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UP: शिक्षक भर्ती की जांच में हो सकते हैं नए खुलासे, 8 सालों में हुई 1.80 लाख भर्तियां

सत्यापन नहीं तो वेतन नहीं। सरकारी नौकरी का नियम यही है लेकिन बेसिक शिक्षा विभाग में ऐसा नहीं हुआ। सरकारी प्राइमरी स्कूलों में शिक्षक बनते ही केवल दो प्रमाणपत्रों के सत्यापन के बाद वेतन दिए जाने का आदेश दे दिया गया। ऐसे में उत्तर प्रदेश में हो रही शिक्षक भर्ती की जांच कई नए खुलासे कर सकती है।

लाखों भर्तियों का है मामला :
उत्तर प्रदेश में बीते 8 सालों में  कोई 10-12 हजार नहीं बल्कि लगभग 1.80 लाख शिक्षक भर्तियां हुईं। वेतन देने के लिए प्रमाणपत्रों के सत्यापन का इंतजार नहीं किया गया। सरकार ने आदेश दिया कि दो प्रमाणपत्रों की जांच के बाद वेतन जारी कर दिया जाए। इसके बाद सत्यापन करवाया जाए लेकिन ज्यादातर जिलों में अब भी 100 फीसदी शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की जांच नहीं हो पाई है। विभाग ने कई बार वर्ष 2011 के बाद हुई भर्तियों के प्रमाणपत्रों के सत्यापन का ब्यौरा जुटाने की कोशिश की लेकिन अभी तक आंकड़ा जुट नहीं पाया है।

दो प्रमाणपत्रों के सत्यापन के बाद वेतन :
वर्ष 2011 से 2013 के बीच ही ज्यादातर भर्तियां हुईं और इसी दौरान शिक्षामित्रों का सहायक अध्यापक पद पर समायोजन भी शुरू हो गया। इतनी ज्यादा भर्तियों के कारण सत्यापन में देरी हो रही थी। वेतन रुक रहा था। समायोजित शिक्षामित्रों ने सरकार पर दबाव बनाया और दो प्रमाणपत्रों के आधार पर वेतन जारी करवा दिया गया। इस आधार पर बाकी भर्तियों में भी वेतन दिया जाने लगा। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट के प्रमाणपत्रों का सत्यापन करवाया गया। स्नातक व बीटीसी के प्रमाणपत्रों का सत्यापन बाद में करवाए जाने के आदेश थे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जिलों में बीएसए के लगातार तबादले भी होते रहे, लिहाजा इस मामले में लापरवाही भी खूब हुई।
हाल ही में मथुरा में शिक्षक भर्ती में फर्जीवाड़े की जांच एसटीएफ कर रही है और इससे पहले आगरा के डा. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा की फर्जी बीएड अंकतालिका से प्राइमरी स्कूलों में शिक्षक बने 4570 शिक्षकों को बर्खास्त किया जा चुका है।

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