बलिया के लिए क्यों सबसे अहम दिन है आज…

बलिया– आज 19 अगस्त है.. आज का दिन बलिया और देश के इतिहास का अहम दिन है। आज के दिन ही साल 1942 में जेल का फाटक टूटा और बलिया आजाद हुआ था। जब शहर में क्रांतिकारियों की भीड़ लगी तो कलेक्टर ने चित्तू पांडेय और जगन्नाथ सिंह सहित 150 सत्याग्रहियों को रिहा कर दिया।


और उनके साथियों को रिहा करना पड़ा। जेल से निकलने में थोड़ी देर हुई तो लोगों ने फाटक तोड़ दिया था और सारे कैदी आजाद हो गए। इसके बाद आंदोलनकारियों ने कलेक्टरी पर कब्जा कर लिया और चित्तू पांडेय को वहां का जिलाधिकारी घोषित कर दिया। चित्तू पांडेय टाउन हॉल पहुँचे तो उनका जोरदार स्वागत हुआ। इसके बाद चित्तू पांडेय ने भोजपुरी में भाषण दिया।


बलिया क्रांति के दौरान कई थाने फूंके गए। ओक्डेनगंज थाने पर क्रांतिकारियों ने धावा बोल दिया था। बच्चा लाल, उमाषंकर सोनार, सरयू प्रसाद, विष्वनाथ प्रसाद, हीरा पंसारी, रामचन्द्र प्रसाद, राम अषीश, नन्द किषोर इंजीनियर, षिव पूजन राम, नागेष्वर राय, प्रसिद्ध नारायण सिंह, मुख्तार, जमुना राय, सुदेष्वर सिंह, के नेतृत्व में निकली टोली ने ओक्डेनगंज पुलिस चौकी पर धावा बोला चौकी के सिपाही भाग खड़े हुए। भीड़ ने पुलिस चौकी के सारे सामान को इकट्ठा कर फूंक दिया। वहीं खड़ी पुलिस की लारी को भी आग के हवाले कर दिया।


आज़ादी के जश्न के लिए पूड़ी, तरकारी का भोज भी हुआ। रेलवे स्टेषन से गुदरी बाजार तक सड़क की दोनों पटरियों पर सैकड़ों भट्ठियां बन गयी और बलिया के नगर निवासी सपरिवार सेनानियों को बड़े प्रेम और आदर के साथ पूड़ी, तरकारी, मिठार्इ खिलाने लगें। यह क्रम दूसरे दिन सुबह तक अनवरत चलता रहा। इस आजादी के अनोखे भोज में जगन्नाथ सिंह (चीनी वाले), राधा कृश्ण राम (गुदरी बाजार), दुली चन्द्र मारवाड़ी, गंगा प्रसाद गुप्त और अवध किषोर प्रसाद ने अहम भूमिका निभाया।

सिकन्दरपुर थाने पर अधिकार-
दोपहर 12बजे दिन में श्री षिव पूजन सिंह (हरदिया) श्री हीरा राय (लिलकर), श्री बलदेव प्रसाद (बालूपुर), श्री लक्षन चौधरी (पुरूशोत्तम पट्टी), श्री छोटे लाल (पन्दह), तथा श्री स्वामीनाथ सिंह (महथापार) आदि नेताओं के नेतृत्व् में बीस हजार से भी अधिक का जनसमूह सिकन्दरपुर थाने पर आ धमका।

गड़वार थाने पर धावा-
स्वराज सरकार द्वारा नियुक्त महानन्द मिश्र और विष्वनाथ चौबे गड़वार थाने पर अधिकार करने पंहुचे। लेकिन इनके पंहुचने से पहले ही गड़वार के थानेदार ने एक दिन पूर्व ही थाना खाली कर दिया था। वह थाने के सारे सामान सहित बुढ़ऊ गांव में जा छिपे थे। थाने पर कहने के लिए 4-5 सिपाही थें, जिनको बाहर करके षिवपूजन सिंह और जगमोहन सिंह ने जनता केा ललकार कर थाने की इमारत में आग लगवा दिया था।

नरहीं-
गड़हा परगना के नायक स्वामी ओंकारानन्द, जंग बहादुर सिंह (चौरा), षिवनारायण सिंह (बन्धैता) अपने दो हजार से अधिक युवा साथियों के साथ चितबड़ागांव से ताजपुर तक की रेल लाइन उखाड़ दिया। नरहीं के थानेदार ने आज इन लोगों सबक सिखाने के लिए 250 से अधिक गड़हां के ही गुण्डो-लठैतों को थाने में बुला रखा था, साथ ही इलाके से लोगो की बन्दूकें भी मंगवा कर इनको दे दी गर्इ थी, जैसे ही आन्दोलनकारियों का जूलूस थाने पर पहुंचा। भीड़ और उसके तेवर को देख कर थानेदार और उनके लठैतों की बोलती बन्द हो गर्इ। थानेदार ने फिर खुद थाने पर तिरंगा फहराया। सलामी दिया और दस रूपये चन्दा भी दिया।

चिलकहर-
आज ही जगदीष सिंह, मान्धाता सिंह, ब्रह्मा सिंह और चन्द्रमा सिंह के नेतृत्व में आठ हजार से अधिक की भीड़ ने चिलकहर रेलवे स्टेषन को फूंक दिया।
सहतवार-
वैसे तो सहतवार थाने पर 11 अगस्त से ही युवा नेता श्रीपति कुॅवर के नेतृत्व में आए जूलूस द्वारा थानेदार हैदर को आत्मसमपर्ण करा कर लगावाया गया झण्डा लहरा रहा था।

बैरिया क्रांति-
अगस्त क्रांति को लेकर क्रांतिकारियों के हौसले काफी बुलंद थे। क्रांतिकारियों ने रेलवे स्टेशन फूंक दिया था रेल पटरियों को उखाड़ दी थीं। 18 अगस्त 1942 से दो दिन पहले बैरिया में भूपनारायण सिंह, सुदर्शन सिंह के साथ हजारों की भीड़ के आगे थानेदार काजिम ने खुद ही थाने पर तिरंगा फहराया था और थाना खाली करने के लिए क्रांतिकारियों से दो दिन की मोहलत मांगी थी।इस दिन थाने पर तिरंगा फहराते समय 18 क्रांतिकारी शहीद हो गए थे।

(बलिया के रहने वाले शशिकांत ज़ी मीडिया के पत्रकार हैं)

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