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बलिया की लोकगाथाओं के बारे में ये बातें आपको नहीं मालूम होंगी!

लोकगाथाएँ जनसमुदाय की सांस्कृतिक स्मृतियों का अक्षय भंडार होती हैं। इतिहास, समाज और संस्कृति के साथ-साथ लोक के विविध स्वरूपों की झलक इन लोकगाथाओं में हमें सहज ही प्राप्त होती है। सत्यव्रत सिन्हा के अनुसार, ‘लोकसाहित्य वह लोकरंजनी साहित्य है जो सर्वसाधारण समाज की मौखिक रूप में भावमय अभिव्यक्ति करता है।’

भोजपुरी क्षेत्र में नौ प्रमुख लोकगाथाएँ प्रचलित हैं, जिन्हें आम जन द्वारा बड़े ही चाव से सुना जाता है। ये लोकगाथाएँ हैं : आल्हा, लोरिकी, विजयमल, कुँवर सिंह, शोभानयका बनजारा, सोरठी, बिहुला, राजा भरथरी और राजा गोपी चंद। इन लोकगाथाओं में जहाँ कुछ वीरगाथाएँ हैं, मसलन आल्हा, लोरिकी, विजयमल और कुँवर सिंह। वहीं शोभानयका बनजारा की लोकगाथा प्रेमकथात्मक है। सोरठी और बिहुला को रोमांचकथा की श्रेणी में रख सकते हैं। वहीं राजा भरथरी और राजा गोपी चंद की लोकगाथा में योग, दर्शन और वैराग्य की प्रधानता है।

इनमें से लोरिकी और शोभानयका बनजारा की कथा सीधे तौर पर बलिया से जुड़ी हुई है। इन लोकगाथाओं के नायक लोरिक और शोभानायक बलिया की भूमि से जुड़े हुए हैं और जन-स्मृतियों में आज भी उनकी वीरता की गाथाएँ सुरक्षित हैं। वहीं 1857 के विद्रोह के नायक वीर कुँवर सिंह से जुड़ी लोकगाथाओं में कुँवर सिंह के जीवन से जुड़े घटनाक्रमों का विवरण देने के क्रम में बलिया का उल्लेख प्रमुखता से आता है।

भोजपुरी लोकगाथाओं का गहन अध्ययन करने वाले विद्वान सत्यव्रत सिन्हा ने इन लोकगाथाओं में आए स्थानों के बारे में विस्तार से लिखा है। मसलन, लोरिक की कथा में ‘बोहा के मैदान’ का ज़िक्र आता है, जहाँ लोरिक और उसका बड़ा भाई सँवरू अपने मवेशी चराया करते थे। ‘बोहा के मैदान’ के संदर्भ में सत्यव्रत सिन्हा लिखते हैं कि ‘बलिया नगर से उत्तर दो मील की दूरी पर ‘बोहा का मैदान’ आज भी स्थित है। इसका क्षेत्रफल प्रायः चौदह मील के लगभग बतलाया जाता है। इसी ‘बोहा’ के अंतर्गत एक बड़ा ऊँचा टीला है जो ‘लोरिक डीह’ कहलाता है।’

लोरिक डीह से ही कुछ दूरी पर ‘सँवरू बांध’ गाँव है। नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इस गाँव का नाम लोरिक के बड़े भाई सँवरू के नाम पर रखा गया। ‘सँवरू बांध’ से पूरब की ओर आगे बढ़ें तो ‘अखार’ नामक गाँव आता है। लोरिक की लोकगाथा में इस बात का ज़िक्र आता है कि लोरिक और उसका बड़ा भाई सँवरू इसी गाँव में स्थित अखाड़े में कुश्ती लड़ा करते थे।

उल्लेखनीय है कि चौदहवीं सदी में लिखी गई मौलाना दाऊद की प्रसिद्ध कृति ‘चंदायन’ भी लोरिक की इसी प्रसिद्ध लोकगाथा को आधार बनाकर लिखी गई है। इसकी रचना मौलाना दाऊद ने फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ के काल में वर्ष 1379 में की थी। ‘चंदायन’ को हिंदी का पहला प्रेमाख्यान माना जाता है।

इसी प्रकार वैश्य समुदाय से जुड़ी लोकगाथा ‘शोभानयका बनजारा’ का नायक शोभानायक बलिया के बाँसडीह के शंभू बनजारा का पुत्र रहता है। जिसका विवाह तिरहुत के जादूसाह की बेटी दसवंती से होता है। ‘शोभानयका बनजारा’ की लोकगाथा में बाँसडीह और तिरहुत के अलावा मोरंग, बहराइच और बरहज बाज़ार का भी ज़िक्र आता है। उल्लेखनीय है कि बाँसडीह अनाज के गल्लों के व्यापार का बड़ा केंद्र भी रहा है।

शुभनित

Rashi Srivastav

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