15 अगस्त 1947 में भारत अंग्रेजों की बेड़ियों से आजाद हुआ था। लेकिन बलिया देश का पहला ऐसा जिला था जो पांच साल पहले ही यानि 1942 में ही आजाद हो गया था। बलिया ने 1942 की क्रांति में सफलता की एक अमिट कहानी लिख डाली। आज भी आजादी के पन्नों पर बागी बलिया की कहानी जीवंत है।
अस्सी साल पहले साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरु हुआ। तब बलिया में आजादी का शोर कुछ ऐसा हुआ कि अंग्रेजों की नींद उड़ गई। 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में मुंबई में नेताओं की गिरफ्तारी के बाद बलिया में कांग्रेस के नेताओं को पकड़ा गया, इसके बाद जिले भर के कांग्रेसियों ने बिट्रिश सरकार का विरोध करना शुरु कर दिया। बलिया में क्रांति का ऐसा रुप था, जिनके सामने गांव के चौकीदार से लेकर जिला कलेक्टर को तक झुकना पड़ा।
जिसके बाद 14 अगस्त 1942 को बैरिया थाने पर तिरंगा लहराया गया, फिर एक के बाद एक थाने और तहसीलों पर राष्ट्रीय ध्वज फहरता चला गया और जिले से अंग्रेजी शासन खत्म हो गया। बलिया के लोगों ने अपने साहस और पराक्रम के दम पर गुलामी की बेड़ियां काट दीं। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ही उत्तर प्रदेश के बलिया पश्चिम बंगाल के तमलुक और महाराष्ट्र के सतारा में आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना हो गई थी। यानि ये वह इलाके थे जो भारत की आजादी के पांच साल पहले ही स्वतंत्र हो गए।
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