बलिया के युवा लेखक धर्मराज गुप्ता को मिला लाल किले पर विशेष आमंत्रण!

बलिया/नई दिल्ली, 30 जुलाई — बलिया जनपद के लिए गर्व का क्षण है, जब जनपद के मनियर ब्लॉक अंतर्गत ग्राम चोरकैन्ड-मल्हौवाँ निवासी युवा लेखक धर्मराज गुप्ता को भारत सरकार द्वारा 78वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में विशेष अतिथि के रूप में लाल किले, दिल्ली में आमंत्रित किया गया है। यह सम्मान उन्हें प्रधानमंत्री युवा लेखक योजना (YUVA) के तहत प्राप्त हुआ है, जिसे भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय एवं रक्षा मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया है।

धर्मराज गुप्ता को प्रारंभ से ही इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम की गहराइयों को जानने की जिज्ञासा रही है। वे बताते हैं कि उन्होंने बलिया की अगस्त क्रांति के संदर्भों को बचपन से ही बुज़ुर्गों से सुना, और इसी प्रेरणा से उन्होंने गहन ऐतिहासिक शोध आरंभ किया। उनकी इसी शोध यात्रा का परिणाम बनी पुस्तक “याद करूं तो…1942 बलिया की क्रांति”, जो 2023 के विश्व पुस्तक मेले में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक को नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित किया गया और यह भारत के साथ-साथ विश्व के अनेक देशों के पुस्तक मेलों में प्रदर्शित की गई।

धर्मराज गुप्ता ने लेखन के लिए देश के प्रतिष्ठित पुस्तकालयों—नेशनल लाइब्रेरी (कोलकाता), एशियाटिक सोसाइटी (कोलकाता), बनारस हिंदू विश्वविद्यालय आदि—में जाकर शोध किया और बलिया के गौरवशाली अतीत को वर्तमान में जीवंत किया।

उनकी लेखनी और दृष्टिकोण को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता तब मिली जब उन्हें राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू द्वारा भी आमंत्रित किया गया। राष्ट्रपति ने बलिया की क्रांति गाथा सुनकर गहरा आश्चर्य व्यक्त किया और पुस्तक को पढ़ने की इच्छा भी जाहिर की।

इस अवसर पर धर्मराज गुप्ता ने अपनी उपलब्धियों का श्रेय अपनी माता श्रीमती उर्मिला देवी, पिता श्री कन्हैया प्रसाद, तथा परिवार के अन्य सदस्यों को देते हुए बताया कि उनके मार्गदर्शक अशोक पत्रकार, तथा साहित्यिक सहयोगियों—श्री शशिप्रेम देव, उमेश चतुर्वेदी, अरुण सिंह, रियाजउद्दीन अंसारी, शिवजी पांडेय, मोहन श्रीवास्तव एवं आशीष त्रिवेदी—का योगदान उनकी लेखनी की नींव है।

उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर बलिया जनपद के वरिष्ठ साहित्यकारों एवं सांस्कृतिक हस्तियों—जनार्दन चतुर्वेदी, राजेंद्र भारती, कमलेश श्रीवास्तव, डॉ. कादम्बिनी सिंह, नवचंद तिवारी, रामावतार ओझा आदि—में हर्ष और गौरव की लहर दौड़ गई है।

इस गौरवपूर्ण उपलब्धि ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बलिया केवल क्रांति की धरती नहीं, बल्कि युवा प्रतिभाओं की जन्मस्थली भी है जो देश के वैचारिक भविष्य का नेतृत्व करने में सक्षम हैं।

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