बलिया। देश में सबसे पहले आज़ाद होने वाले बलिया के लिए 19 अगस्त का दिन गौरवशाली है। 1942 में इसी दिन बागी बलिया के सैकड़ों क्रांतिकारियों ने अपनी शहादत देकर ब्रिटिश हुकुमत से लोहा लेते हुए जिला कारागार का दरवाजा खोला और जेल मे बंद अपने साथी क्रांतिकारियों को आजाद कराया। बलिया 14 दिनों के लिए आजाद हुआ था। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में विद्रोही तेवरों की वजह से बलिया को बागी बलिया भी कहा जाता है।
1942 में आजाद हुआ था बलिया-देश को आजादी 1947 में मिली पर बलिया जनपद के बागी तेवर ने 19 अगस्त 1942 को अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंकते हुए 14 दिन आज़ाद रहा। 1942 के आंदोलन में बलिया के निवासियों ने स्थानीय अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फेंका था, भारत छोड़ो आंदोलन में बलिया के लोंगो का जनाक्रोश देख तत्कालीन डीएम जे. निगम ने बलिया जिला कारागार के गेट खोलकर सभी बंदी स्वतंत्रासेनानियों को रिहा कर दिया।
चित्तू पाण्डेय के नेतृत्व में भीड़ आज के क्रांति और उस समय के टाउनहाल के मैदान में पहुंची थी। वहीं बलिया के आजाद होने की घोषणा हुई थी। चित्तू पाण्डेय आजाद बलिया के पहले कलेक्टर घोषित किए गए थे। लोगों ने चित्तु पांण्डेय को जिलाधिकारी की कुर्सी और राम दहिन ओझा को पुलिस अधीक्षक की कुर्सी पर बैठा दिया। चित्तू पांडेय के नेतृत्व में कुछ दिनों तक स्थानीय सरकार भी चली। लेकिन बाद में अंग्रेजों ने वापस अपनी सत्ता कायम कर ली। आज का दिन बलिदान दिवस के रूप में भी मनाया जाता है ।
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