साहित्यिक पत्रिका ‘साखी’ की तरफ़ से ‘कवि’ केदारनाथ के गांव में होगा कार्यक्रम, जन्मदिन पर यूँ याद आएँगे

बलिया डेस्क: कवि केदारनाथ सिंह के जन्मदिन पर उनके गांव चकिया में कल (19 नवंबर) देश भर के साहित्यकार, कवि एवं कलाकार जुट रहे हैं. विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर और शिक्षाविदों के साथ यह कार्यक्रम दो सत्रों का है. प्रथम सत्र में केदारनाथ सिंह के गांव ‘चकिया’ में कार्यक्रम तय है जिसमें जिलाधिकारी बलिया भी उपस्थित रहेंगे. वहीं दूसरे सत्र में आचार्य नरेंद्रदेव

सभागार, जिला पंचायत भवन में व्याख्यान होगा जिसमें मुख्य वक्ता प्रो. अवधेश प्रधान होंगे.इस पूरे कार्यक्रम को साखी एवं ‘क’ कला दीर्घा के संयुक्त प्रयास ‘लेखक के घर चलो’ श्रृंखला के तहत आयोजित किया जा रहा है. इस श्रृंखला का उद्देश्य कविता को लोक मानस में रखने और पाठ्यक्रमों से बाहर लाकर समाज से सीधे संवाद स्थापित करना है.

कौन थे केदारनाथ सिंह: 7 जुलाई 1934 को बलिया के चकिया गांव में जन्मे केदारनाथ सिंह प्रतिष्ठित सम्मान ज्ञानपीठ पाने वाले हिंदी के 10वें लेखक हैं. उन्हें 2014 में यह सम्मान मिला था. काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 1956 में हिंदी में एमए किया. एमए के 10 साल बाद 1964 में पीएचडी की उपाधि हासिल की. फिर गोरखपुर विश्वविद्यालय में अध्यापन किया. बाद में जेएनयू चले आए और यहां हिंदी भाषा विभाग के अध्यक्ष पद से रिटायर हुए.

उनके प्रमुख कविता संग्रहों में अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहां से देखो, बाघ, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, तालस्ताय और साइकिल प्रमुख हैं. केदारनाथ सिंह ने ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन), समकालीन रूसी कविताएं, कविता दशक, साखी (अनियतकालिक पत्रिका), शब्द (अनियतकालिक पत्रिका) का संपादन भी किया. केदारनाथ सिन को ज्ञानपीठ के अलावा मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, कुमारन आशान पुरस्कार,

जीवन भारती सम्मान, दिनकर पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार और व्यास सम्मान भी मिला. केदारनाथ सिंह की साहित्यिक यात्रा पर के बिक्रम सिंह ने एक फिल्म भी बनाई थी. केदारनाथ सिंह ने अध्ययन के सिलसिले में एक लंबा वक्त बनारस में गुजारा. उनके साहित्य पर इस शहर का साफ असर दिखता है. कुछ कविताओं में उन्होंने बनारस को अलग तरह से देखा. बता दें की केदारनाथ सिंह का 83 साल की उम्र में 19 मार्च 2018 को निधन हो गया था.

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