाइये और अपने लिए गर्व का सामान निकाल लीजिए. एलन मस्क से कहिए तुम्हारे पास टेस्ला है, ट्विटर है, क्या तुम जानते हो हमारे पास क्या है? इसी सवाल पर मस्क जी भकुआ जाएंगे यानी कोई जवाब नहीं सूझेगा
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बलिया BJP की इनसाइड स्टोरी! संगठन में पद की लड़ाई अश्लील वीडियो तक आई?
बलिया। बांसडीह में भाजपा से जुड़ी महिला कार्यकर्ता के निजी वीडियो के कथित प्रसार को लेकर दर्ज मुकदमे ने अब संगठन के भीतर चल रही कथित खींचतान की चर्चाओं को भी हवा दे दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या संगठन में पद और प्रभाव की लड़ाई का विवाद इतना बढ़ गया कि मामला निजी वीडियो तक जा पहुंचा? सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे प्रकरण के पीछे संगठन में पद पाने की कथित होड़ और आपसी राजनीतिक खींचतान का एंगल भी सामने आ रहा है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस जांच में ही वास्तविक तस्वीर साफ होगी।
क्या है पूरा मामला?: बांसडीह थाना क्षेत्र में भाजपा से जुड़ी एक महिला कार्यकर्ता ने पुलिस में शिकायत देकर आरोप लगाया कि उसका निजी वीडियो उसकी अनुमति के बिना प्रसारित किया जा रहा है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की है।
मामले में नामजद आरोपियों में भाजपा से जुड़े पदाधिकारियों के नाम होने की बात सामने आई है। महिला ने अपनी शिकायत में बताया है कि वीडियो कॉल के दौरान उसका निजी वीडियो बनाए जाने और बाद में उसके प्रसारित होने की जानकारी उसे बातचीत के दौरान मिली। शिकायतकर्ता ने पुलिस को संबंधित बातचीत के ऑडियो-वीडियो साक्ष्य उपलब्ध होने की बात भी कही है।
पद की कथित लड़ाई से जुड़ा दूसरा एंगल : सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे मामले की एक दूसरी तस्वीर भी सामने आ रही है। सूत्रों का दावा है कि संगठन में पद और जिम्मेदारी को लेकर कुछ लोगों के बीच कथित तौर पर अंदरूनी खींचतान चल रही थी। इसी खींचतान के बीच विवाद ने ऐसा रूप लिया कि कुछ लोगों ने कथित तौर पर एक-दूसरे को निशाने पर लेने और फंसाने के लिए मामले का फायदा उठाया।
सूत्रों का यह भी कहना है कि संगठनात्मक पद को लेकर चल रही प्रतिस्पर्धा के बीच व्यक्तिगत विवाद भी जुड़ता चला गया और आखिरकार मामला पुलिस तक पहुंच गया। हालांकि, यह दावा फिलहाल सूत्रों के हवाले से है। पुलिस जांच में इसकी पुष्टि होना बाकी है कि कथित संगठनात्मक खींचतान का इस मामले से वास्तव में कोई सीधा संबंध है या नहीं।
जिले से लेकर लखनऊ तक मामला पहुंचाने की होड़?: इस पूरे प्रकरण को लेकर सूत्र एक और महत्वपूर्ण दावा कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, जिले से जुड़े भाजपा के कुछ प्रभावशाली नेता कथित तौर पर मामले को दबाने की कोशिश में जुटे हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ नेता इस प्रकरण को लखनऊ तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
यानी एक तरफ मामले को स्थानीय स्तर पर संभालने और शांत कराने की कोशिश की चर्चा है, तो दूसरी तरफ इसे पार्टी के उच्च स्तर तक ले जाने की कवायद की बात सामने आ रही है। सूत्रों का दावा है कि इसके पीछे भी संगठन में पद और प्रभाव को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान एक वजह हो सकती है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज: मामले में भाजपा से जुड़े पदाधिकारियों के नाम सामने आने के बाद स्थानीय राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। पुलिस की जांच, डिजिटल साक्ष्य और शिकायतकर्ता की ओर से उपलब्ध कराए गए कथित वीडियो एवं अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।
फिलहाल बांसडीह पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि यह मामला केवल निजी वीडियो के कथित प्रसार का है या इसके पीछे संगठनात्मक पद की कथित लड़ाई, आपसी विवाद और राजनीतिक खींचतान की भी कोई भूमिका रही है।
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सिकंदरपुर की सियासत में नया चेहरा, कौन हैं संजीव कुमार तिवारी? बिजनेस से राजनीति तक कैसे पहुंचा सफर?
बलिया। सिकंदरपुर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में अब नए चेहरों की सक्रियता दिखाई देने लगी है। इसी बीच बिजनेस की दुनिया से राजनीति में कदम रखने वाले संजीव कुमार तिवारी का नाम भी चर्चा में है। कारोबारी पृष्ठभूमि से आने वाले संजीव कुमार तिवारी अब राजनीति के जरिए क्षेत्र की समस्याओं को उठाने और विकास की नई सोच के साथ आगे बढ़ने की बात कर रहे हैं।
राजनीति में आने की प्रेरणा कहां से मिली? बिजनेस से राजनीति तक आने का विचार कैसे बना? सिकंदरपुर विधानसभा को ही राजनीतिक कर्मभूमि बनाने के पीछे क्या वजह है? इन सवालों के साथ संजीव कुमार तिवारी अपने राजनीतिक सफर और भविष्य की योजनाओं को लेकर खुलकर बात करते हैं।
सिकंदरपुर की समस्याओं को लेकर उनकी प्राथमिकताओं में बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और युवाओं के लिए बेहतर अवसर जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। उनका मानना है कि क्षेत्र के विकास के लिए केवल सड़क और भवन निर्माण पर्याप्त नहीं है, बल्कि रोजगार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को भी विकास के केंद्र में रखना होगा।
बेरोजगारी और पलायन पर क्या है प्लान?
सिकंदरपुर समेत पूर्वांचल के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में युवाओं का रोजगार के लिए दूसरे शहरों की ओर पलायन लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है। संजीव कुमार तिवारी का कहना है कि युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है। उनका जोर युवाओं को कौशल, रोजगार और उद्यमिता से जोड़ने पर है।
शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर क्या सोच?
संजीव कुमार तिवारी क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर देते हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को बेहतर इलाज और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। विधायक बनने की स्थिति में इन दोनों क्षेत्रों को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करने की बात वह कहते हैं।
क्या पुराने नेताओं से क्षेत्र के साथ न्याय नहीं हुआ?
राजनीति में नए चेहरे के तौर पर सामने आ रहे संजीव कुमार तिवारी से जब यह सवाल पूछा जाता है कि क्या अब तक के जनप्रतिनिधि क्षेत्र के साथ न्याय नहीं कर पाए, तो उनका फोकस आरोप लगाने के बजाय भविष्य की राजनीति पर दिखाई देता है। उनका कहना है कि जनता अब सिर्फ वादे नहीं, बल्कि काम का स्पष्ट रोडमैप चाहती है।
विधायक बने तो पहले 100 दिन में क्या करेंगे?
संजीव कुमार तिवारी के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि अगर उन्हें जनता का समर्थन मिलता है तो सत्ता संभालने के शुरुआती 100 दिनों में उनकी प्राथमिकता क्या होगी। उनका कहना है कि क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं की पहचान, विभागवार समीक्षा और जनता से सीधे संवाद के जरिए प्राथमिकता तय की जाएगी।
क्या होगा विकास मॉडल?
संजीव कुमार तिवारी अपने विकास मॉडल को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, किसानों की समस्याओं और युवाओं के अवसरों से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि सिकंदरपुर का विकास किसी एक वर्ग या इलाके तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विधानसभा के हर गांव और हर तबके तक विकास की पहुंच होनी चाहिए।
क्या चुनाव पैसे और जाति से जीते जाते हैं?
राजनीति में सबसे कठिन सवालों में से एक चुनाव में पैसे और जातीय समीकरण की भूमिका को लेकर भी है। संजीव कुमार तिवारी का मानना है कि चुनाव में जातीय और आर्थिक समीकरण अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन अंततः जनता का भरोसा सबसे बड़ी ताकत है। वह विकास और साफ छवि को अपनी राजनीतिक पूंजी के तौर पर पेश करते हैं।
जीतने के बाद बदल जाएंगे?
नए राजनीतिक चेहरे के सामने जनता का एक बड़ा सवाल यह भी होता है कि चुनाव से पहले किए गए वादे सत्ता में आने के बाद कितने पूरे होंगे। संजीव कुमार तिवारी का कहना है कि राजनीति में आने का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जनता के बीच लगातार उपलब्ध रहना और अपने काम का हिसाब देना होना चाहिए।
राजनीतिक अनुभव नहीं, फिर भरोसा क्यों?
बिना लंबे राजनीतिक अनुभव के चुनावी मैदान में उतरने को लेकर भी संजीव कुमार तिवारी से सवाल उठता है। उनका जवाब है कि राजनीति में अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता की समस्याओं को समझने की इच्छा, ईमानदारी और काम करने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है। उनका दावा है कि कारोबारी जीवन से मिले अनुभव को वह क्षेत्र के विकास में इस्तेमाल करना चाहते हैं।
टिकट नहीं मिला तो क्या करेंगे?
संजीव कुमार तिवारी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का एक और अहम सवाल टिकट को लेकर है। यदि उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो उनकी अगली रणनीति क्या होगी? इस सवाल का जवाब ही यह तय करेगा कि उनकी राजनीति केवल चुनाव तक सीमित है या वह लंबे समय के लिए सक्रिय राजनीति में उतर चुके हैं।
क्या बलिया सदर पर भी नजर?
सिकंदरपुर से दावेदारी के बीच बलिया सदर सीट को लेकर भी उनसे सवाल किया गया। हालांकि उनकी मौजूदा राजनीतिक सक्रियता का केंद्र सिकंदरपुर दिखाई देता है, लेकिन भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं, इस पर भी नजर रहेगी।
मौजूदा विधायक के काम को कैसे देखते हैं?
मौजूदा विधायक के काम को लेकर संजीव कुमार तिवारी का आकलन भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनका कहना है कि जनता को जनप्रतिनिधि के काम का मूल्यांकन विकास और उपलब्धियों के आधार पर करना चाहिए। आने वाले चुनाव में जनता के सामने अपने-अपने काम और विजन के साथ विकल्प होंगे।
परिवार का कितना मिला साथ?
राजनीति में कदम रखने के फैसले में परिवार की भूमिका को भी संजीव कुमार तिवारी महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि सार्वजनिक जीवन आसान नहीं होता और परिवार का सहयोग राजनीतिक सफर को मजबूती देता है।
राजनीति में आने के बाद क्या बदला?
बिजनेस से राजनीति में आने के बाद संजीव कुमार तिवारी के लिए सबसे बड़ा बदलाव लोगों के बीच लगातार रहना और उनकी समस्याओं को करीब से समझना रहा है। अब उनका कहना है कि राजनीति उनके लिए केवल पद हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्र के लिए काम करने का जरिया है।
युवाओं के नाम संदेश
युवाओं को लेकर संजीव कुमार तिवारी का संदेश है कि युवा राजनीति और समाज से दूरी बनाने के बजाय अपनी जिम्मेदारी समझें और बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा बनें। उनका मानना है कि क्षेत्र के भविष्य का सबसे बड़ा आधार युवा शक्ति है।
एक लाइन में क्यों जीतेंगे?
जब उनसे पूछा गया कि आखिर जनता उन्हें ही क्यों चुने, तो उनका जवाब विकास, बदलाव और जनता से सीधे जुड़ाव के इर्द-गिर्द है। संजीव कुमार तिवारी खुद को एक ऐसे नए राजनीतिक विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं, जो बिजनेस की दुनिया से निकलकर अब सिकंदरपुर की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि संजीव कुमार तिवारी की यह राजनीतिक पारी कितनी लंबी चलती है और सिकंदरपुर की जनता उनके विजन और दावेदारी को किस नजर से देखती है।
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मेजर ध्यानचंद जयंती पर जमुना राम मेमोरियल स्कूल में खेल सप्ताह का आगाज, कबड्डी में खिलाड़ियों ने दिखाया दमखम
चितबड़ागांव (बलिया)। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती के उपलक्ष्य में जमुना राम मेमोरियल स्कूल, चितबड़ागांव में 29 अगस्त से खेल-कूद सप्ताह का भव्य शुभारंभ हुआ। आयोजन के तहत विद्यालय के चारों हाउस—रेड, ग्रीन, ब्लू और येलो—के बालक एवं बालिका वर्ग के बीच कबड्डी प्रतियोगिता कराई गई।
बालिका वर्ग में ग्रीन हाउस ने रेड हाउस को 12-10 के रोमांचक मुकाबले में हराया, जबकि येलो हाउस ने ब्लू हाउस को 20-15 से शिकस्त दी। बालिका वर्ग का खिताबी मुकाबला अगले दिन खेला जाएगा।
वहीं, बालक वर्ग में ब्लू हाउस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए येलो हाउस को 15-8 के अंतर से हराकर जीत दर्ज की। मुकाबलों के दौरान खिलाड़ियों ने जोश, अनुशासन और टीम भावना का शानदार प्रदर्शन किया।

इस अवसर पर विद्यालय के प्रबंध निदेशक इंजीनियर तुषारनंद ने कहा कि मेजर ध्यानचंद का जीवन अनुशासन, समर्पण और देशप्रेम की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि खेल केवल हार-जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण और टीम भावना विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

प्रधानाचार्य अजीत कुमार सिंह ने कहा कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के साथ खेलकूद भी बेहद जरूरी है। ऐसे आयोजनों से बच्चों की प्रतिभा को निखरने का अवसर मिलता है।
कार्यक्रम के दौरान इंचार्ज अरविंद चौबे, इंचार्ज नीतू मिश्रा और हैंडबॉल प्रशिक्षक मनोज कुमार पाण्डेय ने खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं।


