निर्भया के गाँव में लोग बेटियों को बाहर क्यों नहीं भेज रहे?, बलिया की है ऐसी दास्ताँ

देश की राजधानी दिल्ली में हुआ निर्भ’या केस तो आप सभी को याद ही होगा जिसके दो’षियों को अब फां’सी पर लटकाया जा सकता है. सभी को 22 जनवरी का इंतजार है. इस बीच हम आपको निर्भया के गाँव के बारे में बताने जा रहे हैं कि आखिर वहां पर लोग क्या सोच रहे हैं. बता दें कि बलिया जिला मुख्यालय से 45 किमी दूर है मेडौला कलां गांव, जिसे अब निर्भया के नाम से जाना जाता है.

बलिया-बक्सर हाईवे पर करीब तीन किलोमीटर दूर है निर्भय का यह गाँव. यहाँ उनके चाचा सुरेश सिंह का परिवार रहता है. इस मामले पर उन्होंने कहा कि निर्भया के पिता करीब पचीस साल पहले दिल्ली चले गए थे. वहां पर वह कुकर बनाने की कंपनी में पहले काम करते थे. उन्होंने बताया कि निर्भय करीब 16 साल की उम्र में गाँव आई थी. इस मामले पर निर्भया की चचेरी बहन ने बताया कि दीदी के साथ जो कुछ भी हुआ, वह आज तक नहीं भूल पाई है.

एक डर सा उनके मन में आज भी बना रहता है. उन्होंने कहा कि जब तक उन दरि’दों को फां’सी नहीं होती, तब तक उन्हें यकीन नहीं होगा. इसके अलावा उन्होंने वेटरनरी डॉक्टर्स वाले मामले में पुलिस का बचाव करते हुए कहा कि जो हुआ, ठीक ही हुआ. गाँव का नाम तो खूब हुआ लेकिन हालात नहीं बदले. बेहतर इलाज के लिए बक्सर जाना पड़ता है. गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं है. फार्मासिस्ट गायब ही रहता है.

लड़कियों को 12वीं करने के लिए दस बारह किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. बड़ी बात यह है कि इस मामले के बाद अब गाँव के लोग अपनी लड़कियों को बाहर पढ़ने के लिए भेजने में कतराने लगे है. इस मामले के बाद गाँव की कोई लड़की पढ़ाई के लिए बड़े शहर नहीं गयी. इसके अलावा उन्हें फैसले में हुई देरी से निराशा तो हुई लेकिन कोर्ट के फैसले से वह काफी खुश हैं.

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