शेर-ए-बलिया चित्तू पांडेय
हिंदुस्तान ने आजादी हासिल की थी 15 अगस्त, 1947 को। लेकिन इतिहास कहता है कि उत्तर प्रदेश का एक जिला 1947 से पांच साल पहले ही गुलामी की बेड़ियों को तोड़ चुका था। 1942 के अगस्त क्रांति के दौरान ही उस जिले के लोगों ने अंग्रेजों को रखेद दिया था। जिले का नाम है बलिया। जिसे लोग बागी बलिया कहते हैं। बलिया की आजादी के नायकों में से एक चित्तू पांडेय की छह दिसंबर यानी आज पुण्यतिथि है।
शेर-ए-बलिया चित्तू पांडेय। कौन नहीं जानता है ये नाम। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के आठ साल बाद विद्रोह की मशाल लिए पैदा हुए चित्तू पांडेय। उनका जन्म 10 मई, 1865 को बलिया के रट्टूचक गांव में हुआ था। पूरा जीवन देश की आजादी के आंदोलन में झोंक देने का प्रण कर कूद पड़े मैदान में। चित्तू पांडेय ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बलिया जिले के लोगों में क्रांति का संचार किया।
1942 का साल था। भारत की आजादी के लिए दिल्ली में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया। देशभर के लोग महात्मा गांधी के आह्वान पर हिंदुस्तान की आजादी के लिए आंदोलन में शामिल हो गए। इस आंदोलन से बागी बलिया भी कैसे अछूता रह सकता था। वो भी तब जब बलिया में क्रांति की कमान चित्तू पांडेय के हाथ में ही थी।
चित्तू पांडेय ने बलिया के लोगों की फौज बना दी थी। जो इस आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ कूद पड़े। अंग्रेजी पुलिस ने चित्तू पांडेय समेत बलिया के कई आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन आजादी के लिए जो आग चित्तू पांडेय जला गए थे उसकी धधक कहां कम होने वाली थी। लोगों ने बलिया के सरकारी कार्यालयों पर कब्जा कर लिया। पुलिस स्टेशन से लेकर डाकघर तक से अंग्रेजों को खदेड़ दिया गया।
जिला कारागार का फाटक खोलकर कैद किए गए क्रांतिकारियों को आजाद कराया गया। इसी के साथ बलिया भी आजाद हो गया। बलिया जिले की कमान चित्तू पांडेय ही को सौंपी गई। उनके नेतृत्व में बलिया में स्थानीय सरकार का गठन हुआ। हालांकि बाद के दिनों में अंग्रेजों ने दोबारा बलिया पर कब्जा जमा लिया था।
बलिया को 1942 में ही अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति दिलाने वाले चित्तू पांडेय पूरे देश को आजाद होते नहीं देख सके। भारत की स्वतंत्रता से एक साल पहले ही चित्तू पांडेय का निधन हो गया। 6 दिसंबर, 1946 को चित्तू पांडेय ने अंतिम सांस ली।
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