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भाजपा की केतकी सिंह ने इस इंटरव्यू में खोले कई राज़ कहा,’अपनी शर्तों पर करती हूं राजनीति’

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बलिया डेस्क :  2017 में  उत्तर प्रदेश के विधानसभा के लिए चुने गए 403 विधायकों में मात्र 40 महिला विधायक हैं। यह आंकड़ा ‘आधी आबादी’ के ‘33 प्रतिशत की हिस्सेदारी’ के स्लोगन को मुंह चिढ़ाता दिखाई देता है। बहरहाल, प्रदेश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने औसतन 8 प्रतिशत महिलाओं को टिकट दिया जिसके बाद कुल 445 महिला उम्मीदवारों में से 40 विधायक चुनी गईं।

यह आंकडा इसलिए भी गौरतलब है कि राजनीतिक दल जातिगत फैक्टरों और सीट जीतने की उठापटक के बीच महिला के उम्मीदवारी को कोई चुनाव जीताऊ फैक्टर भी नहीं मान पाते। यह दलों विचारधारओं की समस्या अथवा राजनीति हो सकती है। हमारा उद्देश्य आपको बलिया की प्रभावी महिला नेत्री और केतकी सिंह से अवगत कराना है। अब तक दो विधानसभा चुनाव लड़ चुकी केतकी सिंह बलिया के बासंडीह विधानसभा की प्रभावी उम्मीदवार हैं। शाश्वत उपाध्याय  से लंबी बातचीत की है।

क्या है राजनीतिक करियर

2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की उम्मीदवार रहीं केतकी सिंह बलिया के बांसडीह विधानसभा से लगभग 30000 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहीं। तब यह सीट सपा के रामगोविंद चौधरी के हाथ लगी। सपा की सरकार बनी और उनका कार्यकाल बतौर शिक्षा मंत्री पूरा हुआ। बीते 2017 के विधानसभा चुनाव में केतकी सिंह दुबारा बांसडीह से ही 49514 वोट पाकर वर्तमान नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी से लगभग 1600 वोटों से निर्दल चुनाव हारीं। भाजपा से टिकट की दावेदार रहीं केतकी सिंह को भाजपा के सुभासपा के गठबंधन के बाद टिकट नहीं मिला। हालांकि 2017 विधानसभा चुनाव में ऐसा उल्लेखनीय प्रदर्शन लगभग दो साल बाद दिसंबर 2018 में पार्टी में लौटने का बड़ा कारण रहा। फिलहाल भाजपा नेत्री के तौर पर अपने राजनीतिक हस्तक्षेप को मजबूत करतीं केतकी सिंह ने बलिया खबर से बात की है।

बी.कॉम की पढ़ाई के दौरान ही हो गया विवाह

बेहद मुखर और ‘फायर ब्रांड’ कही जाने वाली केतकी सिंह ने नवीं कक्षा तक की पढ़ाई छत्तीसगढ़ में पूरी की। 2003 में बलिया के ज्ञान पीठिका स्कूल से 12वीं पास करने के बाद जिले के ही टी.डी. कॉलेज से बी.कॉम की पढ़ाई पूरी की। कंप्यूटर सीखने का दौर था तो उसका कोर्स पूरा किया और फिर पढ़ाई के दौरान ही 2005 में शादी हो गई। कॉलेज में छात्र राजनीति में हस्तक्षेप के सवाल पर केतकी सिंह बताती हैं,

“मैं कॉलेज की राजनीति में नहीं आई। उस समय या अब भी लड़कियों की भूमिका बहुत कम ही रहती है। प्रत्याशी भी कभी इक्का-दुक्का मिल जाएं तो बहुत है। उन्हें कई तरह की समस्या और ह्रासमेंट झेलना पड़ता है। ना हीं लड़कों में वैसे संस्कार हैं और ना हीं समाज एक बेटी को उतनी सुरक्षा दे पाता है।“

राजनीति में अचानक एंट्री का कारण क्या था?

एकदम से मुख्यधारा की राजनीति में आ जाने के सवाल पर केतकी सिंह बताती हैं, ‘यह एक बेहद जरूरी बात है और मुझे लगता है कि सबको जानना चाहिए। घर परिवार की जिम्मेदारियों के बीच जब मैं शादी करके यहां (ससुराल) आयी तो यहां का माहौल दूसरा था। अगर हमें कहीं जाना भी होता तो हमारी गाड़ी तक एकदम बरामदे के पास खड़ी होती। फिर साल 2010 में ग्राम पंचायत के चुनाव के दौरान एक घटना हुई।‘

2010 के ग्राम पंचायत चुनाव का जिक्र करते हुए केतकी सिंह बताती हैं, ‘ग्राम पंचायत के चुनाव में मेरी सास उम्मीदवार थीं। मतदान के कोई 3-4 दिन पहले जब घर के सारे पुरूष चुनाव प्रचार में निकले थे, दोपहर के वक्त मैं अपनी 1 साल की बेटी के साथ अपने कमरे में थी। तभी मेरी सासू मां कमरे में आईं और दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। मुझे बिस्तर के बगल में छुपाने की कोशिश करने लगीं। मैंने जानना चाहा मगर वो बस रोए जा रहीं थीं। मैंने खिड़की से बाहर देखा, घर के पीछे की तरफ पुलिस और साथ में बहुत सारे लोग घर में लाठी डंडों के साथ घुस आएं हैं। इतने में मेरे ही बेडरूम का दरवाजा तोड़ कर पुलिस वाले घुस आए। यह सबकुछ इतना जल्दी हो रहा था कि कुछ समझने का मौका ही नहीं मिला। इसके बाद मैंने पुलिस वालों के साथ चिल्ला कर बात की, उन्हें घर के बाहर किया और पहली बार अपने ही घर के सबसे बाहर निकली।‘

 

केतकी सिंह इस घटना के प्रभाव को राजनीतिक हस्तक्षेप का ट्रिगर प्वाइंट मानती हैं। यह घटना क्यों अथवा कैसे हुई का नपातुला जवाब उनकी राजनीतिक परिपक्वता जानने के लिए काफी है। केतकी सिंह कहती हैं, ‘बाद में पता चला, तब के हमारे बसपा विधायक ने गैरकानूनी तरीके से हमारे घर में यह कह कर पुलिस भेजी थी कि इनके घर में चुनाव जीतने और प्रचार के लिए अवैध सामग्रियां मौजूद हैं’

निर्दलीय चुनाव लड़ने के दौरान केतकी सिंह के पोस्टर पर ऊपर के राजनीतिक चेहरे उल्लेखनीय हैं।

हालांकि केतकी सिंह के ससुर विश्राम सिंह इलाके में पहले से राजनीतिक हस्तक्षेप रखते थे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखऱ के करीबी माने जाने वाले विश्राम सिंह ने भी अपने राजनीतिक अनुभव और खुली सोच को स्पष्ट किया और केतकी सिंह के लिए विधानसभा की राजनीति में हस्तक्षेप के द्वार खोल दिए।

खैर, क्या केतकी सिंह का राजनीति में आना इतना ही आसान या मुश्किल रहा? यह प्रश्न आने वाले समय का हो सकता है फिलहाल बासंडीह और बलिया की राजनीति में इस स्तर पर केतकी सिंह भाजपा के लिए एकमात्र महिला नेत्री हैं। साथ ही यह और भी उल्लेखनीय बात है कि चुनाव में उतरने वाले सभी राजनीतिक दलों को देखें तो भी केतकी सिंह ही एकमात्र महिला नेत्री हैं।

भाजपा ही क्यों

केतकी सिंह मानती हैं कि भारतीय जनता पार्टी से जुड़ाव का कारण उनकी राष्ट्रवादी सोच रही है मगर 2010 के ग्राम पंचायत चुनाव के दौरान की घटना में भाजपा के नेताओं की मदद भी उनका इस दल से जुड़ने का बड़ा कारण है। वो कहती हैं, ‘जब मैंने भाजपा में जुड़ने को सोचा तब तो पार्टी की हालत इतनी अच्छी नहीं थी लेकिन एक राजनीतिक दल अथवा नेता से आप यही उम्मीद करते हैं कि आपके और समाज के सुख-दुख में वो खड़ा हो। इसलिए मैंने भाजपा जॉइन किया।‘

पहली बार चुनाव लड़ने का अनुभव

केतकी सिंह पहली बार चुनाव लड़ने को लेकर कहती हैं, ‘मैंने देखा कि एक MLA होकर आप पुलिस और लोगों का इस तरह दुरूपयोग कर सकते हैं तो आपके पास चीजें बेहतर करने की कितनी ताकत है। यही कारण था औऱ मैंने सोचा की पहले MLA  बनेंगे और फिर अपने इलाके के स्तर से चीजें ठीक करेंगे’

निर्दल चुनाव लड़ने पर ये स्टैंड

केतकी सिंह 2012 में पहली बार भाजपा के टिकट पर बांसडीह से चुनाव लड़ीं। वोट मिले लगभग 30 हज़ार। इसके बाद के 2017 के चुनाव में भाजपा ने सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) के साथ गठबंधन किया और बांसडीह विधानसभा की सीट सुभासपा के हाथ चली गई। केतकी सिंह का टिकट काट कर सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के बेटे अरविंद राजभर को टिकट दे दिया गया। केतकी सिंह निर्दलीय उम्मीदवार बनीं और 49514 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। केतकी सिंह ने निर्दल चुनाव लड़ने के सवाल पर कहा, ‘मैंने पहले दिन से ये तय किया है कि मुझे अपने मान-सम्मान के साथ अपनी शर्तों पर राजनीति करनी है। बसपा के चलते मैं राजनीति में आयी, सपा की सरकार देखी है। इसके बाद अगर देखें तो राजनीतिक तौर पर खुल कर तत्कालीन सरकारों का विरोध करने का स्पेस भाजपा में मिला। मैं भाजपा के विरोध में चुनाव में नहीं उतरी थी। यहां से भाजपा का उम्मीदवार होता तो मैं जरूर समर्थन करती। मैं चुनाव लड़ने वाले सहयोगी दल के उम्मीदवार को अपना नेता नहीं मानती थी। मैं विचारधारा की राजनीति करती हूं ऐसे में किसी भी दल के उम्मीदवार के लिए वोट नहीं मांग सकती थी और यही आत्मविश्वास है कि आज मैं नेता प्रतिपक्ष के विरोध में उम्मीदवारी दर्ज करा रही हूं।‘

 

कितना प्रभावी है जातिगत फैक्टर

जातिगत राजनीति और समीकरणों को लेकर केतकी सिंह काफी बेफिक्र नज़र आती हैं। अपनी बातचीत में महात्मा गांधी, चंद्रशेखऱ और जेपी का जिक्र करते हुए चुनावों में इस फैक्टर के प्रभाव पर केतकी सिंह कहती हैं,  ‘ मुझे अपने दूसरे चुनाव की तैयारी के दौरान ये जाति का फैक्टर समझ आया। कहीं कुछ होनी-अनहोनी  होती जैसे मान लीजिए किसी बस्ती में आग लग गई तो लोग कहते थे,  वहां मत जाइए, वो आपको कभी वोट नहीं देंगे। हालांकि मैंने अब तक के अपने दोनों चुनाव में इस बात का ध्यान नहीं रखा। दूसरी बार निर्दल चुनाव लड़ने के बाद तो यह और साफ हो गया’

2019 लोकसभा से पूर्व भाजपा की ‘कमल संदेश यात्रा’ में शामिल केतकी सिंह व अन्य भाजपा नेता

बलिया की लड़कियों के लिए बतौर भाजपा नेत्री ने केतकी सिंह ने सबसे आखिर में कुछ रेखांकित करने लायक बात कही। पूरी बातचीत में अपनी दो बेटियों का लगातार जिक्र करती हुई केतकी सिंह खुद में आत्मविश्वास रखने की बात करती हैं। केतकी सिंह कहती हैं, ‘मैं बलिया की लड़कियों को कहना चाहती हूं कि राजनीति में आइये और पूरी तरह आत्मविश्वास के साथ आइये। जनता आत्मविश्वासी नेता के बारे में कभी भी पुरूष या महिला के भेद के साथ नहीं सोचती है। अभिवावकों से अनुरोध है कि बेटे जितना विश्वास बेटी पर भी करें, उनकी उड़ान हर किसी से बेहतर होगी’

पूरी बातचीत में केतकी सिंह के तेवर ने बहुत से नए सवालों को स्थान दिया। पूर्वांचल में भाजपा सहित किसी भी राजनीतिक दल में फिलवक्त इतनी मुखर और बिना प्रभावी पारिवारिक सहयोग की शायद ही कोई महिला नेता हों। अब इस प्रभावशाली तेवर का कारण एक बार की बगावत है या राजनीतिक महत्वकांक्षा, इसका मूल्यांकन तो समय के हाथों है। फिलहाल केतकी सिंह चुनाव से लगभग साल भर पहले ही पूरी तैयारी के साथ लैस हैं। सुबह 11 बजे तक लोगों के मिलती हैं और फिर क्षेत्र में जाती हैं। जब हम केतकी सिंह से बातचीत करने पहुंचे, पंचायत चुनावों में समीकरणों की उठा-पटक के बीच कुछ लोग उनसे मिलने आए थे, वो पंचायत चुनाव के आरक्षण की नई नियमावली से नाखुश थे। उन्हें उम्मीद है कि केतकी सिंह उनकी कुछ मदद करेंगी। उन्हें सहयोग के लिए पूर्णतया आश्वस्त करती केतकी सिंह बड़ी जिम्मेदारी से अभिवादन स्वीकार करती रहीं।

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सिकंदरपुर की सियासत में नया चेहरा, कौन हैं संजीव कुमार तिवारी? बिजनेस से राजनीति तक कैसे पहुंचा सफर?

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A New Face in Sikandarpur Politics: Who Is Sanjeev Kumar Tiwari? How Did His Journey From Business to Politics Begin?

बलिया। सिकंदरपुर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में अब नए चेहरों की सक्रियता दिखाई देने लगी है। इसी बीच बिजनेस की दुनिया से राजनीति में कदम रखने वाले संजीव कुमार तिवारी का नाम भी चर्चा में है। कारोबारी पृष्ठभूमि से आने वाले संजीव कुमार तिवारी अब राजनीति के जरिए क्षेत्र की समस्याओं को उठाने और विकास की नई सोच के साथ आगे बढ़ने की बात कर रहे हैं।

राजनीति में आने की प्रेरणा कहां से मिली? बिजनेस से राजनीति तक आने का विचार कैसे बना? सिकंदरपुर विधानसभा को ही राजनीतिक कर्मभूमि बनाने के पीछे क्या वजह है? इन सवालों के साथ संजीव कुमार तिवारी अपने राजनीतिक सफर और भविष्य की योजनाओं को लेकर खुलकर बात करते हैं।

सिकंदरपुर की समस्याओं को लेकर उनकी प्राथमिकताओं में बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और युवाओं के लिए बेहतर अवसर जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। उनका मानना है कि क्षेत्र के विकास के लिए केवल सड़क और भवन निर्माण पर्याप्त नहीं है, बल्कि रोजगार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को भी विकास के केंद्र में रखना होगा।

बेरोजगारी और पलायन पर क्या है प्लान?

सिकंदरपुर समेत पूर्वांचल के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में युवाओं का रोजगार के लिए दूसरे शहरों की ओर पलायन लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है। संजीव कुमार तिवारी का कहना है कि युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है। उनका जोर युवाओं को कौशल, रोजगार और उद्यमिता से जोड़ने पर है।

शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर क्या सोच?

संजीव कुमार तिवारी क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर देते हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को बेहतर इलाज और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। विधायक बनने की स्थिति में इन दोनों क्षेत्रों को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करने की बात वह कहते हैं।

क्या पुराने नेताओं से क्षेत्र के साथ न्याय नहीं हुआ?

राजनीति में नए चेहरे के तौर पर सामने आ रहे संजीव कुमार तिवारी से जब यह सवाल पूछा जाता है कि क्या अब तक के जनप्रतिनिधि क्षेत्र के साथ न्याय नहीं कर पाए, तो उनका फोकस आरोप लगाने के बजाय भविष्य की राजनीति पर दिखाई देता है। उनका कहना है कि जनता अब सिर्फ वादे नहीं, बल्कि काम का स्पष्ट रोडमैप चाहती है।

विधायक बने तो पहले 100 दिन में क्या करेंगे?

संजीव कुमार तिवारी के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि अगर उन्हें जनता का समर्थन मिलता है तो सत्ता संभालने के शुरुआती 100 दिनों में उनकी प्राथमिकता क्या होगी। उनका कहना है कि क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं की पहचान, विभागवार समीक्षा और जनता से सीधे संवाद के जरिए प्राथमिकता तय की जाएगी।

क्या होगा विकास मॉडल?

संजीव कुमार तिवारी अपने विकास मॉडल को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, किसानों की समस्याओं और युवाओं के अवसरों से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि सिकंदरपुर का विकास किसी एक वर्ग या इलाके तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विधानसभा के हर गांव और हर तबके तक विकास की पहुंच होनी चाहिए।

क्या चुनाव पैसे और जाति से जीते जाते हैं?

राजनीति में सबसे कठिन सवालों में से एक चुनाव में पैसे और जातीय समीकरण की भूमिका को लेकर भी है। संजीव कुमार तिवारी का मानना है कि चुनाव में जातीय और आर्थिक समीकरण अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन अंततः जनता का भरोसा सबसे बड़ी ताकत है। वह विकास और साफ छवि को अपनी राजनीतिक पूंजी के तौर पर पेश करते हैं।

जीतने के बाद बदल जाएंगे?

नए राजनीतिक चेहरे के सामने जनता का एक बड़ा सवाल यह भी होता है कि चुनाव से पहले किए गए वादे सत्ता में आने के बाद कितने पूरे होंगे। संजीव कुमार तिवारी का कहना है कि राजनीति में आने का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जनता के बीच लगातार उपलब्ध रहना और अपने काम का हिसाब देना होना चाहिए।

राजनीतिक अनुभव नहीं, फिर भरोसा क्यों?

बिना लंबे राजनीतिक अनुभव के चुनावी मैदान में उतरने को लेकर भी संजीव कुमार तिवारी से सवाल उठता है। उनका जवाब है कि राजनीति में अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता की समस्याओं को समझने की इच्छा, ईमानदारी और काम करने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है। उनका दावा है कि कारोबारी जीवन से मिले अनुभव को वह क्षेत्र के विकास में इस्तेमाल करना चाहते हैं।

टिकट नहीं मिला तो क्या करेंगे?

संजीव कुमार तिवारी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का एक और अहम सवाल टिकट को लेकर है। यदि उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो उनकी अगली रणनीति क्या होगी? इस सवाल का जवाब ही यह तय करेगा कि उनकी राजनीति केवल चुनाव तक सीमित है या वह लंबे समय के लिए सक्रिय राजनीति में उतर चुके हैं।

क्या बलिया सदर पर भी नजर?

सिकंदरपुर से दावेदारी के बीच बलिया सदर सीट को लेकर भी उनसे सवाल किया गया। हालांकि उनकी मौजूदा राजनीतिक सक्रियता का केंद्र सिकंदरपुर दिखाई देता है, लेकिन भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं, इस पर भी नजर रहेगी।

मौजूदा विधायक के काम को कैसे देखते हैं?

मौजूदा विधायक के काम को लेकर संजीव कुमार तिवारी का आकलन भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनका कहना है कि जनता को जनप्रतिनिधि के काम का मूल्यांकन विकास और उपलब्धियों के आधार पर करना चाहिए। आने वाले चुनाव में जनता के सामने अपने-अपने काम और विजन के साथ विकल्प होंगे।

परिवार का कितना मिला साथ?

राजनीति में कदम रखने के फैसले में परिवार की भूमिका को भी संजीव कुमार तिवारी महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि सार्वजनिक जीवन आसान नहीं होता और परिवार का सहयोग राजनीतिक सफर को मजबूती देता है।

राजनीति में आने के बाद क्या बदला?

बिजनेस से राजनीति में आने के बाद संजीव कुमार तिवारी के लिए सबसे बड़ा बदलाव लोगों के बीच लगातार रहना और उनकी समस्याओं को करीब से समझना रहा है। अब उनका कहना है कि राजनीति उनके लिए केवल पद हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्र के लिए काम करने का जरिया है।

युवाओं के नाम संदेश

युवाओं को लेकर संजीव कुमार तिवारी का संदेश है कि युवा राजनीति और समाज से दूरी बनाने के बजाय अपनी जिम्मेदारी समझें और बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा बनें। उनका मानना है कि क्षेत्र के भविष्य का सबसे बड़ा आधार युवा शक्ति है।

एक लाइन में क्यों जीतेंगे?

जब उनसे पूछा गया कि आखिर जनता उन्हें ही क्यों चुने, तो उनका जवाब विकास, बदलाव और जनता से सीधे जुड़ाव के इर्द-गिर्द है। संजीव कुमार तिवारी खुद को एक ऐसे नए राजनीतिक विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं, जो बिजनेस की दुनिया से निकलकर अब सिकंदरपुर की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।

अब देखना दिलचस्प होगा कि संजीव कुमार तिवारी की यह राजनीतिक पारी कितनी लंबी चलती है और सिकंदरपुर की जनता उनके विजन और दावेदारी को किस नजर से देखती है।

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मेजर ध्यानचंद जयंती पर जमुना राम मेमोरियल स्कूल में खेल सप्ताह का आगाज, कबड्डी में खिलाड़ियों ने दिखाया दमखम

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चितबड़ागांव (बलिया)। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती के उपलक्ष्य में जमुना राम मेमोरियल स्कूल, चितबड़ागांव में 29 अगस्त से खेल-कूद सप्ताह का भव्य शुभारंभ हुआ। आयोजन के तहत विद्यालय के चारों हाउस—रेड, ग्रीन, ब्लू और येलो—के बालक एवं बालिका वर्ग के बीच कबड्डी प्रतियोगिता कराई गई।

बालिका वर्ग में ग्रीन हाउस ने रेड हाउस को 12-10 के रोमांचक मुकाबले में हराया, जबकि येलो हाउस ने ब्लू हाउस को 20-15 से शिकस्त दी। बालिका वर्ग का खिताबी मुकाबला अगले दिन खेला जाएगा।

वहीं, बालक वर्ग में ब्लू हाउस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए येलो हाउस को 15-8 के अंतर से हराकर जीत दर्ज की। मुकाबलों के दौरान खिलाड़ियों ने जोश, अनुशासन और टीम भावना का शानदार प्रदर्शन किया।

इस अवसर पर विद्यालय के प्रबंध निदेशक इंजीनियर तुषारनंद ने कहा कि मेजर ध्यानचंद का जीवन अनुशासन, समर्पण और देशप्रेम की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि खेल केवल हार-जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण और टीम भावना विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

प्रधानाचार्य अजीत कुमार सिंह ने कहा कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के साथ खेलकूद भी बेहद जरूरी है। ऐसे आयोजनों से बच्चों की प्रतिभा को निखरने का अवसर मिलता है।

कार्यक्रम के दौरान इंचार्ज अरविंद चौबे, इंचार्ज नीतू मिश्रा और हैंडबॉल प्रशिक्षक मनोज कुमार पाण्डेय ने खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं।

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जमुना राम मेमोरियल स्कूल में धूमधाम से मना 80वां स्वतंत्रता दिवस, बच्चों की प्रस्तुतियों ने बांधा समां

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बलिया। जमुना राम मेमोरियल स्कूल, मानपुर चितबड़ागांव में 15 अगस्त को 80वां स्वतंत्रता दिवस हर्षोल्लास, उमंग और देशभक्ति की भावना के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रोफेसर धर्मात्मा नंद ने मां सरस्वती की पूजा-अर्चना एवं ध्वजारोहण के साथ किया।

ध्वजारोहण के बाद विद्यालय के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शानदार प्रस्तुति दी। बच्चों ने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रानी लक्ष्मीबाई जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों के प्रतीकात्मक रूप धारण कर उनके त्याग, संघर्ष और देशभक्ति की गाथा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम की शुरुआत नंदिनी मिश्रा की मधुर आवाज में प्रस्तुत गीत ‘चिट्ठी आई है’ से हुई। उनकी प्रस्तुति ने मौजूद लोगों को भाव-विभोर कर दिया। इसके बाद ‘जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया’ और ‘भारत की जान है तिरंगा’ जैसे देशभक्ति गीतों ने पूरे विद्यालय परिसर को राष्ट्रप्रेम की भावना से भर दिया।

कक्षा 11 के शारीरिक शिक्षा के विद्यार्थियों ने योग के विभिन्न आसनों का शानदार प्रदर्शन कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। वहीं प्री-प्राइमरी एवं प्राइमरी के बच्चों ने ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ गीत पर मनमोहक प्रस्तुति देकर कार्यक्रम में देशभक्ति के रंग भर दिए। कक्षा 8 की छात्राओं द्वारा पारंपरिक कजरी गीत पर प्रस्तुत नृत्य कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा।

विद्यालय के प्रबंध निदेशक तुषार नंद ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि देश का भविष्य युवा पीढ़ी के हाथों में है। उन्होंने बच्चों से अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।

प्रधानाचार्य अजीत सिंह ने कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए मुख्य अतिथि, अभिभावकों, विद्यार्थियों एवं विद्यालय परिवार के सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में सीनियर कोऑर्डिनेटर अरविंद चौबे, जूनियर कोऑर्डिनेटर नीतू मिश्रा सहित समस्त शिक्षक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इसके बाद विद्यार्थियों एवं उपस्थित लोगों के बीच मिष्ठान का वितरण किया गया।

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