आजादी के 75 साल पूरे होने पर देशभर में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। जगह जगह आयोजन हो रहे हैं, अमर शहीदों को याद किया जा रहा है, उनके गौरव और बलिदान की गाथाएं पढ़ी जा रही हैं लेकिन बलिया के नरहीं में आजादी के लिए अंग्रेजों से लोहा लेने वाले शहीद के गांव में एक शिलापट्ट तक नहीं लगा है।
विकासखंड सोहांव के सबसे बड़े गांव नरहीं की गलियों में आज भी हीरामन हलवाई उर्फ दूधन के शौर्य की कहानियां सुनाई जाती हैं। हीरामन हलवाई ने साल 1942 में जिला मुख्यालय पर अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लिया। उन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने सीने पर गोलियां खाई। कर्फ्यू के दौरान वह शहीद हो गए।
हीरामन हलवाई उर्फ दूधन का नाम शहीदों के पन्नों में दर्ज है। शहीदों के स्तंभ में दूधन का नाम अंकित है लेकिन नरहीं गांव में न तो शहीद का कहीं नाम है, न ही शिलापट्ट। पीडब्ल्यूडी के कर्मचारियों ने परिवार के सदस्यों से पूछा कि गांव में कहीं शिलापट्ट है तो जबाव मिला नहीं। वहीं अपने बेटे की शहादत के बाद परिवार ने सरकार से कोई आर्थिक लाभ नहीं लिया। बड़ी दुर्भाग्य की बात है कि आज पूरा देश आजादी का उत्सव मना रहा है लेकिन इस आजादी के लिए जिन्होंने अपने प्राणों की कुर्बानियां दी उन्हें सम्मान नहीं मिल पा रहा।
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