हज़रत साद बिन अबी वक़्कास रजियल्लाहु अन्हु अपनी मां के बडे फरमां बदार थे | हर हुक्म पर तस्लीम ख़म कर देते और कभी अपनी मां की ना फ़रमानी न की | जब ईमान की दौलत से मालामाल हुए ( मुसलमान हुए) और नबी ए करीम ﷺ की गुलामी में आ गए तो उनकी मां बेताब हो गई, उस का दिल बेचैन हो गया, बेटे को आबाओ अज्दाद के दीन से फिरते देख कर गमगीन दिल उछलकर हल्क में आ गया और बे साख्ता पुकार उठी :-
” ऐ मेरे लाल ! ऐ मेरे जिगर के टूकडे ! ऐ मेरे फरमां बरदार बेटे ! यह तुने क्या किया ? तुने अपने बाप दादा के दीन को छोड दिया ? ऐ मेरे बेटे ! तुने आज तक कभी मेरी बात को टाला नहीं और ना कभी ना फरमानी की ! यकीनन तू मेरी यह बात भी मानेगा और ईस्लाम छोड देगा अगर तुने ऐसा ना किया तो मैं ना खाऊंगी ना पियूंगी,सूख कर मर जाऊंगी और ये सब कुछ तेरे सबब होगा और मेरे खून का वबाल तुझ पर होगा और लोग तुझे मां का कातिल कह कर पुकारा करेंगे | ” येह कहकर उसने खाना पीना छोड दिया , धूप मैं बैठ गई, और बहुत कमज़ोर हो गई |
कुरबान जाएये हज़रत साद बिन इबी वक्कास के इश्क़े रसूल पर वालिदा का ये हाल देखकर भी आप पर कोई असर ना हुआ और आपने अपनी वालिदा को जिस अंदाज में जवाब दिया आप ने इश्क़ मुहब्बत से भरपूर अंदाज में यह फरमाया :- ” ए मेरी मां ! वाक़ेई अगर कोई दुनिया का मामला होता तो मैं हरगीज तेरी ना फरमानी ना करता मगर येह मामला तो मेरे उस महबूब का है जो तुझसे करोडों गुनाह बढ कर मुझसे मुहब्बत फरमाता है, ए मां !
येह उस जात ए अक्दस का मामला है जो रहमतुल्लिल आ-लमीन है, शफीउ़ल मज्निबीन है, राहतुल आशिकीन है, जिस की जूदाई के मुकाबले मैं दुनिया और जो कुछ इस में है सब को ठुकरा दूं, तेरी एक जान तो क्या सो जानें भी हों और एक एक कर के सब को कुरबान करना पडे तो सब को कुरबान कर दूंगा मगर दीन ए इस्लाम से ना फिरुंगा और न ही अपने महबूब का दामन छोडूंगा ” |
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