समाजवाद को आजीवन जीने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की अनसुनी कहानियां…

अंकित द्विवेदी 

चन्द्रशेखर की आत्मकथा ‘जीवन जैसा जिया’ के लिए एक तस्वीर खींची जा रही थी। चंद्रशेखर से कहा गया कि कुछ लिखते हुए सीधा बैठिए और मुस्कुराइए। उन्होंने कहा माना। कुर्सी पर जाकर बैठ गए और मेज पर कागज रखकर कुछ लिखने लगे। तस्वीर खिंचवाने के बाद आत्मकथा के सहयोगी लेखकों ने देखा कि उस कागज़ पर उन्होंने लिखा था,” चित्र बनवाने के लिए सीधा बैठना और मुस्कुराना पड़ता है। यह मेरे लिए बहुत कठिन है।”

उनके एक मित्र थे जो उन दिनों इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे थे, नाम था मतबदल जायसवाल। उनको साक्षातकार के लिए जयपुर बुलाया गया था। वो होटल में रुके, जिसकी व्यवस्था चन्द्रशेखर और उनके मित्रों के द्वारा की गई थी और चंद्रशेखर खुद एक सस्ते होटल में रुके, जिसमें 2 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से लगते थे। उस दौरान हिन्दू हॉस्टल में नाई से ही रोज़ दाढ़ी बनवाने की आदत थी, एक दिन नहीं बनी तो खुजली हुई, वो परेशान हो गए आधे घंटे ढूंढने के बाद भी कोई दुकान नहीं मिली।

जो मिली वो ईट पर बैठकर बना रहे थे उस वक़्त भी इतनी समझ थी कि अगर इनसे बनवाएंगे तो किसी तरह की दिक्कत हो सकती है, वो वापस लौट गए। दूसरे दिन भी नहीं बनवाए तो सोचे की इरादा तो समाजवाद लाने का है। दाढ़ी से ही परेशान हो जाएंगे तो क्या कर पाएंगे, और इस तरह उन्होंने दाढ़ी बनवाना छोड़ दिया।
वो जयपुर से वापस जब इलाहाबाद लौटे तो उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी देखकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के उनके संघी मित्रों ने कहा कि क्या चंद्रशेखर तुम अशोक मेहता बन रहे हो? तो उन्होंने कहा,नहीं, गोलवलकर बनने का विचार है, धीरे – धीरे वही बन जाऊंगा। इस तरह उन्होंने दाढ़ी रखना शुरू किया। जिसकी वज़ह से उनके विरोधी और मित्र उन्हें दाढ़ी वाला भी कहते थे।

किसान परिवार में जन्मे बलिया के बाबू साहेब चन्द्रशेखर का मानना था, “भारत में जिन लोगों ने समाजवाद का नारा दिया और जिनके हाथ में सत्ता थी। उन्होंने स्वयं कभी निर्धनता का अनुभव नहीं किया था, उसकी पीड़ा को नहीं समझा था। भाषा में उसकी अभिव्यक्ति सम्भव थी लेकिन आचरण में उनकों उतारना मुश्किल था।” उनके व्यक्तित्व में देश के किसानों का आत्मसम्मान और गौरव था। यही वज़ह थी कि वो आजीवन अपने विचारों पर अडिग रहे। साल 1927 में आज ही के दिन इस युवा तुर्क और समाजवादी नेता का जन्म हुआ था। जन्मदिवस पर चंद्रशेखर जी को नमन।

लेखक- हुसैनाबाद, बांसडीह के रहने वाले अंकित द्विवेदी पत्रकार हैं और दिल्ली में एक मीडिया संस्थान से जुड़े हुए हैं।

Ritu Shahu

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