बलिया- कैंसर पीड़ित का उपचार भगवान भरोसे, दर दर की ठोकरे खा रही ​है मीरा!

बलिया। देश व प्रदेश की सरकार भले ही समाज के अन्तिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के स्तर को सुधारने के लिये हर सुविधा मुहैया कराने के लिए कृत संकल्पित हो लेकिन प्रशासनिक उदासीनता व लापरवाही के वजह से सरकार की योजनाओं का वास्तविक लाभ जरूरतमंद लोगों तक नही पहुँच पा रहा है।स्थिति ये कि योजनाओ के लाभ पाने के हकदार दर दर की ठोकरे खा रहे है और अपात्र सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर गुलछर्रे उड़ा रहे है। इसकी एक बानगी है बेल्थरारोड तहसील की ग्रामपंचायत करनी, जहाँ कैंसर से पीड़ित एक दलित आवास व राशन कार्ड के लिए दर दर भटक रहा है। ग्रामीणों की दया पर निर्भर कैंसर पीड़ित का उपचार भी भगवान भरोसे है।

क्षेत्र पंचायत नगरा अन्तर्गत ग्राम पंचायत करनी की दलित बस्ती मे कैंसर रोग से पीड़ित 36 वर्षीय बड़ेलाल पुत्र स्व दीनानाथ एक छोटी सी झोपड़ी मे पत्नी मीरा पुत्र आकाश,आदित्य व पुत्री परी के साथ रहता है। झोपड़ी ऐसी है कि अगर तेज आंधी आ जाए तो हवा में उड़ जायेगी। बारिस होने पर झोपड़ी से जगह जगह से पानी टपकने लगता है। पीड़ित किसी तरह उस झोपड़ी में परिवार के साथ रात काटने को मजबूर है। उसके पास कृषि योग्य कोई भूमि भी नही है। एक वर्ष से अधिक समय से कैंसर रोग से पीड़ित होने के कारण वह मजदूरी भी नही कर पाता है।उसके पास राशन कार्ड भी नही है।राशन कार्ड के अभाव मे उसे राशन भी नही मिलता है।
दो जून की रोटी के लिये पीड़ित गांव के लोगो एवं सगे सम्बन्धियो के रहमो करम निर्भर है। नन्हे मुन्ने बच्चे धनाभाव के कारण आजतक विद्यालय नही देखा। जबकि ऐसे ही गरीबो के शिक्षा के लिए सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया है।

भोजन कि व्यवस्था के बारे मे पुछे जाने पर कैंसर पीड़ित की पत्नी मीरा ने बताया कि पहले आसपास के लोगों द्वारा कुछ न कुछ खाने पीने को मिल जाता था तो नमक रोटी का काम चलता था।हमारी दयनीय दशा को देखकर अब दो बार से गाँव का कोटेदार बिना राशन कार्ड के ही खाद्यान्न दे रहा है लेकिन कब तक देगा मालूम नही। कहा कि राशन कार्ड व आवास के लिए अनेको बार ग्रामप्रधान से गुहार लगा चुकी हुं लेकिन प्रधान जी पर कोई असर नहीं पड़ता है। रोते हुए कहती है आवास के लिये पैसे देने पड़ते है और हमारे पास पैसे नहीं हैं।इस दुनिया मे हम गरीब दुखियो की परेशानी सुनने देखने वाला कोई नही है।सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है। पति की दवा के लिए भी इधर उधर भटकना पड़ता है।

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