बलिया डेस्क : लॉकडाउन में रोज़गार खत्म होने की वजह से जो लोग मुंबई से अपने गांव लौट आए थे, वह अब रोज़गार की तालाश में फिर से मुंबई का रुख़ कर रहे हैं। ऐसे ही लोगों में ऑटो चलाने वाले बलिया के दो भाई हरेंद्र यादव और नरेंद्र यादव भी शामिल हैं। हरेंद्र मार्च में लॉकडाउन लागू होने के बाद अपने परिवार के साथ ऑटो चलाकर बलिया वापस लौट आए थे।
हरेंद्र को मुंबई से इसलिए निकलना पड़ा था क्योंकि लॉकडाउन लागू होने के बाद उनके पास कोई काम नहीं बचा था। हरेंद्र के साथ उनके भाई नरेंद्र भी बलिया वापस आ गए थे। नरेंद्र भी ऑटो ड्राइवर हैं। दोनों भाइयों को उम्मीद थी कि उन्हें गांव में कोई काम मिल जाएगा, जिससे कि उन्हें वापस मुंबई नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिसके चलते उन्हें मजबूरन मुंबई वापस लौटना पड़ा।
हिंदुस्तान टाइम्स को हरेंद ने बताया, “गांव में कमाई का ज़रिया नहीं है। हमने आसपास के सारे गांव में नौकरी पाने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। हमारे पास गुज़ारा करने के लिए ज़मीन भी नहीं है। इसलिए हमने वापस मुंबई जाने का फैसला किया। दोनों भाइयों के साथ ही आसपास के गांव के 8 और ऑटो ड्राइवर 12 अगस्त को मुंबई के लिए निकले थे।
सफर के दौरान उन्होंने लगभग लगातार गाड़ी चलाई और रात में कुछ घंटों के लिए रुके। हरेंद्र ने बताया, ”ट्रैफिक से भरे हाईवे पर ऑटो चलाना बहुत मुश्किल था लेकिन हम कामयाब रहे। हमने ईंधन और भोजन पर लगभग 6,000 रुपये खर्च किए।” 16 अगस्त को जब ऑटो ड्राइवर्स का काफिला ठाणे पहुंचा तो वहां बहुत कुछ बदल चुका था। हरेंद्र के भाई नरेंद्र ने कहा “मुझे घर तलाश करने में थोड़ी समस्या का सामना करना पड़ा। हमारे साथ काम करने वाले ज्यादातर लोग अपने गांव जा चुके हैं और वापस नहीं लौटे हैं।
इसलिए, अब उधार लेना मुश्किल हो गया है और हमें सवारी भी बहुत कम मिल रही है”। महामारी ने आजीविका से अलग परिवार को भी तितर-बितर कर दिया किया है। पांच बच्चों के पिता नरेंद्र यादव ने कहा, “हम अपनी पत्नी और बच्चों को इस बार नहीं लाए, क्योंकि शहर में बिना किसी अच्छी कमाई के परिवार का गुजारा करना बहुत मुश्किल है”। उन्होंने आगे कहा, “मेरे बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई है। मैं उन्हें अब किसी अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लायक नहीं हूं। मुझे डर है कि मेरे बच्चे बिना शिक्षा के मेरे जैसे न रह जाएं”।
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