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कैसे मिलेगी आर्सेनिक से मुक्ति: अधर में लटकी सरकारी योजनाएं, दूषित पानी पीने को मजबूर लोग

बलिया जिलेवासी सालों से आर्सेनिक युक्त पानी पीने को मजबूर हैं। साल बीते, सरकारे बदलीं, लेकिन शुद्ध पानी की व्यवस्था नहीं हो पाई। WHO के मानक के मुताबिक जिले में आर्सेनिक युक्त पेयजल से कई गांव जूझ रहे हैं और करीब 310 गांव ऐसे हैं, जो देश की घातक श्रेणी में आर्सेनिक प्रभावित घोषित किए गए हैं।

पानी में आर्सेनिक जैसे खतरनाक तत्व की मात्रा काफी ज्यादा होने से इन गांवों के सैंकड़ों लोग बीमार की चपेट में है। दर्जनों की मौत हो चुकी है। इन समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने मई 2008 में जल निगम के मुख्य अभियंता (गोरखपुर) के नेतृत्व में आई टीम ने गंगा नदी के रामगढ़ व पचरूखिया के बीच और घाघरा नदी के चांदपुर व दतहां के बीच सतही स्रोत स्थापित करने की संस्तुति उत्तर प्रदेश शासन को दी थी।

लेकिन दुख की बात यह है कि केंद्र कोई भी योजना धरातल पर नहीं उतर पाई। केंद्र सरकार के अलावा प्रदेश शासन ने भी आर्सेनिक युक्त जल के संकट को दूर करने की कोशिश की और अपनी ओर से एक रिपोर्ट केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय को भेजी। सूत्रों की मानें तो करीब 7 अरब की लागत वाली प्रस्तावित योजना जब मंत्रालय में पहुंची तो वहां से हैदराबाद की एक विशेष सर्वे टीम बलिया भेजी गई। साल 2008 में पहुंची विशेषज्ञों की इस टीम ने भी रामगढ़ व पचरूखिया के बीच गंगा में‘इंटेक वेल’ व गंगा ‘ट्रीटमेंट प्लांट’ की मंजूरी दे दी।

लेकिन मंजूरी मिलने के बाद आजतक इसका निर्माण शुरु नहीं हुआ। लोगों का कहना है कि यदि इस योजना को हरी झंडी मिल गई होती तो जिले के आर्सेनिक प्रभावित गांवों को न सिर्फ शुद्ध पेयजल नसीब हो गया होता बल्कि उन्हें ‘जहर’ से मुक्ति भी मिल गई होती।

वहीं लोगों की बढ़ती परेशानी को देखते हुए एक बार फिर गंगा ट्रीटमेंट प्लांट बनाने की कवायद शुरु की गई। इसके तहत नरहीं थाना क्षेत्र के कोटवां नरायनपुर के आसपास प्लांट बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया। डीपीआर तैयार कर विभागीय अधिकारियों ने शासन को भेज दिया। इसके बाद अफसर जमीन की खोजबीन में जुट गए। लेकिन यह योजना भी धूल खा रही है। न तो इसे प्रदेश सराकर ने मंजूरी दी और न ही कोई काम शुरु हुआ। अब मजबूरन लोगों को आर्सेनिक युक्त दूषित पानी पीना पड़ रहा है।

Rashi Srivastav

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