‘बागी’ बलिया में इस बार भीतरघात दिखाएगा असली ‘रंग’

पूर्वांचल का बलिया जिला ‘बागी’ तो यहां के लोगों और सांसदों का तेवर बगावती रहा है। इस बार के चुनाव में बीजेपी उम्‍मीदवार वीरेंद्र सिंह मस्‍त को लेकर वर्तमान सांसद भरत सिंह के समर्थकों ने बगावत का तेवर अख्तियार किया है। उधर, एसपी-बीएसपी गठबंधन ने समाजवाद की जड़ें मजबूत करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कुनबे से अलग पूर्व विधायक सनातन पांडेय पर दांव चलकर लोगों को चौंकाया है।

लंबे राजनीतिक इतिहास को देखें तो शायद यह पहला मौका है, जब चंद्रशेखर की विरासत उनके परिवार के बाहर के समाजवादी को सौंपी गई है। जिताऊ उम्‍मीदवार खोजने की कसरत के बाद कांग्रेस ने यह सीट अपने सहयोगी दल जन अधिकार पार्टी को दी थी लेकिन उसके प्रत्याशी अमरजीत यादव का पर्चा खारिज हो गया। अब यहां महागठबंधन और बीजेपी में सीधा मुकाबला है। लेकिन भीतरघात की आशंका ने बीजेपी और महागठबंधन उम्‍मीदवारों की नींद उड़ाई है।

बलिया जिले को यूं ही बागी नहीं कहा जाता है। इस जिले ने देश के प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम(1857) के नायक मंगल पांडेय को दिया। समग्र क्रांति का नेतृत्‍व भी बलिया की माटी के जयप्रकाश नारायण ने किया तो धारा के उलट राजनीति करने वाले चंद्रशेखर भी बलिया के ही लाल रहे। पहले ही आम चुनाव में मतदाताओं ने अपना बगावती तेवर दिखाया था और अब तक जिन्‍हें अपना प्रतिनिधि चुना वह भी बगावती मिजाज के ही रहे। इस सीट की एक खासियत यह भी है कि अब तक के 17 बार के चुनाव में सिर्फ एक बार ही कमल खिला है।

पहले चुनाव में ही झटका दिया
आजादी के बाद पहले आम चुनाव में देश में कांग्रेस की हवा थी। उस समय बलिया के लोगों के दिलों पर राज करने वाले मुरली बाबू को जब कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया तो वह बगावत कर निर्दलीय उम्‍मीदवार के रूप में चुनाव लड़े। कांग्रेस ने पंडित मदन मोहन मालवीय के बेटे गोविंद मालवीय को मैदान में उतारा पर मतदाताओं ने उन्‍हें खारिज कर मुरली बाबू को संसद में पहुंचाया था। 1957 से लेकर 1971 तक यह सीट कांग्रेस के पास रही। युवा तुर्क चंद्रशेखर 1977 में पहली बार सांसद चुने गए तो सिर्फ 1984 को छोड़ जीवनपर्यन्त आठ बार बलिया का प्रतिनिधित्‍व करते रहे।

बेटे ने संभाली थी विरासत
चंद्रशेखर के निधन बाद भी यहां के मतदाताओं का बागी तेवर ही हावी रहा। खाली हुई सीट पर 2007 में उपचुनाव और उसके बाद 2009 में आम चुनाव में मतदाताओं ने उनके बेटे नीरज शेखर को अपना प्रतिनिधि चुन लोकसभा में भेजा। 2014 के चुनाव में बीएचयू में छात्र जीवन से ही तेवर दिखाने वाले भरत सिंह पर मतदाताओं ने भरोसा कर पहली बार कमल खिला दिया। इस सीट से बीएसपी को अपना परचम लहराने का मौका अब तक नहीं मिल सका है जबकि एसपी उम्‍मीदवार दो बार चुने गए।

‘लहर’ का असर सिर्फ दो बार

1952 से अब तक 17 बार हो चुके चुनाव (उपचुनाव को लेकर) में‍ सिर्फ दो बार ऐसा मौका आया जब बलिया में लहर का असर दिखा। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्‍या से पैदा हुई सहानुभूति की लहर में चंद्रशेखर को हार का सामना करना पड़ा था। तब कांग्रेस के जगन्‍नाथ चौधरी चुनाव जीत संसद में पहुंचे थे। दूसरी बार 2014 में जब नरेंद्र मोदी की सुनामी का असर दिखा और भरत सिंह लोकसभा में पहुंचे। इस बार चुनाव में बीजेपी ने भरत सिंह का टिकट काट दिया है। उनकी जगह वीरेंद्र सिंह मस्‍त चुनाव मैदान में हैं। महागठबंधन के चलते चुनावी समीकरण पूरी तरह बदले हाल में दिख रहे हैं।

बलिया लोकसभा संख्‍या
कुल मतदाता- 17,92,420
पुरुष- 9,84,465
महिला- 8,07,892

2014 चुनाव का परिणाम
भरत सिंह (बीजेपी)- 3,59,758
नीरज शेखर (एसपी)- 2,20,324

प्रमुख प्रत्याशी

वीरेंद्र सिंह मस्‍त(बीजेपी)
सनातन पांडेय(एसपी)

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