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बलिया के लिए दुखद: नहीं रहे सुप्रसिद्ध साहित्यकार केदारनाथ सिंह

हिन्दी की समकालीन कविता और आलोचना के सशक्त हस्ताक्षर और अज्ञेय के तीसरा सप्तक के प्रमुख कवि डॉ. केदारनाथ सिंह का सोमवार को यहां निधन हो गया. पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि डा. केदारनाथ सिंह को करीब डेढ़ माह पहले कोलकाता में निमोनिया हो गया था. इसके बाद से वह बीमार चल रहे थे. उनका सोमवार रात करीब साढ़े आठ बजे एम्स में निधन हो गया. वह 84 वर्ष के थे. उनके परिवार में एक पुत्र और पांच पुत्रियां हैं.

उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार और व्यास सम्मान सहित कई सम्मानों से पुरस्कृत किया गया था. उनके प्रमुख कविता संग्रहों में ‘अभी बिलकुल अभी, जमीन पक रही है, यहां से देखो, बाघ, अकाल में सारस और उत्तर कबीर’ शामिल हैं. आलोचना संग्रहों में ‘कल्पना और छायावाद, मेरे समय के शब्द’ प्रमुख हैं. उनका मंगलवार दोपहर तीन बजे अंतिम संस्कार किया जायेगा.

बलिया में हुआ जन्म, JNU बनी कर्मभूमि
केदारनाथ सिंह का जन्म 7 जुलाई, 1934 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव में हुआ था. उन्होंने बीएचयू से हिंदी में एमए तथा पीएचडी की उपाधि हासिल की. केदारनाथ सिंह जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र में बतौर एचओडी रहे हैं. उनके प्रमुख  कविता संग्रहों में ‘अभी बिल्कुल अभी’, ‘जमीन पक रही है’, ‘यहां से देखो’, ‘बाघ’, ‘अकाल में सारस’, ‘उत्तर कबीर और अन्य कविताएं’. ‘तालस्ताय और साइकिल’ तथा ‘सृष्टि पर पहरा’ रहे हैं.

साल 2014 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मशहूर हिंदी कवि केदारनाथ सिंह को भारतीय साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया.इस अवसर पर उन्होंने कहा था, ‘केदारनाथ सिंह ने अपनी कविताओं के माध्यम से हमें अनुप्रास एवं काव्यात्मक गीत की दुर्लभ संगति दी है और उन्होंने वास्तविकता एवं गल्प को समानता के साथ समाहित किया है, उनकी कविताओं से अर्थ, रंग एवं स्वीकार्यता झलकती है.’ मुखर्जी ने कहा था, ‘अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी कवि न केवल आधुनिक कला सौंदर्य के प्रति संवेदनशील हैं बल्कि पारंपरिक ग्रामीण समुदायों के प्रति भी उनकी संवेदना झलकती है.’  इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि उनकी इच्छा है कि नयी पीढ़ी भारतीय क्लासिक में गहराई तक उतरे .

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