बलिया में स्वास्थ्य सुविधा की हकीकत, न व्हील चेयर ना बैठने की व्यवस्था !

बलिया। जिले में स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ बेपटरी हो गई हैं। जहां अब मरीजों को व्हील चेयर तक नसीब नहीं हो रही है। मरीज और परिजनों के लिए बैठने तक की व्यवस्था नहीं है। बीमार मरीज और परेशान परिजन सीढ़ी या फर्श पर जहां-तहां बैठे थे। आलम यह कि मरीज को गोद में लादकर वार्ड तक ले जाना पड़ रहा है। मरीज इलाज के लिए परेशान हो रहे हैं। और स्वास्थ्य विभाग परेशानियों पर ध्यान ही नहीं दे रहा है। जबकि सरकारी अस्पताल के मरीज मरीजों को प्राइवेट इलाज का सुझाव देकर उनका इलाज कर रहे हैं। जिला अस्पताल में ताजा मामला सामने आया है। जहां अस्पताल परिसर में मरीजों और परिजनों के बैठने तक की व्यवस्था नहीं है।बीमार मरीज और परेशान परिजन जहां-तहां बैठे थे। ओपीडी के बाहर मरीजों की लंबी लाइन लगी हुई थी। इसी बीच राजा गांव निवासी सीताराम यादव को टांग कर उनके परिजन पैथोलाजी से वापस मेडिकल वार्ड में ले जाते दिखे। उनसे पूछने पर बताया कि कर्मचारी से व्हील चेयर की मांग की थी लेकिन कोई दूसरा मरीज व्हील चेयर लेकर गया था। उसका इंतजार करने पर पैथोलाजी बंद हो जाता इसलिए खुद से टांग कर लाना ही उचित लगा, जबकि इसके उलट इमरजेंसी वार्ड में देखने पर जगह-जगह लिखा था कि स्ट्रेचर या व्हील चेयर के लिए यहां संपर्क करें, लेकिन लिखावट के हिसाब से सेवाएं नहीं मिल रही थीं।


जन औषधि केंद्र की नहीं लिखते दवा- प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्र जब खुला तो सरकार की ओर से इसका खूब प्रचार किया गया। कहा गया कि इससे गरीब वर्ग को बड़ी राहत मिलेगी। जन औषधि केंद्र पर 70 से 80 फीसद तक सस्ती दवा मिलेगी, लेकिन जिला अस्पताल में स्थिति इसके विपरीत है। कोई भी चिकित्सक जन औषधि केंद्र की दवा नहीं लिखते। इसके पीछे का कारण बताया गया कि जब अस्पताल के काउंटर पर सभी तरह की दवा मौजूद है तो जन औषधि की दवा लिखने की क्या जरूरत है। कुछ चिकित्सकों ने यह भी बताया कि जन औषधि केंद्र पर सभी तरह की दवा उपलब्ध नहीं रहती।

यदि 5 तरह की दवा लिखी जाती है तो जनऔषधि के काउंटर पर दो या तीन दवा ही मिल पाती है। बाकी दवाओं के लिए मरीजों को भटकना पड़ता है। सरकारी डॉक्टर कर रहे प्राइवेट इलाज- जिला अस्पताल के चिकित्सकों का सब कुछ ठीक है, लेकिन वह ओपीडी से ही अपने आवास के लिए मरीजों को सुझाव देते हैं। मरीज भी क्या करें, उसे बेहतर उपचार से मतलब है। ओपीडी का समय खत्म होने के बाद भारी संख्या में मरीज चिकित्सकों के आवास पर फीस देकर प्राइवेट में अपना उपचार कराते हैं। इस संबंध में कुछ मरीजों ने बताया कि प्राइवेट में चिकित्सक अच्छे से देखते हैं। ओपीडी में हड़बड़ी के बीच दिखाना पड़ता है। आवास पर चिकित्सक बाहर की दवा भी लिख देते हैं, जिससे जल्द आराम मिल जाता है। अस्पताल की दवा का कभी असर होता है तो कभी नहीं होता।

Ritu Shahu

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