चंद्रशेखर की धरती पर वीरेंद्र होंगे ‘मस्त’ या इतिहास रचेगा बलिया !

बलिया लोकसभा सीट की पहचान शुरू से ही पू्र्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के नाम पर रही है. 84 को छोड़ जब तक वो जिंदा रहे इस सीट से चुनाव जीतते रहे, उनके निधन के बाद उपचुनाव और आगे के लोकसभा चुनाव में उनके छोटे बेटे नीरज शेखर चुनाव लड़े.

इस बार के लोकसभा चुनाव में सपा- बसपा का गठबंधन हुआ और यह सीट सपा के खाते में आई. हर कोई उम्मीद लगाए हुए था और यह मानकर चल रहा था कि इस सीट से सपा नीरज शेखर को ही चुनावी मैदान में उतारेगी, लेकिन नामांकन के अंतिम दिन से ठीक कुछ घंटे पहले सपा ने सबको चौंकाते हुए इस सीट से नीरज शेखर की जगह पूर्व विधायक सनातन पाण्डेय को अपना उम्मीदवार बना दिया.

इस ऐलान के साथ ही यह तय हो गया कि बलिया में इस बार के लोकसभा चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के परिवार का कोई सदस्य नहीं होगा. 42 वर्षों बाद ऐसा होगा जब बलिया लोकसभा सीट पर चंद्रशेखर या उनके परिवार का कोई सदस्य चुनावी मैदान में नहीं होगा.

भारतीय राजनीति में युवा तुर्क के नाम से मशहूर चंद्रशेखर का बलिया में लंबे समय तक राज रहा. 37 साल में उन्होंने बलिया से 9 चुनाव लड़े और केवल एक बार 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर में वो हारे. यही एक चुनाव था जब वह बलिया से हारे, इसके अलावा वह कभी चुनाव नहीं हारे.

इस बार भले ही चंद्रशेखर या उनके परिवार का कोई सदस्य मैदान में नहीं है लेकिन अब भी चर्चा के केंद्र में चंद्रशेखर और उनका परिवार ही है. बलिया की जनता के बीच चुनावी चर्चा वोटिंग से पहले भी यही है कि नीरज शेखर को टिकट मिलना चाहिए था.

नीरज शेखर नहीं तो क्या उनको पत्नी को टिकट देना चाहिए था. नीरज शेखर के नहीं लड़ने से किसको फायदा होगा. साथ ही इस बात की भी चर्चा जोरों पर है कि नीरज शेखर को अपने पिता की पार्टी सजपा का सपा में विलय नहीं करना चाहिए था. यानी चुनावी चर्चा में भी अब भी चंद्रशेखर व उनका परिवार ही है.

बीजेपी कैंडिडेट वीरेंद्र सिंह हुए “मस्त “

नीरज शेखर के चुनाव में नहीं लड़ने से कहीं न कहीं इसका फायदा बीजेपी को होता दिख रहा है. भदोही के सांसद और किसान मोर्चा के अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह मस्त इस बार बीजेपी के टिकट पर बलिया से चुनाव लड़ रहे हैं. वीरेंद्र सिंह मस्त के नाम की चर्चा बलिया से कहीं नहीं थी लेकिन बलिया के वर्तमान सांसद भरत सिंह का टिकट काटकर उन्हें टिकट दे दिया गया.

टिकट के ऐलान के साथ ही माना जाने लगा कि सपा यहां मजबूत हो गई. वीरेंद्र सिंह मस्त एक बार पहले भी बलिया से चुनाव लड़ चुके हैं और उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा था. वीरेंद्र सिंह मस्त की स्थिति कमजोर मानी जा रही थी लेकिन जैसे ही नीरज शेखर का बलिया से टिकट कटा उसी समय से यह माना जाने लगा कि वीरेंद्र सिंह की राह अब आसान हो गई.

सपा की यह है रणनीति

इस सीट को लेकर सपा की यह रणनीति मानी जा रही है कि राजपूत और भूमिहार वोटर्स बीजेपी कैंडिडेट का समर्थन कर सकते हैं ऐसे में सनातन पाण्डेय के जरिए वह ब्राह्मण वोटरों को साध सकती है. साथ ही यादव, मुस्लिम और दलितों का वोट उसे मिल जाए तो सपा की राह इस सीट से आसान हो सकती है. ब्राह्मण वोटरों को सपा अपने साथ कितना जोड़ पाती है यह देखने वाली बात होगी.

पूर्व पीएम चंद्रशेखर का रहा है दबदबा

बलिया लोकसभा सीट के अंतर्गत जहूराबाद, बैरिया, फेफना, बलिया नगर और मोहम्मदाबाद विधानसभा सीटें आती हैं. 1952 में इस सीट पर पहली बार हुए चुनाव में निर्दलीय उम्‍मीदवार के तौर पर मुरली मनोहर ने जीत दर्ज की थी. वहीं, 1957 में कांग्रेस के राधा मोहन सिंह, 1962 में कांग्रेस के मुरली मनोहर और 1967-1971 में कांग्रेस के चंद्रिका प्रसाद ने दो बार जीत हासिल की थी. इस सीट से कांग्रेस ने 1984 में आखिरी बार चुनाव जीता था. बलिया लोकसभा सीट से दिग्गज नेता चंद्रशेखर ने कुल आठ बार जीत हासिल की थी. चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर इस सीट से 2007 और 2009 में सांसद रह चुके हैं.

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